खाने-पीने की मिलावटी चीजें बेचने पर 6 महीने की जेल, कम से कम इतनी सजा की सिफारिश

एक संसदीय पैनल ने खाने-पीने वाली मिलावटी चीजें बेचने वालों के लिए कम से कम छह महीने की कैद और कम से कम 25,000 रुपये जुर्माने की सिफारिश की है। बीजेपी सांसद बृजलाल के नेतृत्व वाली गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने कहा कि मिलावटी चीजों के सेवन से होने वाली गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को देखते हुए अभी इस मामले में जो सजा मिलती है, वह पर्याप्त नहीं है

अपडेटेड Nov 14, 2023 पर 3:34 PM
नुकसान पहुंचाने वाले खाने-पीने के चीजों की बिक्री का जिक्र करते हुए पैनल ने कहा कि इससे बड़े पैमाने पर लोग प्रभावित हो सकते हैं लेकिन इससे जुड़े कानून के तहत अपराधियों को जितनी सजा का प्रावधान है, वह काफी नहीं है।

एक संसदीय पैनल ने खाने-पीने वाली मिलावटी चीजें बेचने वालों के लिए कम से कम छह महीने की कैद और कम से कम 25,000 रुपये जुर्माने की सिफारिश की है। बीजेपी सांसद बृजलाल के नेतृत्व वाली गृह मामलों की संसदीय स्थायी समिति ने कहा कि मिलावटी चीजों के सेवन से होने वाली गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को देखते हुए अभी इस मामले में जो सजा मिलती है, वह पर्याप्त नहीं है। ऐसे में कमेटी ने कम से कम 25 हजार रुपये जुर्माने के साथ- साथ कम से कम छह महीने की सजा का प्रस्ताव रखा है।

अभी महज 1 हजार रुपये का है जुर्माना

नुकसान पहुंचाने वाले खाने-पीने के चीजों की बिक्री का जिक्र करते हुए पैनल ने कहा कि इससे बड़े पैमाने पर लोग प्रभावित हो सकते हैं लेकिन इससे जुड़े कानून के तहत अपराधियों को जितनी सजा का प्रावधान है, वह काफी नहीं है। अभी इस मामले में अपराधियों को अधिकतम छह महीने की सजा और अधिकतम 1 हजार रुपये का जुर्माने या दोनों का प्रावधान है। अब कमेटी ने इस अधिकतम सजा को न्यूनतम करने और जुर्माने की न्यूनतम राशि को 10 हजार रुपये करने का प्रावधान किया है।


'Community Service' को लेकर भी सिफारिश

खाने-पीनों की मिलावटी चीजों के लिए सजा के कड़े प्रावधानों के अलावा कमेटी ने कम्युनिटी सर्विस पर भी सुझाव दिया है। कमेटी ने भारतीय न्याय संहिता (BRS) के तहत सजा के तौर पर 'सामुदायिक सेवा'' की शुरूआत को स्वागतयोग्य कदम बताया लेकिन इसमें कुछ और करने की भी जरूरत बताई है। पैनल के मुताबिक अपराधियों से निपटने के लिए यह एक बहुत ही बेहतर कदम है जिससे न केवल जेल के कैदियों की संख्या कम करके जेल के बुनियादी ढांचे पर बोझ कम किया जा सकेगा बल्कि जेलों का मैनेजमेंट भी बेहतर होगा।

कमेटी का कहना है कि इसमें सेवा की अवधि और प्रकृति को लेकर कुछ कहा नहीं गया है। इसे लेकर कमेटी ने सिफारिश की है कि इसकी अवधि और प्रकृति तय की जानी चाहिए और उपयुक्त रूप से परिभाषित किया जाना चाहिए। कमेटी ने यह भी सिफारिश की कि प्रस्तावित कानून में कम्यूनिटी सर्विस के परिभाषित करते समय एक प्रावधान यह भी होना चाहिए जिसके तहत सजा की निगरानी के लिए किसी शख्स को जिम्मेदार बनाया जा सके।

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भारतीय न्याय संहिता में गलतियों की तरफ किया इशारा

कमेटी ने भारतीय न्याय संहिता में कई टाइपिंग एरर और व्याकरणीय गलतियों की तरफ भी इशारा किया है जिसे सुधारने की जरूरत बताई है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता विधेयक (BNSS-2023), भारतीय न्याय संहिता (BNS-2023) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम विधेयक (BSA-2023) को 11 अगस्त को लोकसभा में पेश किया गया था। इसमें BNSS-2023 को कोड ऑफ क्रिमिनल प्रोसिजर एक्ट, 1898; BNS-2023 को इंडियन पैनल कोड, 1860 और BSA-2023 को इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872 के बदले में लाया जाना है। संसदीय समिति की रिपोर्ट पिछले शुक्रवार को राज्यसभा में सौंपी गई।

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