सुरेंद्र किशोर
सुरेंद्र किशोर
आजादी के बाद सम्मान, पदक और उपाधि देने की शुरुआत करने की इच्छा पहली बार लॉर्ड माउंटबेटन ने जाहिर की थी दिसे भारत सरकार ने लागू किया। संविधान में उपाधि देने की मनाही है लेकिन लॉर्ड माउंटबेटन की चाह के कारण इसे शुरू किया गया था। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निजी सचिव एम.ओ.मथाई की संस्मरणात्मक पुस्तक में दर्ज विवरण के अनुसार माउंटबेटन ने सोवियत संघ का उदाहरण दिया जहां पदक और उपाधियां देने का चलन है।
सोवियत संघ ने सन 1974 में भारतीय कम्युनिस्ट नेता एस. ए. डांगे को ‘ऑर्डर ऑफ लेनिन’ प्रदान किया था। मथाई लिखते हैं कि "किंतु माउंटबेटन ने अमरीका और फ्रांस जैसे देशों के उदाहरण नहीं दिए जहां ऐसे सम्मान नहीं दिए जाते।" याद रहे कि भारत में सन 1954 में शुरू किए गए इन सम्मानों के लिए नामों के चयन पर हमेशा विवाद रहे हैं। नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल में पद्म सम्मानों को लेकर विवाद नहीं हैं। पर यह निर्विवाद कब तक रह पाएगा,यह नहीं कहा जा सकता।
याद रहे कि इस देश में जिन हस्तियों को भारत रत्न देने के साथ इसकी शुरूआत की गई, उस प्रथम सूची में डा.राजेंद्र प्रसाद का नाम नहीं था। हां, उपराष्ट्रपति डॉक्टर राधाकृष्णन को पहले ही भारत रत्न दे दिया गया गया। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद को बाद में। इन पुरस्कारों व सम्मानों को संविधान विरोधी मानते
हुए सन 1977 में मोरारजी देसाई सरकार ने इन पदकों और सम्मानों का प्रावधान ही खत्म कर दिया था।
लेकिन, सन 1980 में इंदिरा गांधी सरकार ने उसे फिर से शुरू कर दिया। भारत रत्न और पद्म सम्मानों को लेकर हमेशा ही विवाद होते रहते हैं। आरोप लगता है कि अक्सर सम्मान के लिए चयनित नामों का आधार राजनीति होती है। मशहूर लेखक खुशवंत सिंह ने सन 2008 में ही लिखा था कि "हर साल होने वाले इस चयन पर किस बात का ध्यान दिया जाता है,यह आज तक मेरी समझ में नहीं आया।"
उसी वर्ष कांग्रेसी नेता राजीव शुक्ल ने लिखा था कि "दिल्ली में लॉबिंग करके कुछ लोग पहले भी पद्मश्री और पद्म भूषण पुरस्कार ले चुके हैं।" अब भला खुशवंत सिंह और राजीव शुक्ल से बेहतर तब की केंद्र सरकारों के आंतरिक क्रियाकलापों को दूसरे कितने लोग जानते हैं। संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद -18 के जरिए उपाधियों का अंत ही कर दिया था। आजादी के बाद पहली बार सन 1954 में एक साथ तीन हस्तियों को भारत रत्न से सम्मानित किया गया था ।वे थे डा.एस.राधाकृष्णन,चक्रवर्ती राजागोपालाचारी और डा.चंद्रशेखर बेंकटरमण। जबकि सुभाष चंद्र बोस,सरदार बल्लभ भाई पटेल, शहीद भगत सिंह और हॉकी के जादूगर ध्यानचंद जैसे लोगों को याद नहीं रखा गया।
सरदार पटेल को 1991 में, एम.जी.रामचंद्रन को सन 1988 में और जयप्रकाश नारायण को सन 1998 में भारत रत्न से नवाजा गया। इस उदाहरण को देखने के बाद लगता है कि इस उपाधि पर इससे बढ़कर राजनीति और क्या हो सकती है? आचार्य जे.बी.कृपलानी उपाधियों के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने भारत रत्न,पद्म विभूषण और पद्मश्री जैसी उपाधियों के खिलाफ सन 1970 में लोक सभा में एक गैर सरकारी विधेयक लाया था।पर उनका विधेयक पारित नहीं हो सका।
इस विधेयक पर चर्चा के दौरान ही जब कृपलानी को लगा कि उनका विधेयक गिर जाएगा तो स्पष्टवक्ता कृपलानी ने इंदिरा कांग्रेस के सदस्यों की ओर इंगित करते हुए कहा था कि आप लोग सबसे बड़े पाखंडी हैं। आप स्वयं को समाजवादी कहते हैं किंतु अनेक काम समाजवाद के विरुद्ध करते हैं। यह काम भी आपका ऐसा ही है। आचार्य कृपलानी सन 1947 में कांग्रेस के अध्यक्ष थे।पर बाद में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दिया था। गांधीवादी कृपलानी कभी -कभी गांधीजी को भी खरी -खरी सुना देते थे।
संविधान सभा के सदस्य रह चुके कृपलानी को यह अच्छा नहीं लगता था कि स्वतंत्र भारत में भी उपाधियों वाला एक विशेष वर्ग पैदा किया जाए। विधेयक विचारार्थ पेश करने से पहले उन्होंने सत्ताधारी कांग्रेसी सदस्यों से पूछा था कि क्या वे विधेयक पर मतदान के लिए कोई व्हीप जारी करना चाहते हैं? यदि ऐसा वे चाहते हैं तो वे इस विधेयक को पेश नहीं करेंगे। पर, उस समय तो सत्ताधारी कांग्रेसी सदस्यों ने व्हीप का कोई संकेत नहीं दिया। यहां तक कि सत्ताधारी दल के कई सांसदों ने कृपलानी के विधेयक का सदन में समर्थन भी दिया। पर, विधेयक पर मतदान के समय उन सदस्यों ने विधेयक के खिलाफ वोट दे दिया। क्योंकि बहस समाप्त होने से कुछ ही समय पहले सत्ताधारी सांसदों ने अपनी रणनीति बदल ली थी।
विपक्ष के सदस्यों ने तो सरकार द्वारा प्रदत्त उपाधियों की निस्सारता की चर्चा की और इसे समाप्त करने की जरूरत पर बल दिया। भले जे.बी.कृपलानी का विधेयक गिर गया,पर इस पर चर्चा के दौरान अनेक सदस्यों ने इस सवाल को संजीदगी से उठाया कि क्या सरकार इन उपाधियों के जरिए नागरिकों का एक विशिष्ट वर्ग नहीं तैयार कर रही है? संसद ने उससे कुछ ही दिन पहले राजा-महाराजाओं को दिये जाने वाले प्रिवी पर्स को समाप्त करने के लिए एक विधेयक पास किया था।
उस विधेयक पर चर्चा के दौरान कई सांसदों ने कहा था कि पूर्व नरेशों को दी जा रही धन राशि महत्वपूर्ण नहीं हैं। बल्कि अधिक महत्वपूर्ण बात उनकी वे उपाधियां हैं जो आम जनता से उन्हें अलग और विशिष्ट बनाती हैं। जे.बी.कृपलानी को यह बात अखर रही थी कि एक प्रशासनिक आदेश से केंद्र सरकार ने 1954 में भारत रत्न तथा अन्य प्रकार की उपाधियां देने का फैसला किया था। मंत्रिमंडल में कभी यह मुददा नहीं लाया गया क्योंकि सरदार पटेल और मौलाना अबुल कलाम आजाद जैसे दिग्गज नेता इन उपाधियों के खिलाफ थे।
(लेखक राजनीतिक मामलों के जानकार और वरिष्ठ पत्रकार हैं)
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