उत्तराखंड में UCC लागू होने के बाद बदल जाएंगे विवाह, तलाक, उत्तराधिकार के नियम
उत्तराखंड आजादी के बाद यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता लागू करने वाला पहला राज्य बन जाएगा। हालांकि, गोवा में पुर्तगालों के शासन काल से ही यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू है। यूनिफॉर्म सिविल कोड भारत के सभी धार्मिक समुदायों पर लागू होगा। शादी, उत्तराधिकार, तलाक, गुजारा-भत्ता आदि मामलों में यह कोड अमल में आएगा
इसका मकसद बहुविवाह की प्रथा पर रोक लगाना और तमाम धार्मिक समुदायों में विवाह को लेकर एक कानून को लागू करना है।
उत्तराखंड आजादी के बाद यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता लागू करने वाला पहला राज्य बन जाएगा। हालांकि, गोवा में पुर्तगालों के शासन काल से ही यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू है। यूनिफॉर्म सिविल कोड भारत के सभी धार्मिक समुदायों पर लागू होगा। शादी, उत्तराधिकार, तलाक, गुजारा-भत्ता आदि मामलों में यह कोड अमल में आएगा।
इस मामल में 5 सदस्यों वाली कमेटी द्वारा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी (Pushkar Singh Dhami) को सौंपी गई रिपोर्ट में जनजातीय समुदाय को इस कानून के दायरे से बाहर रखने का सुझाव दिया गया है। इसका मकसद बहुविवाह की प्रथा पर रोक लगाना और तमाम धार्मिक समुदायों में विवाह को लेकर एक कानून को लागू करने की बात है।
इसके अलावा, हलाला, तीन तलाक जैसे मुस्लिम पर्सनल कानून को अपराध माना जाएगा। यूनिफॉर्म सिविल कोड लिव-इन रिलेशनशिप को भी रेगुलेट कर सकता है। उत्तराखंड विधानसभा द्वारा इसके फाइनल ड्राफ्ट को मंजूरी दिए जाने के बाद यह गुजरात और असम जैसे बाकी राज्यों के लिए भी मॉडल की तरह काम आ सकता है।
पर्सनल कानूनों पर UCC का असर
हिंदू समुदाय: हिंदू विवाद अधिनियम (1955) और हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956) को खत्म कर इसे यूनिफॉर्म सिविल कोड के दायरे में शामिल कर लिया जाएगा। इससे विवाह, तलाक, उत्तराधिकार आदि नियमों में एकरूपता सुनिश्चित हो सकेगी।
उत्तराधिकार कानून: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम (1956) के तहत मृतक पत्नी का असली वारिस पति का परिवार ही माना जाता है। इस कानून में पैतृक और हासिल की गई प्रॉपर्टी के बीच भी अंतर बताया गया है। यूनिफॉर्म सिविल कोड के तहत कानूनी वारिस और प्रॉपर्टी हासिल करने से जुड़े प्रावधान भी बदल जाएंगे।
गोद लेना: यूनिफॉर्म सिविल कोड से इस मामले में भी एकरूपता आएगी और जिन समुदायों को फिलहाल कानूनी तौर पर बच्चा गोद लेने की अनुमति नहीं है, उन्हें यह विकल्प मिल सकता है। फिलहाल, हिंदू दत्तक और गुजारा भत्ता कानून (1956) सिर्फ हिंदू, जैन, सिख और बौद्ध धर्म के लोगों पर लागू होता है।
हिंदू अविभाजित परिवार: हिंदू अविभाजित परिवार एक कानूनी इकाई है, जिसका अलग पैन कार्ड होता है और यह इकाई शेयर और म्यूचुअल फंडों में निवेश कर सकती है। अगर सरकार इस इकाई के लिए टैक्स, इंश्योरेंस और इनवेस्टमेंट में छूट के प्रावधान को खत्म कर देती है, तो इसका असर हिंदू परिवारों पर देखने को मिल सकता है।
मुस्लिम समुदाय: यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू करने पर कॉन्ट्रैक्ट मैरेज (मुताह), निकाह हलाला, बहुविवाह आदि प्रभावी नहीं रहेंगे। यहां तक कि शरीयत कानून के तहत शादी के लिए तय न्यूनतम उम्र में भी बदलाव किया जाएगा।
गोद लेना: फिलहाल, मुसलमान समुदाय का कोई व्यक्ति किसी बच्चे को गोद नहीं ले सकता, लेकिन वह 'काफिल' बन सकता है और उसकी परवरिश और गुजारे-भत्ते का इंतजाम कर सकता है।
बहुविवाह: फिलहाल, मुसलमान पुरुष को एक साथ महिलाओं के साथ शादी करने की इजाजत है, लेकिन इस समुदाय की महिलाएं ऐसा नहीं कर सकती हैं। हालांकि, यूनिफॉर्म सिविल कोड में मुसलमान पुरुषो को बहुविवाह का अधिकार खत्म हो जाएगा।
तलाक और अलगाव: यूनिफॉर्म सिविल कोड में ऐसे स्वीकार्य तौर-तरीके पेश किए जाएंगे, जहां मुसलमान महिलाएं और पुरुष अपने विवाद को खत्म कर सकें। यह महिला और पुरुष दोनों के अधिकारों के बीच संतुलन सुनिश्चित करेगा।
ईसाई विवाह: फिलहाल कैथोलिक नियमों के मुताबिक ईसाई समुदाय में विवाद को स्थायी माना जाता है, जबकि कुछ इसे कॉन्ट्रैक्ट भी मानते हैं। यूनिफॉर्म सिविल कोड के जरिेय इस मामले में भी एकरूपता आएगी।
तलाक: कैथोलिक कानून में तलाक का प्रावधान नहीं है। हालांकि, ईसाई भारतीय तलाक कानून के तहत तलाक की अर्जी दायर कर सकते हैं। यूनिफॉर्म सिविल कोड तलाक से जुड़े नियमों और प्रक्रियाओं में एकरूपता लाएगा।
उत्तराधिकार: उत्तराधिकार कानून (1925) ईसाई माताओं को अपने मृत बच्चों की प्रॉपर्टी को हासिल करने का अधिकार नहीं देता है। यूनिफॉर्म सिविल कोड के तहत यह नियम बदल जाएगा।
सिख समुदाय: सिखों की शादी से जुड़े कानूनी प्रावधान का आधार आनंद विवाह कानून 1909 है। हालांकि, इसमें तलाक का कोई प्रावधान नहीं है। अगर यूनिफॉर्म कोड लागू किया जाता है, तो तलाक का कॉमन कानून सिख समेत सभी समुदाय पर लागू होगा।
पारसी समुदाय: यूनिफॉर्म सिविल कोड पारसी समुदाय के भीतर गोद लेने से जुड़े कानून को प्रभावित करेगा। पारसी समुदाय फिलहाल दत्तक पुत्र-पुत्रियों के अधिकारों को मान्यता नहीं देता है और उनके पास सीमित अधिकार होते हैं। यूनिफॉर्म सिविल कोड में इन असमानताओं को दूर किया जा सकता है।
उत्तराधिकार: अगर कोई पारसी महिला अपने समुदाय के बाहर विवाह करती है, तो उसके बच्चों को पारसी वसीयतनामे के तहत प्रॉपर्टी हासिल करने का अधिकार नहीं होगा। यूनिफॉर्म सिविल कोड के तहत यह नियम बदल जाएगा।