क्या इस लोकसभा चुनाव में 'छोटे चौधरी' को बागपत पहनाएगा ताज, जयंत के पक्ष में दिख रही हवा को अपनी तरफ मोड़ पाएंगे अखिलेश?
Lok Sabha Elections 2024: RLD के प्रवक्ता अनिल दुबे कहते हैं कि इस बार पूरा बागपत छोटे चौधरी के साथ खड़ा है। वहां पर चुनाव एकतरफा होने जा रहा है। इतना साफ है कि बागपत से NDA के साथ मिलकर, जो भी मैदान में उतरता उसके लिए चुनावी लड़ाई थोड़ा आसान ही होती। बागपत के लोग जयंत चौधरी को 'छोटे चौधरी' कह कर पुकारते हैं और उनके प्रति लोगों का सम्मान भी है
Lok Sabha Elections 2024: बागपत में जयंत चौधरी के पक्ष में दिख रही हवा को अपनी तरफ मोड़ पाएंगे अखिलेश?
Lok Sabha Elections 2024: बागपत (Baghpat) लोकसभा सीट कौरव नरेश धृतराष्ट्र से श्री कृष्ण ने शांति दूत के रूप में जिन पांच गांवों को पांडवों के लिए मांगा था, उनमें से बागपत भी एक था। वास्तव में बागपत का असली नाम 'व्याघ्रप्रस्थ' था। क्योंकि यहां पर कभी बाघों का निवास हुआ करता था। राजधानी दिल्ली से नजदीक होने के कारण बागपत का जलवा बुलंद रहता है। वास्तव में पहले यह मेरठ का हिस्सा हुआ करता था, लेकिन 1997 में बागपत एक नया जिला बना गया। पिछले लोकसभा चुनाव में जब बागपत का हाल-चाल जानने के लिए बस पर सवार हुआ, तो मेरठ में ट्यूशन पढ़ने आए छात्रों ने सलाह दी कि आप बागपत आए हैं, तो यहां की बालूशाही जरुर खा कर जाइएगा।
बालूशाही क्यों? उन छात्रों ने बताया की बागपत की बालूशाही पूरी देश में प्रसिद्ध है। विदेश तक भेजी जाती है। यमुना के किनारे बसे जिला बागपत में संपन्न किसान भी हैं और यहां खेती मुख्य व्यवसाय है। बागपत में पुरा महादेव मंदिर, मनसा देवी, वाल्मीकि आश्रम है, जहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। यहां पर बरनावा कस्बा है, जिसका नाम पहले 'वर्णावत' था। वर्णावत का नाम महाभारत में कई बार आया है। जहां पर दुर्योधन ने लाक्षग्रह का बनवाया किया, था जिससे पांडव उसमें जल कर भस्म हो जाए। लेकिन पांडव बच गए।
चौधरी चरण सिंह का क्षेत्र रहा है बागपत
वास्तव में हस्तिनापुर से लेकर दिल्ली तक पांडवों और कौरवों के इतिहास से भरा पड़ा हैं। इस संबंध में तमाम कहानियां हैं। यह क्षेत्र चौधरी चरण सिंह के नाम से भी जाना जाता है। इंदिरा गांधी के तमाम प्रयास के बावजूद चौधरी चरण सिंह को चुनाव में नहीं हराया जा सका।
चौधरी चरण सिंह पहले उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय थे, लेकिन 1977 में वह बागपत लोकसभा से ही चुनाव जीते और फिर 80 और 84 का चुनाव भी जीते। लेकिन चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद इस क्षेत्र पर किसी का एकाधिकार नहीं रहा। इस क्षेत्र की राजनीतिक स्थितियों में बदलाव कैसे आया इसकी एक अलग कहानी है।
चरण सिंह के व्यक्तित्व में क्या जादू था कि सिर्फ बागपत ही नहीं बल्कि पूरा प्रदेश उनके साथ खड़ा था। पिछले दिनों मोदी सरकार ने चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न पुरस्कार दिया है और इसके बाद पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश का राजनीतिक परिदृश्य ही बदल गया। स्थितियों में भारी बदलाव आया है।
चौधरी चरण सिंह के पोते और अजित सिंह के बेटे जयंत चौधरी अब NDA के साथ चले गए हैं। इसलिए इस क्षेत्र की राजनीतिक कहानी और भी बदल गई है। लेकिन इस बार लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections 2024) में बागपत में क्या होगा? NDA के साथ आने के बाद क्या जयंत चौधरी एक बार फिर बागपत सीट पर कब्जा कर लेंगे?
यह दिलचस्प तथ्य है कि जो सीट चौधरी चरण सिंह के लिए बहुत ही आसान थी, वही उनके बेटे और पोते के लिए मुश्किल हो गई। लेकिन RLD के एक नेता कहते हैं कि इस बार बागपत से RLD के टिकट पर जो भी खड़ा होगा वह भारी मतों से जीतेगा। RLD के समर्थक कहते हैं कि जयंत चौधरी ने इस बार चुनावी जमीन मजबूती से तैयार की है और वह पिछले कई महीनों से पूरे पश्चिम उत्तर प्रदेश के गांव-गांव तक गए हैं। इसका असर चुनाव में दिखेगा।
बागपत से किस पर दांव लगाएगी RLD?
लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections 2024) में इस सीट से कौन खड़ा होगा? RLD नेताओं का दावा है अभी यह तय नहीं है। फिलहाल यहां पर चर्चाओं का बाजार गर्म है कि जयंत चौधरी इस बार बागपत से चुनाव नही लड़ेंगे। क्योंकि जयंत चौधरी राज्यसभा के सदस्य हैं और उनका चार साल का पूरा कार्यकाल अभी बाकी है। इसलिए बागपत से कौन लड़ेगा कौन नहीं लड़ेगा, इसको लेकर चर्चाएं चल रही हैं।
जानकार बताते हैं कि बागपत से जयंत चौधरी की पत्नी चारु चौधरी चुनाव लड़ सकती हैं। चारु चौधरी की राजनीति में दिलचस्पी है। वास्तव में जयंत परिवार से जाट मतदाताओं का भारी लगाव है। इसीलिए जयंत अपने परिवार से ही किसी को मैदान में उतारेंगे।
RLD के कार्यकर्ता कहते हैं कि जयंत के परिवार का कोई उतरेगा, तो इसका असर कहीं ज्यादा होगा। क्योंकि जयंत से लोगों का लगाव है। यह लगाव इतना गहरा है कि वे उन्हें 'घर का छोरा' मानते हैं।
जानकार बताते हैं कि जब चौधरी चरण सिंह नाराज हो जाते थे, तो बागपत के चौधरी उन्हें मनाने जाते थे और और जब बागपत के उनके समर्थक नाराज हो जाते थे, तो चौधरी चरण सिंह उनकी मान मनौव्वल करते थे।
'इस बार बागपत छोटे चौधरी के साथ खड़ा है'
RLD के प्रवक्ता अनिल दुबे कहते हैं कि इस बार पूरा बागपत छोटे चौधरी के साथ खड़ा है। वहां पर चुनाव एकतरफा होने जा रहा है। इतना साफ है कि बागपत से NDA के साथ मिलकर, जो भी मैदान में उतरता उसके लिए चुनावी लड़ाई थोड़ा आसान ही होती।
समाजवादी पार्टी से कौन उतरेगा? ये अभी तक तय नहीं है। क्योंकि सपा के लिए यहां मजबूत प्रत्याशी ढूंढ पाना थोड़ा मुश्किल है, जहां तक जयंत का मामला है, उनके प्रति इस क्षेत्र में एक सहानुभूति है। अजित सिंह अब इस दुनिया में है नहीं हैं और उनका लगातार दो बार चुनाव हारना उनके समर्थकों को अखरा जरूर है।
इसके साथ ही पहली बार लोकसभा चुनाव जयंत के नेतृत्व में हो रहा है। बागपत के लोग जयंत चौधरी को 'छोटे चौधरी' कह कर पुकारते हैं और उनके प्रति लोगों का सम्मान भी है। अब इस क्षेत्र में चुनावी बिगुल भी बज चुका है। इस बार बागपत का लोकसभा चुनाव बहुत ही रोचक होगा।
2014 और 2019 में देखने पड़ा था हार का मुंह
2014 और 2019 का चुनाव इसी सीट से चौधरी परिवार हार चुका है। 2014 में इस सीट से अजित सिंह चुनाव लड़े थे और वह हार गए थे। यही नहीं प्रदेश की सबसे ज्यादा जाट बहुल सीट मथुरा से 2014 में जयंत चौधरी भी चुनाव हार गए थे। उन्हें अभिनेत्री हेमा मालिनी ने हरा दिया था।
अजित और जयंत को यह हार तब झेलनी पड़ी, जब 2019 के चुनाव में सपा-बसपा और RLD का गठबंधन था। इसलिए RLD समर्थक मतदाताओं को ये उम्मीद थी कि इस बार पिता पुत्र यानी अजित सिंह और जयंत चौधरी मुजफ्फरनगर और बागपत से चुनाव जीत जाएंगे, लेकिन दोनों को ही हार का मुंह देखना पड़ा।
सूत्रों के अनुसार, जयंत चौधरी के समर्थकों ने उन्हें यह बता दिया था कि इस बार का भी चुनाव कठिन है। जयंत का NDA में आना हवा के रूख को पहचानने के बाद का निर्णय है। लेकिन अगर जमीनी हकीकत देखी जाए, तो इस बार बदली परिस्थितियों में RLD के लिए बागपत में स्थितियां अनुकूल हैं। अब समाजवादी पार्टी से कौन प्रत्याशी आता है, इसका इंतजार हो रहा है।