Shailaja Paik: दलित महिलाओं पर रिसर्च और कई किताब लिखने वाली भारतीय-अमेरिकी प्रोफेसर शैलजा पाइक (Who is Shailaja Paik) को मैकआर्थर फाउंडेशन से 800,000 डॉलर का 'जीनियस ग्रांट' मिला है। मैकआर्थर फाउंडेशन (MacArthur Foundation) हर साल असाधारण उपलब्धियों या क्षमता वाले लोगों को यह पुरस्कार देता है। शैलजा पाइक $800000 की प्रतिष्ठित 'जीनियस ग्रांट' कहे जाने वाले 'मैकआर्थर फेलोशिप (MacArthur Fellowship)' पाने वाली पहली भारतीय दलित महिला बन गई हैं। पुणे के यरवदा झुग्गी बस्ती में अपने माता-पिता और तीन बहनों के साथ टिन के डिब्बे में पली-बढ़ी प्रोफेसर शैलजा पाइक ने घातक जातिगत पूर्वाग्रहों से लड़ाई लड़ी।
महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के जिस गांव से उनका परिवार 1990 में पलायन कर गया था, वहां दलित लोगों को नियमित रूप से सार्वजनिक ट्यूबवेल और नलों पर दूर खड़े होने के लिए मजबूर किया जाता था ताकि वे जाति-कुलीनों के बर्तनों को न छूएं। एक बार जब वे एक उच्च जाति के परिवार से मिलने गई, तो उनकी दादी और उन्हें चाय के कप दिए गए और मिट्टी के फर्श पर बैठने के लिए कहा गया। जबकि उच्च जाति की महिला एक कुर्सी पर बैठी थी।
पाइक अब अमेरिका के सिनसिनाटी विश्वविद्यालय (University of Cincinnati) में इतिहास की प्रोफेसर हैं। उनको मंगलवार को 2024 के लिए 22 मैकआर्थर फेलो में से एक नामित किया गया। उन्होंने विश्वविद्यालय की वेबसाइट से कहा, "मुझे यकीन नहीं था कि मैं सही सुन रही हूं, लेकिन मैंने अपना आपा नहीं खोया... मैं बहुत खुश थी।" शैलजा को मिलने वाली यह छात्रवृत्ति आधुनिक भारत में दलित रिसर्च, जेंडर और कामुकता की व्याख्या करने पर केंद्रित है। उनके काम ने दलित नारीवादी विचार के अध्ययन को व्यापक और गहरा किया है।
800,000 डॉलर का मिला पुरस्कार
'जीनियस ग्रांट' के नाम से मशहूर मैकआर्थर फेलोशिप एक 'बिना शर्त वाला' पुरस्कार है जो लोगों की मदद के लिए दिया जाता है, न कि किसी परियोजनाओं के लिए...। प्रत्येक फेलोशिप के तहत प्राप्तकर्ता को 800,000 डॉलर का पुरस्कार दिया जाता है, जो पांच वर्षों में समान तिमाही किश्तों में दिया जाता है। व्यापक रूप से अकादमिक जगत में सबसे कठिन और सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक माने जाने वाले इस फेलोशिप ने दलित महिलाओं के जीवन के माध्यम से जाति, जेंडर और कामुकता की खोज करने वाले पाइक के ऐतिहासिक कार्य को मान्यता दी।
मैकआर्थर फाउंडेशन फेलोशिप को 'नो-स्ट्रिंग्स अटैच्ड' अनुदान कहा जाता है। यह हर पांच वर्ष में उन रचनात्मक कलाकारों, विद्वानों और शोधकर्ताओं को दिया जाता है जिनका काम ज्ञान सृजन के इतिहास में महत्वपूर्ण अंतराल को भरता है।
पाइक ने फेलोशिप को बताया, "असमानताओं और लोगों के अमानवीयकरण का अध्ययन करके हम सार्वभौमिक मानवता और सार्वभौमिक मुक्ति के बारे में सोचने के लिए नए तरीके प्रदान कर सकते हैं।" यह पुरस्कार मिलने के बाद पुणे में उसका परिवार बहुत खुश है। शैलजा की मां सरिता पाइक ने हिंदुस्तान टाइम्स से कहा, "मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरी बेटी अपने करियर में इन ऊंचाइयों को छुएगी। लेकिन यह उसकी कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प है जिसने उसे वह हासिल करने में मदद की जो उसने हासिल किया है। उसकी निरंतरता और कड़ी मेहनत को देखते हुए यह भगवान की इच्छा है।"
पाइक ने 1994 और 1996 में क्रमशः पुणे विश्वविद्यालय से मास्टर और पोस्ट ग्रेजुएट की डिग्री प्राप्त की। फिर 2007 में वारविक विश्वविद्यालय से PhD की। उन्होंने यूनियन कॉलेज (2008-2010) में इतिहास की विजिटिंग असिस्टेंट प्रोफेसर और येल विश्वविद्यालय (2012-2013) में दक्षिण एशियाई इतिहास की पोस्टडॉक्टरल एसोसिएट और विजिटिंग असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में काम किया। 2010 से पाइक सिनसिनाटी विश्वविद्यालय से जुड़ी हैं, जहां वे वर्तमान में इतिहास की चार्ल्स फेल्प्स टैफ्ट प्रतिष्ठित रिसर्च प्रोफेसर हैं।
उनकी पहली किताब आधुनिक भारत में दलित महिलाओं की शिक्षा: दोहरा भेदभाव (Dalit Women’s Education in Modern India: Double Discrimination), 2014 में प्रकाशित हुई। इसमें महाराष्ट्र में दलित महिलाओं के संघर्ष का वर्णन किया गया। जबकि उनकी दूसरी किताब, जाति की अश्लीलता: आधुनिक भारत में दलित, कामुकता और मानवता (The Vulgarity of Caste: Dalits, Sexuality, and Humanity in Modern India), महाराष्ट्र के तमाशा कलाकारों के बारे में बात करती है, जिनमें से कई दलित महिलाएं हैं।