Lok Sabha Elections 2024: 1985 से अब तक कोई नहीं ढहा सका मैनपुरी में सपा का किला, BJP के लिए इस बार अभी नहीं तो कभी नहीं जैसी स्थिति
Lok Sabha Elections 2024: मुलायम सिंह यादव ने मैनपुरी में ऐसा कब्जा जमाया कि इस पर कोई दूसरा अब तक काबिज नहीं हो सका। विरोधी भी उनके सामने पस्त हो गए। क्या होगा इस बार के लोकसभा चुनाव में? मैनपुरी के ही देवेंद्र यादव कहते हैं कि इस बार भी लड़ाई भारतीय जनता पार्टी से होगी। जीतना तो समाजवादी पार्टी को ही चाहिए
Lok Sabha Elections 2024: मुलायम सिंह यादव ने मैनपुरी में ऐसा कब्जा जमाया कि इस पर कोई दूसरा अब तक काबिज नहीं हो सका
Lok Sabha Elections 2024: मैनपुरी (Mainpuri), यहां पर पैदा होने वाले 'मैनपुरी तंबाकू' ने अपना झंडा देश भर में गाढ़ा। इस तंबाकू का ऐसा असर पड़ा कि मैनपुरी और उसके आसपास कैंसर मरीजों की भरमार हो गई। मैनपुरी तंबाकू को 'कपूरी' भी कहते हैं। छोटी-छोटी कटी सुपारी,इलायची, पिपरमेंट मिलकर तैयार होने वाली यह कपूरी लोगों के मुंह ऐसी लगी कि ये छुटाए नहीं छूटती। इस धरती का रुतबा ऐसा कि कोई किसी से दबना नहीं चाहता। मैनपुरी के ही सुरेंद्र सिंह चौहान कहते हैं कि यह धरती है रणवीरों की। मैनपुरी में चौहान शासकों ने शासन किया। इन्हीं शासकों की तरफ मैनपुरी में किले, मंदिरों आदि का निर्माण कराया गया। यहां पर चौहानों के अलावा यादव मतदाता भी बड़ी संख्या में है और यह लोकसभा क्षेत्र मुलायम परिवार का गढ़ भी माना जाता है।
इस मजबूत किले को कोई दूसरा नहीं तोड़ सका और आज भी यहां पर मुलायम परिवार का ही परचम लहरा रहा है। मैनपुरी लोकसभा क्षेत्र में कब्जा करने के लिए कांग्रेस के नेता और केंद्रीय मंत्री रहे बलराम सिंह यादव और मुलायम सिंह के समर्थकों के बीच कई बार जंग हुई। आपस में गोलियां तक चलीं। बाहुबल का इस्तेमाल हुआ। इस जंग की खबरों से अखबार रंगे रहे। इस खूनी जंग की चर्चा न सिर्फ देश भर में हुई बल्कि इसके कारण उत्तर प्रदेश विधानमंडल की बैठक कई-कई दिनों तक चल नहीं पाई।
आखिरकार मुलायम सिंह यादव ने मैनपुरी में ऐसा कब्जा जमाया कि इस पर कोई दूसरा अब तक काबिज नहीं हो सका। विरोधी भी उनके सामने पस्त हो गए। तमाम प्रयास किए गए, लेकिन मुलायम परिवार के किले पर कोई आंच नहीं आई। बीजेपी ने इसे तोड़ने का कई बार प्रयास किया। कई बार रणनीति बदली, लेकिन सब बेअसर सबित हुए। बार-बार बीजेपी को मुंह की खानी पड़ी।
इस बार मैनपुरी में क्या होगा बदलाव?
क्या होगा इस बार के लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections 2024) में? मैनपुरी के ही देवेंद्र यादव कहते हैं कि इस बार भी लड़ाई भारतीय जनता पार्टी से होगी। जीतना तो समाजवादी पार्टी को ही चाहिए। इस समय क्षेत्र की सांसद अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव हैं। डिंपल यादव एक बार फिर मैदान में हैं।
बीजेपी किसे मैदान में उतारेगी यह अभी तय नहीं है। साल 2022 में मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद मैनपुरी में उपचुनाव हुआ था। लोकसभा के इस उपचुनाव में यहां के मतदाताओं ने मुलायम सिंह यादव को श्रद्धांजलि देते हुए डिंपल यादव को लगभग 2 लाख 88 हजार वोटों से जीत दिला दी थी। क्या इस बार भी श्रद्धांजलि के नाम पर सपा को वोट मिलेंगे?
मुलायम सिंह को श्रद्धांजलि देने के नाम पर चली हवा के चलते रघुराज सिंह शाक्य बहुत ही बुरी तरह से चुनाव हार गए थे। सवाल यह है कि क्या रघुराज सिंह एक बार फिर मैदान में उतरेंगे। कभी मुलायम सिंह यादव के अति प्रिय रहे रघुराज सिंह समाजवादी पार्टी के बड़े नेताओं में शुमार रहे हैं। अगर वह इस बार मैदान में उतरते हैं, तो लड़ाई बहुत रोचक हो जाएगी। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि यह निर्वाचन क्षेत्र मुलायम परिवार का मजबूत गढ़ है और उसे तोड़ पाना बीजेपी के लिए मुश्किल लगता है।
1980 से शुरू हुआ संघर्ष
बात 1980 से शुरू करते हैं। 1980 के विधानसभा के चुनाव में मुलायम सिंह यादव सैफई से चुनाव हार गए थे। चरण सिंह ने उन पर कृपा की और वह विधान परिषद के सदस्य बन गए। इसी समय से यहां पर जमीनी जंग की शुरुआत होती है। मुलायम सिंह यादव समझ गए थे कि अगर उन्हें निष्कंटक राज करना है, तो कांग्रेस के नेता बलराम सिंह यादव को राजनीतिक रूप से किनारे लगाना पड़ेगा।
मुलायम सिंह यादव और बलराम सिंह यादव के बीच बाहुबली प्रदर्शन शुरू हुआ। कई बार आपस में ही गोलियां चलीं। खूनी जंग हुईं। चुनाव में मतदान के दौरान बूथ लूटे गए और आपसी जंग तेज होती गई। 1985 आते-आते मुलायम सिंह मजबूत हो चुके थे। धीरे-धीरे उन्होंने कांग्रेस की जमीन पर कब्जा करना शुरू किया। लेकिन बलराम सिंह यादव किसी तरह अपनी जमीन को बचाना चाहते थे।
मामला आसान नहीं था। लेकिन यह जंग निर्णायक हुई और मैनपुरी, इटावा, फिरोजाबाद और एटा से कांग्रेस और बलराम सिंह यादव के पैर उखड़ गए। 1984 के बाद यहां पर कांग्रेस कभी जीत नहीं सकी। बलराम सिंह हर चुनाव हारते जा रहे थे और मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार लगभग सभी चुनाव में सफलता हासिल कर रहा था।
बलराम सिंह यादव न सिर्फ अपने समर्थक बल्कि अपनी जमीन भी खोते जा रहे थे। हार कर बलराम सिंह यादव को उसी समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह के पास जाना पड़ा, जिनसे वह जिंदगी भर लड़ते रहे। इटावा और मैनपुरी में मुलायम सिंह का विरोध करने वाले लोग नहीं बचे और सभी समाजवादी हो गए।
जब खुद सपा के टिकट पर चुने गए बलराम यादव
आखिरकार 1998 और 99 में बलराम सिंह यादव समाजवादी पार्टी के टिकट से मैनपुरी लोकसभा क्षेत्र से ही चुने गए। मैनपुरी से ही मुलायम सिंह यादव ने धर्मेंद्र यादव को लड़वाया और वह भी चुनाव जीत गए। 2014 में मुलायम सिंह यादव मैनपुरी और आजमगढ़ दो सीटों से लड़े और दोनों पर जीते। बाद में उन्होंने मैनपुरी सीट छोड़ दी और अपने भतीजे तेज प्रताप सिंह को मैनपुरी से खड़ा कर दिया और वो जीत भी गए।
मुलायम सिंह यादव जानते थे कि मैनपुरी से वे जिसे भी खड़ा करेंगे, वो चुनाव जीतेगा। 2019 के चुनाव में मुलायम सिंह मैनपुरी से फिर चुनाव लड़े और फिर जीते। लेकिन इस बार हार जीत का अंतर बहुत घट गया। मुलायम सिंह यादव सिर्फ एक लाख वोटों से जीत सके।
अब डिंपल यादव मैदान में हैं। क्या होगा इस बार? वास्तव में 2022 के उपचुनाव को डिंपल यादव ने इसलिए भारी अंतर से जीत लिया था, क्योंकि तब मुलायम सिंह यादव को श्रद्धांजलि के रूप में लोगों ने उनकी बहू डिंपल को वोट दिया।
किस ओर चलेगी मैनपुर की हवा
क्या मैनपुरी में चुनावी हवा इस बार भी ऐसी ही चलेगी, जैसे सपा के पक्ष में चलती रही हैं। इसको लेकर किंतु-परंतु हैं। असली चुनौती इस बार है। बीजेपी इस बार मैनपुरी के लिए पूरी ताकत लगा रही है। पार्टी के एक नेता कहते हैं कि बीजेपी के लिए मैनपुरी में अभी नहीं तो कभी नहीं जैसी स्थिति है। क्योंकि पार्टी पिछले 30 सालों से इस सपाई किले को तोड़ने का प्रयास कर रही है, लेकिन सफल नहीं हुई।
सभी की निगाहें मैनपुरी पर लगी हुई हैं। यह तय है की पिछड़ा और क्षत्रिय वोट जिस ओर जाएगा जीत उसकी ही होगी । यह अलग बात है अगर आंकड़ों की बात करें, तो डिंपल यादव अपने विपक्षियों से भारी दिख रही हैं, लेकिन मैदान में क्या होगा यह आने वाले दिन तय करेगे।