EPS: पेंशन कांट्रिब्यूशन के लिए 15 हजार रुपये की सीमा रद्द, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, समझें क्या है इसका मतलब

देश की सबसे बड़ी अदालत ने एंप्लॉयीज को बड़ी राहत दी है

अपडेटेड Nov 04, 2022 पर 5:04 PM
अधिकतर कंपनियों के कर्मियों को एंप्लॉयीज प्रोविडेंट फंड्स एंड मिससेलेनस प्रोविजन्स एक्ट 1952 के तहत कवर किया जाता है।

EPS: देश की सबसे बड़ी अदालत ने एंप्लॉयीज को बड़ी राहत दी है। सुप्रीम कोर्ट ने आज शुक्रवार 4 नवंबर को वर्ष 2014 को एंप्लॉयीज पेंशन (एमेंडमेंट) स्कीम की वैधता को बरकरार रखा है। हालांकि कोर्ट ने पेंशन फंड में शामिल होने के लिए 15,000 रुपये मासिक वेतन की सीमा को रद्द कर दिया है।

इससे 15 हजार रुपये से अधिक मासिक वेतन वाले कर्मियों को बड़ी राहत मिली है। जिन कर्मियों ने अभी तक एंप्लॉयीज पेंशन स्कीम (EPS) योजना को जॉइन नहीं किया है, उन्हें छह महीने का अतिरिक्त समय दिया गया है ताकि वे इससे जुड़ सकें।

इस कारण कोर्ट ने दिया छह महीने का अतिरिक्त समय

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस अनिरुद्ध बोस और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ ने कहा कि जिन कर्मचारियों ने पेंशन स्कीम में शामिल होने के विकल्प का इस्तेमाल नहीं किया है, उन्हें छह महीने के भीतर ऐसा करना होगा। पीठ के मुताबिक अंतिम तारीख तक योजना में शामिल नहीं हो सके कर्मियों को एक अतिरिक्त मौका दिया जाना चाहिए क्योंकि केरल, राजस्थान और दिल्ली के उच्च न्यायालयों ने इस मामले में जो फैसला सुनाया था, उसमें स्पष्टता नहीं थी।


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15 हजार से अधिक के वेतन पर अतिरिक्त योगदान की शर्त खारिज

अधिकतर कंपनियों के कर्मियों को एंप्लॉयीज प्रोविडेंट फंड्स एंड मिससेलेनस प्रोविजन्स एक्ट 1952 के तहत कवर किया जाता है। इसके तहत कर्मी पेंशन खाते में अपने वेतन का 12 फीसदी कांट्रिब्यूट करते हैं और इतना ही योगदान कंपनी भी करती है। पहले यह कांट्रिब्यूशन 6500 रुपये के पेंशन योग्य सैलरी के हिसाब से तय होती थी जिसे 2014 में संशोधन के जरिए बढ़ाकर 15 हजार रुपये मासिक कर दिया गया।

हालांकि 15 हजार रुपये से अधिक की सैलरी होने पर भी अगर योगदान करते हैं तो 1.16 फीसदी अतिरिक्त योगदान करना होता। अब कोर्ट ने इस अतिरिक्त योगदान को खारिज कर दिया है। हालांकि कोर्ट ने कहा कि फैसले के इस हिस्से को छह महीने के लिए लागू नहीं किया जाएगा ताकि अधिकार फंड इकट्ठा कर सकें। कर्मचारी भविष्य निधि संगठन और केंद्र ने केरल, राजस्थान और दिल्ली के उच्च न्यायालयों के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसमें 2014 की योजना को रद्द कर दिया गया था।

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