लाखों खर्च किए, एजेंट से धोखा खाया और जंजीरों में बंध कर घर लौटे! US से डिपोर्ट किए गए भारतीयों का दर्द
पंजाब के सुखपाल सिंह और हरविंदर सिंह की भी कुछ ऐसी ही कहानी। सिंह ने कहा कि अगर एजेंट ने उन्हें ऐसे किसी मुद्दे के बारे में चेतावनी दी होती, तो वह बिल्कुल भी अमेरिका नहीं जाते। उन्होंने बताया कि एजेंट डिपोर्ट होने के बाद उनका फोन भी नहीं उठा रहा था। होशियारपुर के हरविंदर सिंह उन लोगों में से थे, जिन्हें डिपोर्ट किया गया था
MoneyControl News
अपडेटेड Feb 07, 2025 पर 5:23 PM
लाखों खर्च किए, एजेंट से धोखा खाया और जंजीरों बंद कर घर लौटे! US से डिपोर्ट किए गए भारतीयों का दर्द
अमेरिका से 104 लोगों को डिपोर्ट कर वापस भारत भेजे जाने के कुछ दिनों बाद भी, ऐसी कहानियां सामने आ रही हैं कि कैसे इनमें से ज्यादातर भारतीय पैसा ऐंठना वाले एजेंट के शिकार बन गए। पंजाब के सुखपाल सिंह और हरविंदर सिंह की भी कुछ ऐसी ही कहानी। सुखपाल सिंह उन लोगों में शामिल थे, जो मंगलवार को अमेरिकी वायु सेना के C-17 ग्लोबमास्टर विमान से अमेरिका से लौटे थे। पंजाब के टांडा के रहने वाले सुखपाल ने कहा, 22 जनवरी को अमेरिका जाने से पहले वह इटली में थे।
CNN-News18 से बात करते हुए, सिंह ने बताया कि कैसे इटली में एक एजेंट ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे कानूनी रास्ता अपनाएंगे और उनसे अमेरिका में उतरने पर वर्क वीजा लेने के लिए कहा। लेकिन उन्हें ऐसी उम्मीद नहीं थी कि उनके साथ ऐसा कुछ हो जाएगा, क्योंकि एजेंट ने उन्हें बताया था कि वे हवाई रास्ते से अमेरिका जाएंगे। उन्होंने कहा, ''हमें मैक्सिको से अमेरिका में एंटर कराया गया।''
सिंह ने कहा कि अगर एजेंट ने उन्हें ऐसे किसी मुद्दे के बारे में चेतावनी दी होती, तो वह बिल्कुल भी अमेरिका नहीं जाते। उन्होंने बताया कि एजेंट डिपोर्ट होने के बाद उनका फोन भी नहीं उठा रहा था।
सिंह भारत से इटली में काम करने के लिए गए था और वहां एक रेस्टोरेंट में काम कर रहे थे। उन्होंने कहा कि उनके परिवार को नहीं पता था कि वह इटली से अमेरिका जा रहे हैं। उन्होंने अपने परिवार के बेहतर भविष्य के लिए यह कदम उठाने का फैसला किया।
सिंह ने कहा, “इटली में मेरे दो और दोस्त थे और हम सभी ने गिल सरनेम वाले इस एजेंट के जरिए अमेरिका जाने का फैसला किया। अपने परिवारों के भविष्य के लिए, हम सभी अमेरिका के लिए रवाना हुए।”
सिंह ने कहा कि इटली से अमेरिका आने के लिए उन्होंने 22 लाख रुपए खर्च किए। उन्होंने कहा, "मैंने एक दोस्त से मदद ली और इटली में काम करते हुए, जो भी पैसा कमाया था, वो भी उसी में लगा दिया।"
यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने अमेरिका में शरण मांगी थी, तो सिंह ने कहा, "हमसे एजेंट ने कहा था कि जब अधिकारी पूछताछ करे तो हम उनसे वर्क परमिट मांगे।" सिंह ने कहा कि अमेरिका पहुंचने पर उन्हें सीधे एक कैंप में ले जाया गया और न कुछ बताया गया या न पूछा गया।
उन्होंने अपनी आपबीती बताते हुए कहा, “फिर हमें बताया गया कि हमें रिहा किया जा रहा है और हम सभी ने राहत महसूस की। लेकिन रिहाई के नाम पर हमें जंजीरों से बांधकर एक विमान में डाल दिया गया और उन्होंने हमें यह नहीं बताया कि वे हमें कहां ले जा रहे हैं। वे हमें भारत ले आए। हमारे फोन ले लिए गए और यहां उतरने पर उन्हें रीसेट कर दिया गया।"
सिंह ने बताया कि कैसे इस तरह से डिपोर्ट होने पर उन्हें और कई दूसरे लोगों को सदमे में डाल दिया। उन्होंने बताया, “मेरा एक दोस्त अपना घर छोड़ चुका है और वापस नहीं लौटना चाहता। वह सदमे में है और उदास है।''
सिंह ने कहा, हालांकि उसके पास इटली के लिए वैलिड वर्क परमिट है, फिर भी वह वापस जाने से डर रहा है। उन्होंने कहा, "मैं यहीं भारत में ही कोई काम ढूंढने की कोशिश करूंगा।"
45 लाख रुपए देकर भी डंकी रूट अपनाने को मजबूर
पंजाब के होशियारपुर के हरविंदर सिंह उन लोगों में से थे, जिन्हें डिपोर्ट किया गया था। पेशे से किसान, 45 साल के सिंह ने कहा कि उन्होंने एक अच्छी जिंदगी की तलाश में भारत से अमेरिका जाने के लिए 45 लाख रुपए खर्च किए। सिंह ने जून में भारत छोड़ दिया और छह महीने बाद 15 जनवरी को अमेरिका पहुंचे।
सिंह भी एक एजेंट के झांसे में आ गए, जिसने उन्हें आश्वासन दिया था कि उन्हें कानूनी रास्ते से वीजा पर अमेरिका भेजा जाएगा।
उन्होंने कहा, “एजेंट ने मुझसे कहा कि हम पहले ब्राजील जाएंगे और वहां से वैलिड वीजा पर निकारागुआ जाएंगे। जब मैं ब्राजील पहुंचा तो मैंने एजेंट से आगे के रास्ते के बारे में पूछा और फिर उसने मुझे डंकी रूट पर भेज दिया। मैं आखिरकार 5-6 महीने की यात्रा के बाद मैक्सिको पहुंच गया, जहां से मैंने 15 जनवरी को सीमा पार की।''
उन्होंने कहा कि मेक्सिको में उनका भी मन बदल गया और उन्होंने एजेंट से उन्हें वापस भेजने के लिए कहा, जिससे एजेंट ने इनकार कर दिया।
हरविंदर सिंह ने अपनी आपबीती बताते हुए कहा, “अमेरिका पहुंचने पर, उन्होंने हमें 10-15 दिनों तक बॉर्डर पर ही रखा और फिर हमें बताया कि वे हमें कैंप में ले जा रहे हैं। उन्होंने हमें जंजीरों से बांध दिया और हमें बिना कुछ बताए एक विमान में बिठा दिया और हम वापस भारत आ गए।"