LIC के आईपीओ में बोली लगाने से विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) खुद को रोक नहीं सके। उन्होंने इश्यू बंद होने से ठीक पहले के कुछ घंटों में जमकर बोली लगाई। पिछले कुछ समय से फॉरेन इनवेस्टर्स इंडियन मार्केट में बिकवाली कर रहे हैं। अमेरिका में इंटरेस्ट रेट बढ़ने से इंडिया सहित उभरते बाजारों का आकर्षण घटा है। उधर, क्राइसिस की वजह से अनिश्चितता बढ़ गई है।
फॉरेन इनवेस्टर्स ने संस्थागत खरीदारों के लिए रिजर्व हिस्से के 61 फीसदी तक बोली लगाई। यह कैटेगरी करीब तीन गुना सब्सक्राइब हुई है। एलआईसी का आईपीओ 4 मई को खुला था। 9 मई यानी सोमवार को यह बंद हो गया। सरकार इस आईपीओ के जरिए एलआईसी में अपनी 3.5 फीसदी हिस्सेदारी बेच रही है।
इस आईपीओ में एंकर इनवेस्टर्स के लिए रिजर्व शेयरों के लिए कई विदेशी सॉवरेन फंडों ने दिलचस्पी दिखाई। लेकिन, इस कैटेगरी में भी ज्यादा इनवेस्ट घरेलू म्यूचुअल फंडों ने किया। यह बदलते ट्रेंड का संकेत हो सकता है। एंकर पोर्शन में बोली लगाने वाले विदेशी फंडों में नार्वे और सिंगापुर के सॉवरेन फंड शामिल थे।
फाइनेंस मिनिस्ट्री में डिसइनवेस्टमेंट डिपार्टमेंट के सेक्रेटरी तुहिन कांत पांडेय ने कहा, "यह डोमेस्टिक फंडों की क्षमता को दिखाता है। हम विदेशी फंडों पर निर्भर रहे बगैर अपने कैपिटल मार्केट्स को चला सकते हैं। हालांकि, इंडिया में उनका स्वागत है।"
शुरुआत में एलआईसी के आईपीओ की तुलना सऊदी अरब के अरामको से की जा रही थी। हालांकि, 29.4 अरब डॉलर के अरामको के आईपीओ की तुलना इसका आकार बहुत छोटा था। लेकिन, इसमें डोमेस्टिक इनवेस्टर्स ने खूब दिलचस्पी दिखाई।
एलआईसी ने आईपीओ का प्रचार करना इस साल जनवरी से ही शुरू कर दिया था। वह अखबारों में पूरे पेज का विज्ञापन दे रही थी। दरअसल, वह रिटेल इनवेस्टर्स के बीच शेयरों में निवेश के बढ़ते क्रेज का फायदा उठाना चाहती थी।
सरकार ने यूक्रेन क्राइसिस की वजह से एलआईसी के आईपीओ का आकार करीब 60 फीसदी तक घटा दिया था। उसने एलआईसी की वैल्यूएशन भी कम कर दी थी। किम इंग सिक्योरिटीज प्राइवेट के जिगर शाह ने कहा, "एलआईसी न सिर्फ सबसे बड़ी इंश्योरेंस कंपनी है बल्कि इंडिया में सबसे बड़ी इनवेस्टर भी है। एक तरह से यह देश की ग्रोथ की प्रतिनिधि है। सरकार ने आईपीओ में शेयर की कीमत बहुत सोचसमझकर रखी थी।"
उन्होंने कहा कि कीमत अट्रैक्टिव होने से रिटले इनवेस्टर्स ने इस इश्यू में खूब दिलचस्पी दिखाई। अगर कीमत अट्रैक्टिव नहीं होती तो इस आईपीओ का पूरी तरह से सब्सक्राइब होना मुश्किल हो जाता। इसकी वजह यह है कि अभी वैश्विक स्तर पर बहुत अनिश्चितता की स्थिति है।