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Mahakumbh Mela 2025: त्रिवेणी संगम में ही क्यों करते हैं शाही स्नान? जानें पूरी डिटेल

Prayagraj Mahakumbh 2025: 13 जनवरी पौष पूर्णिमा से महाकुंभ मेले की शुरुआत हो जाएगी और 26 फरवरी महाशिवरात्रि को अंतीम शाही स्नान के साथ मेले का समापन भी हो जाएगा। देश की दो बड़ी नदियां गंगा और यमुना का जहां-जहां भी मिलन हुआ है। वहां पर तीर्थ बन गया। प्रयागराज में कुंभ और महाकुंभ के दौरान त्रिवेणी संगम के तट पर विशेष स्नान किया जाता है

MoneyControl Newsअपडेटेड Dec 08, 2024 पर 4:38 PM
Mahakumbh Mela 2025: त्रिवेणी संगम में ही क्यों करते हैं शाही स्नान? जानें पूरी डिटेल
Prayagraj Mahakumbh 2025: जनवरी में तीन और फरवरी में तीन शाही स्नान होंगे।

गंगा समेत तमाम नदियां कहीं न कहीं जाकर मिल जाती है। यानी सभी नदियों का कहीं न कहीं संगम होता है। सभी नदियों के अपने संगम होते हैं, लेकिन इन सब में त्रिवेणी संगम का बहुत अधिक महत्व है। त्रिवेणी संगम में तीन नदियां गंगा, यमुना और सरस्वती आपस में मिलती हैं। इन तीनों नदियों का मिलन प्रयागराज के संगम में होता है। प्रयागराज एक तीर्थस्थल है। हिंदू संस्कृति में गंगा और यमुना के बाद सबसे अधिक महत्व सरस्वती को दिया गया है। लेकिन प्रयागराज में सरस्वती नदी कहीं नजर नहीं आती है। ऐसे में सवाल ये है कि आखिर इसके त्रिवेणी संगम क्यों कहते हैं?

हिंदू धर्म में माना गया है कि जितने भी तीर्थस्थल हैं, वो नदियों के तट पर हैं। इसमें भी जहां तीन नदियां आपस में मिलती हैं। उस जगह का खास महत्व है। बता दें कि इस बार महाकुंभ मेले की शुरुआत 13 जनवरी 2025 से हो रही है। यह मेला 26 फरवरी 2025 महाशिवरात्रि व्रत तक चलेगा। इससे पहले साल 2013 में प्रयागराज में महाकुंभ मेला लगा था।

स्नान को क्यों कहते हैं शाही स्नान

महाकुंभ, कुंभ और अर्धकुंभ जैसै आयोजनों में साधु संत को सम्मान के साथ स्नान कराया जाता है। इसलिए ही इसे शाही स्नान कहा जाता है। महाकुंभ या कुंभ के दौरान ग्रह और नक्षत्रों की विशेष स्थिति के कारण जल चमत्कारी हो जाता है। शाही स्नान तभी किया जाता है। जब ग्रह नक्षत्र बेहद शुभ स्थिति में होते हैं। ये स्नान करने से सभी पापों का नाश होता है। आत्मा शुद्ध होकर मोक्ष प्राप्ति की ओर चली जाती है। बता दें कि, इस बार प्रयागराज में महाकुंभ के दौरान अलग-अलग अखाड़ों के साधु संत जुटने वाले हैं। प्रयागराज के संगम में गंगा और यमुना अलग दिखती हैं। लेकिन सरस्वती भी उसमें मिली हुई हैं। सरस्वती अलग नजर नहीं आती हैं। सरस्वती नदी को अदृश्य माना गया है। इसीलिए इसे त्रिवेणी कहा गया है।

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