प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर किये गये इस Podcast को देखने के बाद एक परिचित का फोन आया, बोले मोदी जी नवरात्रि के दौरान सिर्फ पानी पीकर नौ दिन रहते हैं, हमको तो लगा कि वो फलाहार करते होंगे। उनको मैंने एक किस्सा सुनाया, जो मुझे कभी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक दिलीप देशमुख ने सुनाया था। ये बात अक्टूबर 2001 की है। ये वही महीना था जब नरेंद्र मोदी पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे, शपथ ग्रहण की तारीख थी 7 अक्टूबर। उसके 10 दिनों बाद ही 17 अक्टूबर 2001 से शारदीय नवरात्रि शुरु हुई थी। इसी नवरात्रि के दौरान मोदी गुजरात के मु्ख्यमंत्री के तौर पर पहली बार कच्छ गये।
कच्छ में उसी साल की जनवरी में वो भयावह भूकंप आया था, जिसने दस हजार से भी अधिक लोगों की जान ली थी। कच्छ में राहत- पुनर्वास के काम को गति देने में लगे थे मोदी। उसी सिलसिले में नवरात्रि के दौरान भी कच्छ के दौरे पर थे मोदी। वहां पर उनसे संघ के एक प्रचारक मिले, जो कच्छ में रह रहे थे।
प्रचारक ने उन्हें प्रसाद एक पुड़िया में दी, जो उस मंदिर से आई थी, जिसके कार्यक्रम में आने के लिए मोदी को न्यौता दिया गया था, लेकिन वो भूंकप राहत कार्यों की व्यस्तता की वजह से नहीं जा पाए थे। मोदी प्रचारक मित्र से मुलाकात के वक्त व्यस्त थे। इसलिए चुपचाप प्रसाद लिया, कुछ कहा नहीं।
अगली सुबह वो प्रचारक फिर मिलने के लिए आए, भूकंप के दिनों में दोनों साथ- साथ काफी घुमे थे। मोदी ने अपने बगल में रखे प्रसाद की पुड़िया उन्हें लौटा दी। उनके पुराने सहयोगी को आश्चर्य हुआ। पूछा, क्यों लौटा रहे हैं प्रसाद। मोदी ने जो जवाब दिया, उससे आश्चर्य में पड़ गये संघ के प्रचारक।
मोदी ने अपने पुराने सहयोगी को बताया कि मां जगदंबा की आराधना के तहत नवरात्रि के मौके पर वो जो उपवास करते हैं, उस दौरान वो सिर्फ पानी पीते हैं, और कुछ नहीं। इसलिए नवरात्रि के समय में वो मंदिर का प्रसाद भी ग्रहण नहीं कर सकते। उनके सहयोगी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा।
पता ये चला कि मोदी ने प्रचारक दिनों की शुरुआत से ही नवरात्रि के मौके पर उपवास का जो सिलसिला आरंभ किया, उसमें अमूमन पानी पर ही रहे, हद से हद कभी पानी में नींबू मिला लिया, कभी कोई अन्न नहीं ग्रहण किया। युवा दिनों में जो ये आदत पड़ी, वो 74 साल की उम्र में भी जारी है।
नवरात्रि के दौरान मोदी के उपवास में कभी कोई फलाहार नहीं होता। सिर्फ पानी, कभी थोड़ा सा नींबू उसमें निचोड़ लिया, बस इतना ही। उपवास भी साल में दो बार, चैत्र और शारदीय, दोनों ही नवरात्रि के मौके पर। और रूटीन में कोई बदलाव नहीं, काम उसी तरह। रैली, देश- विदेश के दौरे भी यथावत।
यह लेख नेटवर्क18 के ग्रुप एडिटर-कन्वर्जेंस ब्रजेश कुमार सिंह के X पोस्ट के आधार पर लिखा गया है।