Archaeological Survey of India: राम मंदिर और बाबरी मस्जिद विवाद से लेकर काशी विश्वनाथ-ज्ञानवापी मस्जिद मामला हो या संभल में मंदिर-मस्जिद विवाद, हर जगह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India- ASI) केंद्र में बना रहता है। ASI भारत की सांस्कृतिक विरासत के पुरातात्विक अनुसंधान, संरक्षण और सुरक्षा के लिए जिम्मेदार प्रमुख संगठन है। यह भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। 1861 में अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा स्थापित ASI का मुख्यालय नई दिल्ली में है। एएसआई के शुरुआती वर्षों में देश भर के ऐतिहासिक स्थलों का दस्तावेजीकरण और सर्वेक्षण करने पर ध्यान केंद्रित किया गया था।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के सर्वे से ही पता चलता है कि विवादित जगह पर पहले मंदिर था और या मस्जिद। सबसे हैरानी की बात यह है कि इस प्रक्रिया की शुरुआत में ऐतिहासिक स्ट्रक्चर्स के सर्वे के दौरान खुदाई नहीं होती है। बिना खुदाई के ही सर्वे करने वाले एक्सपर्ट ये पता करने की कोशिश करते हैं कि बहुत पहले कौन सा स्ट्रक्चर कैसा दिखता था। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर एएसआई एक्सपर्ट बिना किसी जगह पर खुदाई किए कैसे जान जाते हैं कि वहां पर क्या है। एएसआई बिना किसी पक्का सबूत के ऐतिहासिक स्ट्रक्चर्स की खुदाई नहीं करता है।
- एएसआई एक्सपर्ट साइज्मिक वेव का इस्तेमाल करते हैं। ये एक तरह की तरंग होती हैं, जो भूकंप के समय निकलती है। भूकंप से होने वाली तबाही की वजह ये तरंगें ही होती है। यह तरंगें किसी भी तरह के पदार्थ से गुजर सकती हैं। चाहे सॉलिड हो लिक्विड हो या फिर गैस।
- इसके अलावा इलेक्ट्रोमैग्नेटिक मेथड का इस्तेमाल किया जाता है। धरती से मैग्नेटिक तरंगें निकलती हैं। उन्हें मैग्नेटोमीटर के जरिए डिटेक्ट किया जाता है। अगर जमीन के अंदर सड़क या दीवार के कोई भी अवशेष मौजूद होते हैं, तो पत्थरों एवं ईंटों की वजह से उस जगह की मैग्नेटिक फील्ड में बदलाव आ जाता है।
- अन्य और आखिरी प्रमुख तकनीक का नाम है ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रेडार। इसमें मशीन से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें निकलती हैं। ये जमीन के अंदर जाती हैं। वहां तरंगें जिस हिसाब से रिफ्लेक्ट होती हैं, उस हिसाब से कंप्यूटर पर जमीन के अंदर दबे ढांचे की एक्स-रे टाइप तस्वीर बन जाती है। इस रेडार का इस्तेमाल अयोध्या मामले में हुआ था।