Eknath Shinde: ऑटो चलाने से लेकर शिवसेना चलाने तक, कौन हैं 'ठाणे का ठाकरे' कहे जाने वाले एकनाथ शिंदे
आज एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) ने उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां उनके हाथों से उनकी सरकार और पार्टी दोनों ही जाती दिखाई दे रही है
Maharashtra Political Crisis: शिवसेना (Shiv sena) का वरिष्ठ नेता और उद्धव सरकार में मंत्री एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) ने महाराष्ट्र विकास अघाड़ी (MVA) सरकार को रजनीतिक संकट (Political Crisis) के भंवर में ला खड़ा किया है। ऑटो चलाने से लेकर 'ठाणे का ठाकरे' कहलाने तक, एकनाथ शिंदे ने लंबा और उतार-चढ़ाव वाला राजनीतिक सफर तय किया है। आज उन्होंने उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां उनके हाथों से उनकी सरकार और पार्टी दोनों ही जाती दिखाई दे रही है।
शिवसेना में शामिल होने से पहले शिंदे अपनी जवानी के दिनों में सतारा के जवाली तालुका से शहर आ गए थे। वह चर्चाओं में तब आए, जब उन्होंने पार्टी के लिए लेबर यूनियन शुरुआत की थी।
1997 में सबसे पहले शिंदे ठाणे नगर निगम के लिए चुने गए थे। इसके बाद उन्हें एक पारिवारिक दुख से भी गुजरना पड़ा। उनके दो बच्चे दीपेश और शुभदा उनके गांव में डूब गए थे। हालांकि, वह धीरे-धीरे इस दुख से उभरे और 2001 में निगम में सेना के नेता बन गए। शिंदे को जल्द ही ठाणे में पार्टी के काम के लिए नियुक्त किया गया, जिससे उन्हें इस इलाके में पकड़ बनाने में मदद मिली।
2001 में एक सड़क दुर्घटना में अपने गुरु आनंद दिघे की मौत के बाद शिंदे ने पार्टी में खालीपन भर दिया। वह 2004 में विधानसभा के लिए चुने गए और पार्टी के संगठन पर अपनी पकड़ बना ली।
शिंदे का शिवसेना कब बढ़ा कद
शिंदे ने 2005 में मुंबई में पार्टी के रैंकों को मजबूत किया, जब नारायण राणे के लोगों ने शिवसैनिकों के कांग्रेस में जाने के बाद उनका मुकाबला किया। ये पहली बार था, जब शिवसेना समर्थकों को सड़कों पर चुनौती का सामना करना पड़ा।
पार्टी ने शिंदे पर भरोसा किया। शिंदे पर शिवसेना की निर्भरता तब बढ़ गई, जब शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे के भतीजे राज ठाकरे ने पार्टी छोड़ दी और 2006 में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) बनाई थी।
कहा जाता है कि कांग्रेस, जो उस समय सत्ता में थी। उसने ने शिंदे को मंत्री पद का प्रस्ताव दिया था। लेकिन उन्होंने शिवसेना छोड़ने से इनकार कर दिया था।
देवेंद्र फडणवीस से बढ़ी करीबी
शिंदे ने अपने बेटे श्रीकांत को 2014 में कल्याण से लोकसभा के लिए चुने जाने में मदद की। श्रीकांत शिंदे एक आर्थोपेडिक सर्जन हैं। जब शिवसेना ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) के साथ अपना 25 साल पुराना गठबंधन तोड़ा और अपने दम पर विधानसभा चुनाव लड़ा, तो शिंदे विपक्ष के नेता बन गए।
जब शिवसेना बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल हुई, तब वह लोक निर्माण मंत्री बने थे। माना जाता है कि शिंदे के PWD मंत्री के कार्यकाल ने उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता देवेंद्र फडणवीस के करीब ला दिया था।
जब एमवीए सरकार सत्ता में आई, तो शिंदे ने कई विधायकों को गठबंधन में लाने में भूमिका निभाई थी। माना जाता है कि उद्धव ठाकरे के मुख्यमंत्री बनने से पहले, उनकी इच्छा थी कि इस सरकार की कमान उनके हाथ में हो। हालांकि, शिंदे को अहम शहरी विकास विभाग का प्रभार दिया गया है।
उद्धव ठाकरे की कार्यशैली और सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के प्रभुत्व को देखते हुए शिंदे पार्टी के लिए सबसे बड़े संकटमोचक के रूप में उभरे।
कहा जाता है कि उनके पास चौबीसों घंटे काम करने की क्षमता है। उन्होंने अपनी पढ़ाई फिर से शुरू की और यशवंतराव चव्हाण महाराष्ट्र ओपन यूनिवर्सिटी से बीए पूरा करने में कामयाबी हासिल की। शिंदे ने मास्टर प्रोग्राम के लिए भी दाखिला लिया था।
Covid-19 महामारी के दौरान, शिंदे जमीन पर काफी एक्टिव थे। वह चिकित्सा सहायता की व्यवस्था कर रहे थे और अस्पतालों का दौरा कर रहे थे। शिवसेना मेडिकल एड यूनिट की उनकी टीम ने भी कोरोना के मरीजों को अस्पताल में बेड और ऑक्सीजन दिलाने में मदद की थी।
ऐसी खबरें थीं कि शिंदे अपने प्रभाव को कम करने और अपने विभागों में दखल देने की कोशिशों से नाराज थे। हालांकि, उनके समर्थकों का कहना था कि वह कभी भी शिवसेना नहीं छोड़ेंगे। शिंदे अपने विभागों में हस्तक्षेप से परेशान थे। 2020 में उन्होंने मुख्यमंत्री के आवास पर शक्ति प्रदर्शन भी किया था।
माना जाता है कि उद्धव ठाकरे की प्रशासन पर कमजोर पकड़ और शिवसेना के कुछ विधायकों के बीच बढ़ती दूरियों और हताशा ने शिंदे को विद्रोह करने के लिए प्रेरित किया। बताया जाता है कि शिंदे कई बार राज्य से बाहर बीजेपी के नेताओं से भी मिले। लेकिन उन्होंने दावा किया कि उन्हें खेती के लिए अपने पैतृक गांव में रहना चाहते हैं।
पिछले विद्रोहों के मुकाबले, शिंदे के विद्रोह में पर्याप्त संख्या में शिवसेना विधायक शामिल हैं। उनके खिलाफ कोई जन विरोध प्रदर्शन भी नहीं हुआ है। यह दिखाता है कि कई कार्यकर्ताओं को उनके विद्रोह के लिए सहानुभूति हो सकती है।