Lok Sabha Elections 2024: बदायूं लोकसभा सीट पर क्या हैं राजनीतिक समीकरण? BJP ने राज्यसभा चुनाव में ही कर दिया खेल
Lok Sabha Elections 2024: बदायूं लोकसभा सीट पर लड़ाई बहुत मुश्किल होगी, इसमें कोई संदेह नहीं। जाति समीकरण सपा के पक्ष में हैं, लेकिन BJP समर्थित मतदाता भी बड़ी संख्या में हैं, जो सपा को संकट में डाल सकता है। फिलहाल बीजेपी उम्मीदवार के नाम का इंतजार हो रहा है कि कौन उम्मीदवार यहां से चुनाव लड़ेगा
Lok Sabha Elections 2024: बदायूं से समाजवादी पार्टी ने अपने दिग्गज नेता और मुलायम सिंह यादव के भाई शिवपाल सिंह यादव को टिकट दिया
Lok Sabha Elections 2024:'ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया, जाने क्यूं आज तेरे नाम पे रोना आया'...... बदायूं (Budaun) का नाम आते ही शकील बदायूंनी याद आ जाते हैं और उनकी नज्में भी। उनकी तमाम पंक्तियां दिमाग में घूमने लगती हैं, जो उन्होंने लिखी थीं। यह शहर शकील बदायूं का है। साल 1916 में शकील बदायूनी इसी शहर में पैदा हुए। इस धरती ने इस्मत चुगताई, जीलानी बानो, दिलावर फिगार, आले अहमद सुरूर, अदा जाफरी, फानी बदायूंनी, बेखुद बदायूंनी जैसी हस्तियों को भी जन्म दिया। बदायूं किला और प्रतिष्ठित क्लॉक टॉवर घंटा घर प्रमुख आकर्षणों में से हैं। इल्तुतमिश और अला-उद-दीन आलम शाह जैसे शासकों की कब्रें यहीं पर हैं।
बड़े सरकार और छोटे सरकार की दरगाहों में जो मेला जुड़ता है, वैसा कम ही देखने को मिलता है। इन दरगाह में दुनिया भर से लोग आते हैं। 13वीं सदी की जामा मस्जिद , जिसे इल्तुतमिश ने बनवाया था और कादरी दरगाह, बदायूं के लोकप्रिय तीर्थस्थलों में से हैं। बदायूं में प्राचीन गौरी शंकर मंदिर भी है, यहां भारत का पहला तरल पारे और सोने के मिश्रण से बना शिवलिंग है।
बदायूं लोकसभा सीट (Budaun Lok Sabha Seat) पर इस समय भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है। पिछले लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections 2024) में इस सीट पर संघमित्रा ने मुलायम सिंह यादव परिवार के धर्मेंद्र यादव को लोकसभा चुनाव में पराजित कर दिया था। संघमित्रा स्वामी प्रसाद मौर्य की बेटी हैं। उनके पिता उस समय भारतीय जनता पार्टी में थे और स्वामी प्रसाद मौर्य BJP नेतृत्व से अपनी बेटी को टिकट दिलवाने में सफल रहे थे। लेकिन 2022 में स्थितियां बदलीं।
स्वामी प्रसाद मौर्य को लगा की हवा समाजवादी पार्टी के पक्ष में है और वह सपा में शामिल हो गए। अपने साथ कई विधायक भी ले गए। यह दावा भी किया कि आने वाले दिनों में वह बीजेपी का सफाया कर देंगे। तब संघमित्रा के एक दो बयान अपने पिता के पक्ष में जरूर आए थे। स्वामी प्रसाद मौर्य विधानसभा चुनाव लड़े, लेकिन खुद बुरी तरह से हार गए।
इसके बाद से संघमित्रा ने अपने कदम वापस खींचे और उन्होंने पिता के बजाय पार्टी के पक्ष में बयान दिए। पार्टी के हर कार्यक्रम में जाती हैं। BJP के केंद्रीय नेतृत्व से इनका संपर्क है, लेकिन 2024 के चुनाव के लिए BJP लोकसभा प्रत्याशियों की, जो पहली लिस्ट आई, उसमें संघमित्रा का टिकट फाइनल नहीं किया गया।
बदायूं में चुनावी व्यूह रचना शुरू
बदायूं सीट से अभी तक भाजपा नेतृत्व ने किसी को भी टिकट नहीं दिया है। अब दूसरी लिस्ट बाद में आएगी। इसके बावजूद चुनावी व्यूह रचना शुरू हो चुकी है। समाजवादी पार्टी ने अपने दिग्गज नेता और मुलायम सिंह यादव के भाई शिवपाल सिंह यादव को टिकट दिया है। पहले सपा ने इस सीट से धर्मेंद्र यादव को टिकट दिया था, जो पिछले कई चुनाव से बदायूं से ही चुनाव जीत रहे थे, लेकिन 2019 में संघमित्रा से चुनाव हार गए थे।
अभी कुछ दिन पहले ही स्वामी प्रसाद मौर्य ने सपा के खिलाफ भी विद्रोह का झंडा गाड़ दिया और पार्टी छोड़ दी। स्वामी प्रसाद मौर्य के इस कदम से अखिलेश यादव सतर्क हो गए। यह अनुमान लगाए गए कि अपनी बेटी संघमित्रा को जितवाने के लिए स्वामी प्रसाद यह सारा खेल कर रहे हैं।
समाजवादी पार्टी बदायूं को अपना मजबूत किला मानकर चलती रही है, लेकिन 2019 के चुनाव परिणाम से उसे धक्का लगा। अब वो इस सीट को गंवाना नहीं चाहती। बदायूं में समाजवादी पार्टी को बड़ा झटका ये लगा कि सपा के राष्ट्रीय महासचिव सलीम इकबाल शेरवानी ने पार्टी महासचिव का पद छोड़ दिया। उन्होंने पार्टी पर गंभीर आरोप लगाए।
मुस्लिम मतदाताओं से लग सकता है सपा को झटका?
वास्तव में शेरवानी का बड़ा कद है और मुस्लिम मतदाताओं में गहरा असर भी। समाजवादी पार्टी इस सीट को लेकर आशंकित है और यहां पर किसी किस्म का जोखिम नहीं लेना चाहती। समाजवादी पार्टी नेताओं ने अनुमान लगाया की संघमित्रा को बीजेपी फिर से मैदान उतार सकती है।
समाजवादी पार्टी इस सीट को लेकर पशोपेश में है कि किस रणनीति के तहत वो अपनी मजबूत सीट को वापस पाएं। इसलिए धर्मेंद्र यादव का टिकट बदल दिया गया और शिवपाल सिंह यादव मैदान में आ गए। लेकिन शह मात के इस खेल में बीजेपी ने एक और चाल चली।
BJP ने कर दिया खेल
समाजवादी पार्टी के बिसौली, जो बदायूं लोकसभा क्षेत्र में ही आता है, वहां के विधायक आशुतोष मौर्या को BJP ने अपने पक्ष में कर लिया। आशुतोष ने राज्यसभा के चुनाव में क्रॉस वोटिंग करते हुए, BJP के पक्ष में मतदान कर दिया। अब इस सीट में बीजेपी के टिकट को लेकर भी भ्रम है। संघमित्रा को टिकट मिलेगा या नहीं। क्या आशुतोष मौर्या को टिकट मिल जाएगा। कौन पाएगा टिकट? संघमित्रा या आशुतोष मौर्या, यह सवाल सभी को परेशान किए हुए है।
इस क्षेत्र में यादव मतदाताओं की संख्या बहुत ज्यादा है। यही नहीं मुस्लिम मतदाता भी बड़ी संख्या में हैं, लेकिन यादव और मुसलमान निर्णायक तो हैं ही, लेकिन अगर पिछड़े और सवर्ण मतदाता एकजुट हो जाएं, तो परिणाम बदल सकते हैं।
शिवपाल सिंह यादव सपा के कद्दावर नेता हैं और कार्यकर्ताओं के बीच लोकप्रिय भी। इसलिए यह चुनाव बहुत ही रोचक हो गया है। बदायूं किसके साथ जाएगा सवाल बड़ा है और इसका जवाब इतना भी आसान नहीं है।
बदायूं लोकसभा सीट में गुन्नौर विधानसभा सीट भी आती है, जहां पर प्रदेश के सबसे ज्यादा यादव मतदाता हैं और उनमें से ज्यादातर समाजवादी पार्टी के समर्थक हैं। सपा को यादव मुस्लिम मतदाताओं पर सबसे ज्यादा भरोसा रहा है। इस बार वे क्या करेंगे, कहना मुश्किल है। लेकिन इतना साफ है यह यादव मतदाता सपा के साथ ही रहेंगे।
जब गुन्नौर ने बचाया मुलायम का ताज
जब 2004 में मुख्यमंत्री बनने के बाद मुलायम सिंह यादव का विधान सभा पहुंचना जरूरी हुआ, तो उन्होंने अपने लिए गुन्नौर विधानसभा सीट चुनी थी और वह रिकॉर्ड एक लाख 83 हजार से ज्यादा वोटो से जीते थे। बाद मे 2007 के विधानसभा चुनाव में भी मुलायम सिंह यादव गन्नौर से ही जीते।
गुन्नौर विधानसभा सीट धर्मेंद्र यादव को इतना ज्यादा लीड देती थी कि विपक्षी पीछे छूट जाते थे। अब यहां स्थितियों में बदलाव है। यादव मतदाताओं के खिलाफ अति पिछड़े और अति दलित वोट भी लामबंद हो जाता है। आने वाले लोकसभा चुनाव में क्या होगा? कहना कठिन है, लेकिन अब इसे समाजवादी पार्टी का गढ़ नहीं कहा जा सकता है।
यहां लड़ाई बहुत मुश्किल होगी, इसमें कोई संदेह नहीं। जाति समीकरण सपा के पक्ष में हैं, लेकिन BJP समर्थित मतदाता भी बड़ी संख्या में हैं, जो सपा को संकट में डाल सकता है। फिलहाल बीजेपी उम्मीदवार के नाम का इंतजार हो रहा है कि कौन उम्मीदवार यहां से चुनाव लड़ेगा।