जन्मदिन विशेष: जब डॉक्टर लोहिया के कहने पर मकबूल फिदा हुसैन ने रामायण-महाभारत के चित्र बनाए थे

हुसैन ने लिखा है एक बार लोहिया मुझसे बोले, तुम उद्योगपतियों के लिए चित्र बनाते हो। कभी- कभी इस देश के साधारण लोगों के लिए भी बनाया करो

अपडेटेड Mar 23, 2022 पर 8:01 AM
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लोहिया के नाम पर राजनीति हो रही है लेकिन मूल्यों का पालन नहीं हो रहा

सुरेंद्र किशोर

डॉक्टर राम मनोहर लोहिया की सलाह पर मकबूल फिदा हुसैन ने आठ साल तक रामायण के आधार पर 150 चित्र कैनवास पर बनाए थे। तब वे चित्र बहुत चर्चित हुए थे। यह बात खुद मकबूल फिदा हुसैन ने लिखी है। मकबूल को कभी "भारत का पिकासो" कहा जाता था। वे दोनों तब हैदराबाद में रहते थे।

मकबूल फिदा हुसैन के अनुसार "मैंने यह काम ऐसे ही शुरू नहीं किया। मैंने बाकायदा काशी के पंडितों को आमंत्रित कर उनसे विषय पर चर्चा की। वाल्मीकि और गोस्वामी तुलसीदास की रामायण को लेकर गहन अध्ययन किया। तब कहीं जाके चित्र बनाये। मुझसे पहले राजा रवि वर्मा ने ही हिन्दू पौराणिक चरित्रों पर काम किया था।"

मकबूल फिदा हुसैन की वह भूमिका उनके जीवन के आखिरी वर्षों की विवादास्पद भूमिका से ठीक उलट थी। तब लोहिया जैस नेता चित्रकार को निदेशित करने के लिए उपलब्ध थे। बाद के वर्षों में वैसे नेताओं का अकाल पड़ गया। संभवतः इसीलिए बाद में वह नामी चित्रकार भटक गया था। साहित्य और राजनीति के क्षेत्रों में भी डॉक्टर लोहिया के संसर्ग से कई अनोखे काम हुए थे। डॉक्टर लोहिया का जन्म 1910 और निधन 1967 में हुआ।


लोहिया के नाम पर राजनीति लेकिन मूल्यों का पालन नहीं

आज भी इस देश के कुछ नेतागण लोहिया का नाम लेकर राजनीति करते हैं। पर शायद ही वे लोहिया के राजनीतिक मूल्यों और आदर्शों का पालन करते हैं। वे उनके नाम का सिर्फ तोता रटंत करते हैं। याद रहे कि अपने आखिरी दिनों में मकबूल फिदा हुसैन ने हिन्दू देवी-देवताओं के ऐसे गंदे चित्र बनाए कि उन्हें भारत में अनेक मुकदमे झेलने पड़े। कानून की गिरफ्त से बचने के लिए अंततः वे 2006 में विदेश भाग गए। 95 साल की आयु में 2011 में मकबूल फिदा हुसैन का लंदन में निधन हो गया।

BJP नेता दिवंगत अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार कहा था कि "मुझे उन मुसलमानों से मिलकर और बात करके अलग ढंग की खुशी होती है जो डॉक्टर लोहिया के साथ काम कर चुके होते हैं।" अब जानिए कि खुद मकबूल फिदा हुसेन डॉक्टरलोहिया के बारे में तब कैसी राय रखते थे। मकबूल फिदा हुसेन ने लिखा है "डॉक्टर राम मनोहर लोहिया एक असीम ऊर्जा के धनी नायक थे। सन् पचास और साठ के दशकों में जब वे हैदराबाद में थे, मुझे उनके साथ लंबा वक्त बिताने का अवसर अवसर मिला। उनका व्यक्तित्व विशाल था, वे दूरदृष्टि के राजनेता थे। मैं उनके साथ सात वर्ष रहा।

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हुसैन ने लिखा है एक बार लोहिया मुझसे बोले, "तुम उद्योगपतियों के लिए चित्र बनाते हो। कभी- कभी इस देश के साधारण लोगों के लिए भी बनाया करो। चित्रकला केवल धनी -मानी लोगों के लिए नहीं है। यदि तुम्हारी कला इस देश के साधारण लोगों के लिए होगी तो वे तुम्हें ज्यादा आदर और सम्मान देंगे। उन्होंने मुझसे रामायण और महाभारत के चित्र यह कहते हुए बनवाए कि इस देश में अनेक पौराणिक चरित्र हैं, आप उन्हें चित्रित कीजिए, लोग पसंद करेंगे। यहां लोग छोटे से पत्थर में भगवान को ढूंढ़ लेते हैं, चित्र देखकर तो वे और आनंदित होंगे।"

डॉक्टर लोहिया जी ने इस बात पर जोर दिया था कि नगरों के बजाय गांव के लोग तुम्हारी कला को ज्यादा समझेंगे। उनकी बात सही निकली। जब मैं अपनी मोटर कार पर भगवान कृष्ण की तस्वीर बना कर घूमने निकल पड़ा तो शहर के लोगों ने उसे तवज्जो नहीं दी। लेकिन गांव के लोग उसे देखकर बहुत खुश हुए। तब मुझे लगा कि इस देश से अंग्रेज चले जरूर गए हैं, पर अपने मानस पुत्रों को यहां छोड़ गए हैं जिन्हें यहां की संस्कृति से कोई लगाव नहीं है।

डॉक्टर लोहिया जी की सलाह पर, "मैंने आठ साल तक रामायण के आधार पर 150 चित्र कैनवास पर बनाए। डॉक्टर लोहिया के साथ रहकर फिदा हुसेन ने यह महसूस किया था कि भारतीय संस्कृति और परम्परा के प्रति डॉक्टर लोहिया के दिल में गहरा आदर भाव था। सभी धर्मों का वे सम्मान करते थे। हिन्दू धर्म और इस्लाम दोनों के प्रति समान आदर भाव रखते थे। आज जब वे हमारे बीच नहीं हैं तो उनसे जुड़ी तमाम स्मृतियां अनायास चली आती हैं।"

लोहिया खानपान के शौकीन थे। वे हमें खाना खिलाने सड़क किनारे ढाबों पर ले जाते थे। बड़ी आत्मीयता से बात करते। अंग्रेजी का एक शब्द भी उनके मुंह से निकलते नहीं देखा। वे लोगों से अपनी मातृभाषा में बोलने के लिए कहते थे। बाद में उन्होंने भाषा के मुद्दे पर बड़ा आंदोलन भी चलाया। देश को आज ऐसे नेतृत्वकर्ताओं की जरूरत है। मकबूल ने लिखा कि आज के नेता तो जोड़ने के बजाय तोड़ने की बात ज्यादा करते हैं। लोहिया जी महिलाओं को समर्थ और व सक्षम होते देखना चाहते थे।

एक बार उन्होंने मुझसे रामायण की सीता की चर्चा करते हुए कहा था कि वाल्मीकि ने सीता का दृढ रूप वर्णन किया है, गोस्वामी तुलसीदास ने वैसा नहीं किया। भारतीय नारियों को उनकी सलाह थी कि वे सीता की बजाए द्रौपदी को अपना आदर्श बनाएं। लोहिया मानते थे कि द्रौपदी बहुत ही सबल नारी थी। मकबूल के अनुसार, "डॉक्टर लोहिया महान राष्ट्रभक्त थे।" अब सवाल है कि आज यानी 2022 में जो राजनेता गण खुद को लोहियावादी कहते हैं, उनमें से कितने लोग लोहिया के विचारों के अनुयायी भी हैं?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक मामलों के जानकार हैं)

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