बिहार के विकास में जेपी और वर्गीज की कोशिशों को किसने दिया था झटका

बिहार में भूमि सुधार का काम शुरू होते ही सत्ताधारी दल जनता पार्टी के कई विधायकों ने राज्य सरकार के खिलाफ हल्ला बोल दिया। वे विधायक या तो खुद उस इलाके के बड़े भूस्वामी थे या उनके हितों के संरक्षक थे। बिहार जनता पार्टी के विक्षुब्ध गुट के नेता के यहां उन विधायकों की बैठक हुई। उन लोगों ने तय कि कर्पूरी सरकार गिरा देंगे, फिर क्या हुआ जानने के लिए पढ़ें ये लेख

अपडेटेड Dec 26, 2022 पर 9:04 AM
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जेपी और वर्गीज मिलकर बिहार को नई दशा-दिशा देना चाहते थे लेकिन ऐसा नहीं हो पाया, जानिए क्यों?

सत्तर के दशक में जयप्रकाश नारायण ने संपादक सह समाजसेवी बीजी वर्गीज की मदद से बिहार के एक खास पिछड़े इलाके को विकसित करने की कोशिश की थी। पर, वह कोशिश भी विफल रही। तब के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर भी उस कोशिश के साथ थे। किंतु ताकतवर निहितस्वार्थी तत्वों के समक्ष वह कोशिश विफल रही। निराश बीजी वर्गीज जब बिहार छोड़ रहे थे तो उनकी आंखों में आंसू थे। हिन्दुस्तान टाइम्स और द इंडियन एक्सप्रेस के संपादक रहे वर्गीज सन 1966 से 1969 तक प्रधानमंत्री के सूचना सलाहकार भी रह चुके थे।

वर्गीज जन सरोकार की भावना से ओतप्रोत थे। उन्हें मैग्सेसे पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। वर्गीज आजीवन अपने सादा जीवन उच्च विचार के सिद्धांत पर अडिग रहे। 1927 में जन्मे वर्गीज का सन 2014 में निधन हुआ। उस घटना से यह साफ है कि वैसे सत्तासीनों के लिए भी बिहार के विकास का काम कितना कठिन काम रहा है जो सत्ताधारी नेता विकास चाहते रहे। हाल के वर्षों में बिहार का विकास जरूर हुआ है, फिर भी उतना विकास नहीं हो पा रहा है जितने की इस गरीब और उपेक्षित राज्य को जरूरत है। वजह वही है।

वर्गीज ने Times Of India से अपनी पत्रकारिता शुरू की। वह 1969 से 1975 तक हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक थे। 1982 से 1986 तक वह इंडियन एक्सप्रेस के संपादक रहे। वर्गीज को जयप्रकाश नाराण पसंद करते थे। जेपी को लगा था कि वर्गीज और कर्पूरी ठाकुर की मदद से बिहार के उस पिछड़े क्षेत्र पूर्णिया का विकास हो सकेगा। सन 1978 की बात है।तब बिहार में जनता पार्टी की सरकार थी। देश में जनता सरकार बनवाने में जेपी की मुख्य भूमिका थी।


जय प्रकाश नारायण का सपना था कि कोशी क्षेत्र में मॉडल भूमि सुधार और आम विकास का कार्यक्रम चलाया जाए ताकि वहां की गरीबी घटे। जेपी ने इस काम के लिए गांधी शांति प्रतिष्ठान से गांधीवादी बीजी वर्गीज को पटना बुलाया था। सुधार कार्यक्रम के तहत पूर्णिया के पांच प्रखंडों के भूमि रिकॉर्ड को अपडेटकरना था। हदबंदी से फाजिल घोषित जमीन का अधिग्रहण करना और उसे भूमिहीनों में वितरित करना था। साथ ही, बटाईदारों के अधिकारों को स्वीकृति दिलानी थी। इसका नाम दिया गया था 'कोशी क्रांति योजना।'

'कोशी क्रांति योजना' के तहत उन पांच प्रखंडों का चौतरफा विकास करना था। इसे कार्य रूप देने के लिए जेपी की सलाह पर कर्पूरी ठाकुर सरकार ने एक सरकारी फंड का गठन कर दिया। उसमें उपायुक्त और कई स्तरों के 119 लोक सेवक थे। वर्गीज उस सरकारी दल के सलाहकार बने। इस संबंध में जेपी के पटना स्थित आवास पर बैठक हुई थी। उसमें जेपी, मुख्यमंत्री, वर्गीज और संबंधित सरकारी अफसर मौजूद थे। जिन प्रखंडों का सर्वांगीण विकास होना था, उनमें भवानी पुर, बनमनखी, धमदाहा, बरहरा कोठी और रूपौली प्रखंड शामिल थे।

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कहां से शुरू हुई मुश्किल?

भूमि सुधार कार्यों की शुरुआत होते ही सत्ताधारी दल जनता पार्टी के कई विधायकों ने राज्य सरकार के खिलाफ हल्ला बोल दिया। वे विधायक या तो खुद उस इलाके के बड़े भूस्वामी थे या उनके हितों के संरक्षक थे। तब पूर्णिया जिले में 10 हजार ऐसे भूस्वामी थे जिनके पास सौ एकड़ या उससे अधिक जमीन थी। बिहार जनता पार्टी के विक्षुब्ध गुट के नेता के यहां उन विधायकों की बैठक हुई। उन लोगों ने तय किया कि यदि यह कार्यक्रम जारी रहा तो हम कर्पूरी सरकार को गिरा देंगे। कर्पूरी ठाकुर दबाव में आ गए। जेपी भी उन निहितस्वार्थ तत्वों के सामने लाचार हो गये। राज्य सरकार ने काम रोक दिया। कोशी क्रांति योजना अधूरी रह गयी।यानी विफल हो गयी। बीजी वर्गीज अपनी आंखों में आंसू लिए दिल्ली लौट गए।

एक घटना ये भी!

इस बीच एक और घटना हुई। पटना के एक अखबार को वर्गीज ने बिहार की भूमि समस्या पर दो किस्तों में छपने के लिए अपना एक लंबा लेख दिया था। संपादक की अनुमति से लेख की पहली किस्त छप भी गयी। पर पता नहीं क्यों दूसरी किस्त नहीं छपी। दूसरी किस्त छपवाने के लिए वर्गीज कई दिन उस अखबार के दफ्तर में गये जहां उन दिनों इन पंक्तियों का लेखक कार्यरत था। मुझे लगा कि लेख नहीं छापने का संपादक पर कहीं से जबर्दस्त दबाव था। यानी, मीडिया पर भी निहितस्वार्थियों के वर्चस्व का वह एक नमूना था।

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यदि कोशी क्रांति पर काम पूरा हो गया होता तो बिहार को पिछड़ापन से मुक्त करने की दिशा में वह मील का पत्थर साबित हो सकता था। उस कोशी क्रांति योजना के बारे में PTI ने 2 अप्रैल 1981 को एक खबर जारी की थी। उस खबर के अनुसार, 'पूर्णिया के पांच प्रखंडों में तीन साल पहले शुरू की गयी योजना भूस्वामियों और भूमिहीनों के बीच सीधा टकराव उत्पन्न कर अपने ही भार से दबी जा रही है। यहां अधिकारियों ने स्वीकार किया कि इस योजना की सफलता की उम्मीद नगण्य है।क्योंकि राजनीतिक संरक्षणप्राप्त कुछ भूस्वामी इस योजना के प्रत्येक स्तर पर अवरोध उत्पन्न कर रहे हैं।स्थानीय नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि भूमि सुधार के काम बंद नहीं किए गए तो परसबिगहा कांड की पुनरावृति हो सकती है।'

याद रहे कि मध्य बिहार के जहानाबाद जिले के परसबिगहा में भूमिस्वामियों ने बाहर से बंद कर एक मकान में आग लगा दी थी। उस घटना में मकान के भीतर 13 दलित जल मरे थे। याद रहे कि उस नरसंहार का मुख्य अभियुक्त 2014 में ही गिरफ्तार हो सका था।

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