बढ़ती उम्र के साथ नौकरियों पर छाए संकट के बादल, कंपनियां यंगिस्तान पर लगा रही हैं दांव

पिछले कुछ सालों से प्राइवेट कंपनियों ने अपने हायरिंग पैटर्न में काफी बदलाव किया है। जिससे 50 साल की उम्र पार कर चुके लोगों को नौकरी तलाशने में कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है

अपडेटेड Sep 04, 2022 पर 11:38 AM
कोरोना के बाद नौकरियों के ट्रेंड बहुत तेजी से बदलाव आया है।

नौकरी की तलाश करना हमेशा एक कठिन काम रहा है। इस पर भी अगर उम्र अधिक है तो लगबग कई कंपनियों के दरवाजे बंद हो जाते हैं। सरकारी नौकरी में आमतौर पर 58,60, 62 साल की उम्र में रिटायर हो जाते हैं। लेकिन अगर प्राइवेट कंपनियों में हैं। उम्र 50 साल से अधिक हो गई है तो फिर नौकरी ढूंढ़ने में कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। अब तो कंपनियां भी हायरिंग के वक्त अनुभव के मुकाबले उम्र को तरजीह दे रही हैं।

कोरोना महामारी के बाद कई कंपनियों ने अपनी हायरिंग पॉलिसी में बड़ा बदलाव किया है। अब तो हालात यहां तक हो चुके हैं कि 50 साल से अधिक उम्र के लोगों को कंपनियां कॉल तक नहीं करती हैं। यानी उनको इंटरव्यू में भी नहीं बुलाया जाता है।

किस वजह से खारिज हो रहे हैं उम्रदारज लोग?


मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले कुछ सालों में प्राइवेट कंपनियों ने यंगिस्तान पर बड़ा भरोसा जताया है। कंपनियों का मानना है कि अगर कैंडिडेट की उम्र ज्यादा है, अनुभव भी ज्यादा है। ऐसे में वो पुराने खयालों वाले हो सकते हैं। नए लोगों में नई सोच रहती है। शायद यही वजह है कि अगर हम पिछले कुछ सालों का डेटा खंगाले तो पता चलेगा कि 21 साल से लेकर 28 साल के लोगों की हायरिंग ज्यादा हुई है। जबकि 28-50 साल की तक के लोगों की संख्या में कमी आई है। कुल मिलाकर लगता है कि 50 साल से ज्यादा उम्र के लोगों को तो बाहर का ही रास्ता दिखा दिया गया है।

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लगभग सभी सेक्टरों ने अपनाया एक ही रवैया

अगर मेन्युफेक्चिरिंग सेक्टर को छोड़ दें तो बाकी सभी सेक्टर्स में 50 के आसपास वाली उम्र के लोगों के लिए दरवाजे लगातार बंद होते जा रहे हैं। FMCG, फार्मा (Pharma), बैंकिंग और वित्त (Banking & Finance), गैर-बैंकिंग वित्त (Non-Banking Finance), और जीवन बीमा (Life Insurance) जैसे सभी सेक्टर्स में युवाओं को तरजीह दी जा रह है।

देश में नहीं है कानून

सबसे बड़ी बात ये है कि भारत में इसे भेदभाव को रोकने के लिए कोई कानून नहीं है। वहीं कुछ पश्चिमी देशों में इस पर कानून बन चुके हैं। हिन्दुस्तान में छपी एक खबर के मुताबिक, कई पश्चिमी देशों में इसकी निंदा की जाती है। एक घटना का जिक्र करते हुए कहा गया है कि एक मशहूर FMCG कंपनी को CEO की तलाश थी। इसमें कम उम्र के लोगों को प्राथमिकता देने की बात कही गई थी। लेकिन कंपनी ने एक 53 साल के शख्स को सेलेक्ट किया। उन्होंने 2 साल के भीतर ही अपने अनुभव के दम पर कंपनी की तकदीर बदल दी। कुल मिलाकर कहने का मतलब ये हुआ कि अनुभव हमेशा काम आता है।

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