माइक्रोप्लास्टिक पर एक रिसर्च से बड़ा खुलासा हुआ है। इसमें माइक्रोप्लास्टिक पर करीब 7000 स्टडीज पर एक विश्लेषण किया गया है। साइंस मैगजीन के मुताबिक एक रिसर्च पेपर से पता चला है कि 20 सालों से धीरे-धीरे माइक्रोप्लास्टिक जंगली जानवरों में और लोगों के शरीर में कई कण की मौजूदगी पाई गई है। माइक्रोप्लास्टिक बड़े पैमाने पर फैले हुए हैं। इस स्टडी से पता चला है कि माइक्रोप्लास्टिक खान-पान के जरिए शरीर के अंदर आसानी से आ रही है। माइक्रो प्लास्टिक के कण शरीर में तेजी से बढ़ रहे हैं। सेहत के लिए यह किसी टाइम-बम की तरह बन चुके है। यह जानलेवा साबित हो सकता है।
प्लास्टिक में करीब 10,000 तरह के केमिकल पूरी दुनिया में बिना रोकटोक मिलाए जा रहे हैं। चीन सबसे ज्यादा प्लास्टिक प्रदूषण फैला रहा है। इसके बाद इंडोनेशिया है। मानव शरीर में माइक्रो-प्लास्टिक पहुंचाने का सबसे बड़ा जरिया समुद्री मछलियां बन चुकी हैं। अनुमान है कि 2050 तक समुद्र में पहुंचे प्लास्टिक का वजन मछलियों के कुल वजन से ज्यादा होगा।
जानिए क्या है माइक्रो प्लास्टिक
प्लास्टिक के बहुत छोटे टुकड़ों को माइक्रोप्लास्टिक कहा जाता है। इनकी लंबाई 5 मिलीमीटर या उससे कम होती है। 5 मिलीमीटर से छोटे 12 से लेकर 1 लाख तक प्लास्टिक कण रोजाना शरीर में पहुंच रहे हैं। एक साल में 11,845 से 1,93,200 माइक्रो प्लास्टिक कण शरीर में पहुंचते हैं। इनका वजन 7.7 ग्राम से 287 ग्राम तक होता है।
माइक्रो प्लास्टिक की कहां से हो रही है एंट्री
कुछ उत्पादों में माइक्रोप्लास्टिक जानबूझकर मिलाए जाते हैं। जैसे कि चेहरे पर लगाए जाने वाले साबुन में माइक्रोबीड का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं बाकी के उत्पादों में प्लास्टिक के बड़े टुकड़े टूटने से माइक्रोप्लास्टिक अनजाने में पैदा हो जाती है। आसानी से समझने के लिए ये जानिए कि पॉलिस्टर की जैकेट धोने से जो उससे रेशे निकलते हैं। वो भी एक तरह से माइक्रोप्लास्टिक होते हैं। यह रेशे शरीर में आसानी से पहुंच रहे हैं। प्लास्टिक की बोतलें, बैग और अन्य पैकेजिंग सामग्री समय के साथ टूटकर माइक्रोप्लास्टिक में बदल जाती हैं। जिससे इसका शरीर के भीतर पहुंचना आसान हो जाता है। माइक्रो प्लास्टिक सेहत के लिए जानलेवा है।
माइक्रोप्लास्टिक की अहम वजह सिंगल यूज प्लास्टिक है। करीब 98 देशों में 2022 तक इन पर आंशिक या पूरी तरह से पाबंदी लग चुकी है। यह तभी संभव है, जब प्लास्टिक का उपयोग घटेगा।