BJP के लिए आसान नहीं है महाराष्ट्र की डगर, विधानसभा चुनाव से पहले मुंह बाए खड़ी हैं ये चुनौतियां, अब बचा है यही एक रास्ता
Maharashtra Assembly Election 2024: बीजेपी की सत्ता में वापसी की राह चुनौतीपूर्ण नजर आ रही है। इसके अलावा, पार्टी ने विधानसभा चुनाव के लिए महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को फिर से अपना कप्तान बनाकर अपने लिए राह को और मुश्किल ही कर लिया है। इसके उलट महा विकास अघाड़ी (MVA) विधानसभा में अपनी सफलता दोहराने को लेकर आश्वस्त है
MoneyControl News
अपडेटेड Aug 23, 2024 पर 3:07 PM
BJP के लिए आसान नहीं है महाराष्ट्र की डगर, विधानसभा चुनाव से पहले मुंह बाए खड़ी हैं ये चुनौतियां
भारतीय जनता पार्टी (BJP) इस समय महाराष्ट्र में कई चुनौतियों का सामना कर रही है। अजित पवार को महायुति गठबंधन में शामिल करने के पार्टी के फैसले की अंदर और बाहर दोनों तरह से आलोचना हुई है, जबकि चल रहे मराठा आंदोलन ने इस आग में घी का काम कर दिया है। खासकर लोकसभा चुनाव में निराशाजनक प्रदर्शन के बाद पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर सीधा-सीधा असर पड़ा है। इसके उलट, महा विकास अघाड़ी (MVA) विधानसभा में अपनी सफलता दोहराने को लेकर आश्वस्त है, एक इंटरनल सर्वे से पता चलता है कि वे आगामी विधानसभा चुनावों में 288 में से 160 से ज्यादा सीटें जीत सकते हैं।
इस सब को देखते हुए, बीजेपी की सत्ता में वापसी की राह चुनौतीपूर्ण नजर आ रही है। इसके अलावा, पार्टी ने विधानसभा चुनाव के लिए महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) को फिर से अपना कप्तान बनाकर अपने लिए राह को और मुश्किल ही कर लिया है।
एक एक कर टूटे रिश्ते
उद्धव ठाकरे और शरद पवार के लिए भी फडणवीस ही सबसे बड़ा टारगेट हैं। ठाकरे ने खुले तौर पर घोषणा की है कि या तो फडणवीस या फिर खुद वो ही महाराष्ट्र की राजनीति में जिंदा रहेंगे।
ठाकरे और फडणवीस के बीच दुश्मनी 2019 से पहले की है, लेकिन चुनाव नतीजों के बाद यह और बिगड़ गई, जब ठाकरे ने आधे कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री पद की मांग की थी।
मराठा आरक्षण आंदोलन के नेता मनोज जरांगे पाटिल अपने भाषणों में एकनाथ शिंदे या अजीत पवार जैसे दूसरे महायुति नेताओं के बजाय खासतौर से फडणवीस को निशाना बनाते रहे हैं।
स्थिति 2023 में और बिगड़ गई जब जारांगे के अनशन खत्म करने की कोशिश के दौरान जालना में मराठा कार्यकर्ताओं पर पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। तब से फडणवीस, जारांगे के गुस्से का टारगेट बन गए, क्योंकि गृह विभाग भी उनके ही पास है।
इसके अलावा, फडणवीस ने फिर से मुख्यमंत्री बनने की अपनी इच्छा भी नहीं छोड़ी है। अगर चुनाव के बाद गठबंधन सरकार बनाने की जरूरत पड़ी, तो उनकी ये इच्छा शायद साथी दलों के साथ बातचीत में रुकावट भी बन सकती है।
बीजेपी के पास बस यही एक विकल्प
महाराष्ट्र में अपनी पकड़ फिर से मजबूत करने के लिए बीजेपी के लिए एक संभावित समाधान यह हो सकता है कि नितिन गडकरी को राज्य की राजनीति में वापस लाया जाए और उन्हें मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया जाए।
ये कदम से कुछ समय के लिए देवेंद्र फडणवीस को राष्ट्रीय राजनीति में शिफ्ट करने का मौका मिल जाएगा। गडकरी एक साथ कई मुद्दों लेकर, पार्टी के संकटमोचक की तरह काम कर सकते हैं।
गडकरी का नेतृत्व मराठा आंदोलन को खत्म करने में मदद कर सकता है, जो पहले ही लोकसभा चुनावों में भाजपा के लिए महंगा साबित हुआ है, जिसके कारण पंकजा मुंडे सहित कई उम्मीदवारों की हार हुई है।
जारांगे पाटिल ने आगामी चुनाव में बीजेपी को फिर से हराने की कसम खाई है। भाजपा के भीतर नेतृत्व परिवर्तन ही शायद इस असंतोष को कम कर सकता है।
गडकरी के पवार और ठाकरे दोनों के साथ अच्छे संबंध हैं। लोकसभा चुनाव से पहले, जब उम्मीदवारों की पहली लिस्ट में गडकरी का नाम नहीं था, तो शिवसेना के मुखपत्र सामना ने उनके पक्ष में संपादकीय छापा, जिसमें प्रधान मंत्री मोदी और अमित शाह पर उन्हें दरकिनार करने का आरोप लगाया गया।
बाल ठाकरे भी गडकरी को पसंद करते थे, यहां तक कि वो उन्हें प्यार से "पुलकारी" कह कर पुकारते थे। महाराष्ट्र के लोक निर्माण विभाग मंत्री के रूप में मुंबई में 55 फ्लाईओवर बनाने जैसी गडकरी की उपलब्धियों ने उन्हें सभी पार्टियों में सम्मान दिलाया है।
उद्धव ठाकरे ने एक बार यहां तक सुझाव दिया था कि गडकरी बीजेपी से इस्तीफा देने के बाद विपक्ष के समर्थन से चुनाव लड़सकते हैं और जीत भी सकते हैं।
शरद पवार ने भी पिछले साल खुले तौर पर गडकरी की तारीफ करते हुए उन्हें मोदी कैबिनेट में अपना पसंदीदा मंत्री बताया था। अगर बीजेपी को मुख्यमंत्री बनाने के लिए महायुति के बाहर के दलों के समर्थन की जरूरत महसूस होती है, तो पवार और ठाकरे के साथ गडकरी के सकारात्मक रिश्ते बेशकीमती साबित हो सकते हैं।
गडकरी के बातचीत का तरीका जगजाहिर है, जैसा कि 2017 के गोवा विधानसभा चुनावों में देखने को मिला था। कांग्रेस के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बावजूद, गडकरी ने बीजेपी सरकार बनाने के लिए छोटे दलों और निर्दलियों के साथ सफलतापूर्वक बातचीत की और मैकियावेलियन राजनीति में भी अपनी निपुणता दिखाई।
विवादों से भी रहा नाता
ऐसा नहीं है कि गडकरी का विवादों से नाता न रहा है, खासकर पूर्ति ग्रुप में उनके निवेश को लेकर सवाल उठते हैं, लेकिन केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री के रूप में उनके कार्यकाल की खूब प्रशंसा की जाती है।
2014 में कार्यभार संभालने के बाद से, गडकरी को मोदी सरकार में सबसे सक्षम मंत्रियों में से एक माना गया है। बीजेपी उन्हें पार्टी के सीएम चेहरे के रूप में पेश करके गडकरी की छवि का फायदा उठा सकती है।
हालांकि, महाराष्ट्र में स्थिति बदलने की गडकरी की क्षमता के बावजूद, यह सवाल बना हुआ है कि क्या वह राज्य की राजनीति में लौटने के इच्छुक होंगे, क्योंकि 2009 में बीजेपी अध्यक्ष बनने के बाद से उन्होंने खुद को महाराष्ट्र के मामलों से दूर कर लिया है।
महाराष्ट्र की मौजूदा राजनीति को देखते हुए BJP के पास यही सबसे बेहतर विकल्प है। अब देखना होगा कि क्या पार्टी इसका इस्तेमाल करना चाहेगी और क्या फडणवीस और गडकरी इसके लिए साथ आएंगे?