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मार्केट कैप 3 लाख करोड़ डॉलर के पार,वॉरेन बफे इंडिकेटर ने दिए गिरावट के संकेत,अब क्या करें

वॉरेन बफे इंडिकेटर को पूरी दुनिया में व्यापक स्वीकृति है.
अपडेटेड May 27, 2021 पर 08:27  |  स्रोत : Moneycontrol.com

BSE पर लिस्टेड कंपनियों का मार्केट कैप 3 लाख करोड़ का स्तर पार कर चुका है और इसके साथ ही भारत अमेरिका, चीन, हॉन्गकॉन्ग, जापान, यूके, फ्रांस और कनाडा के बाद दुनिया का आठवां सबसे बड़ा स्टॉक मार्केट बन गया है।


बाजार की 3 लाख करोड़ डॉलर मार्केट कैप हासिल करने के इस यात्रा में m-cap to GDP ratio में वित्त वर्ष 2004 के बाद से अब तक 97 फीसदी का जोरदार उछाल देखने को मिला है जो इस अवधि के 77 फीसदी औसत से तो ज्यादा है लेकिन 2007 के GDP के 149 फीसदी से कम है। ये आंकड़े मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल के एक नोट पर आधारित हैं।


वॉरेन बफे इंडिकेटर  एक ऐसा अहम इंडिकेटर है जो यह बताता है कि क्या मार्केट का वैल्यूएशन इकनॉमी की रियलिटी के अनुरूप है या नहीं। बाजार जानकारों का कहना है कि वॉरेन बफे इंडिकेटर को पूरी दुनिया में व्यापक स्वीकृति है और यह दुनिया की अधिकांश इकोनॉमी में ये अच्छी तरह से काम भी करता है। लेकिन भारतीय इकोनॉमी की अपनी कुछ अलग खासियत है।


HDFC securities के धीरज रेली (Dhiraj Relli) का कहना है कि भारत की GDP की गणना में तमाम आर्थिक गतिविधियां शामिल नहीं होती हैं। ये गतिविधियां या तो असंगठित क्षेत्र की होती हैं या इकोनॉमी के फॉर्मल चैनल के बाहर की होती है। देश में तमाम कारोबारी गतिविधियां हैं, जिनमें न तो टैक्स चुकाया जाता है और न ही इनका कोई अकाउंट मेनटेन होता है। इसके अलावा इकोनॉमी में हाउस वाइफ या गृहणियों के योगदान की भी कोई गणना नहीं होती है।


अगर इन सब की गणना की जाए तो कुछ अलग ही आंकड़े आएंगे। इसके अलावा देश में बहुत सी सरकारी और निजी कंपनियां जिनमें स्टार्टअप भी शामिल हैं, बाजार में लिस्टेड नहीं हैं।


Fidelity International के नितिन शर्मा का कहना है कि हमें भारत के संदर्भ में वॉरेन बफे के इंडिकेटर को लागू करते समय सावधान रहने की जरूरत है। क्योंकि कोरोना महामारी के समय GDP में भारी गिरवाट आई है, लेकिन बाजार आगे आने वाली रिकवरी पर फोकस कर रहा है और इसकी नजरें वर्तमान वर्ष से आगे के वर्षों पर हैं।


उनका ये भी कहना है कि बफे इंडिकेटर  भारत जैसी इकोनॉमी के लिए बहुत सही नहीं है। क्योंकि देश की GDP का एक बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे असंगठित क्षेत्र से और SME से आता है जो बाजार में लिस्टेड नहीं है। उन्होंने आगे कहा कि हमें इस समय महंगाई पर नजर बनाए रखने की जरूरत है। अगर यह RBI के कम्फर्ट जोन से थोड़ा भी बाहर जाता है तो RBI अपनी मौद्रिक नीतियों में कड़ाई ला सकता है।


Valentis Advisors के ज्योतिवर्धन जयपुरिया (Jyotivardhan Jaipuria) का कहना है कि अगर हम वफे इंडिकेटर या किसी दूसरे वैल्यूएशन पैरामीटर पर नजर डालें तो यह साफ होता है कि इस समय बाजार में वैल्यूएशन लॉन्ग टर्म एवरेज से ऊपर है।


उन्होंने आगे कहा कि हमें यह याद रखना होगा कि इकोनॉमिक साइकिल के निचले छोर पर वैल्यूएशन अक्सर महंगा दिखाई देता है। हमारा मानना है कि जल्द ही हमें री-रेटिंग होती दिखेगी। और अगले 4-5 साल में हमें कमाई डबल होती दिखेगी। इसी पर मिलने वाला रिटर्न निर्भर करेगा।


गौरतलब है कि मार्केट एक्सपर्ट भारत के संदर्भ में मार्केट कैप और GDP के रेश्यो को ज्यादा महत्व नहीं देते हैं। तमाम जानकारों का मानना है कि M-cap-to-GDP रेश्यो  मार्केट के प्रदर्शन का कमजोर इंडिकेटर है। बाजार के प्रदर्शन को जांचने के लिए डॉलर की सप्लाई, पॉलिसी रेट, महंगाई दर, महंगाई का आउटलुक ज्यादा बेहतर इंडिकेटर हैं।



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