शेयर बाजार की गिरावट में न करें ये 5 गलती, निफ्टी के पिछले 26 साल के आंकड़ों से समझें

भारतीय शेयर बाजारों में इस समय भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और महंगाई बढ़ने की चिंता से भारी उथल-पुथल मची हुई है। सेंसेक्स और निफ्टी 2026 में अब तक 13% से ज्याटा टूट चुके है, जिसने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे माहौल में शेयर मार्केट के लंबे समय के आंकड़े क्या कहते हैं, यह समझना बेहद जरूरी हो जाता है

अपडेटेड Apr 07, 2026 पर 1:59 PM
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Market Correction: शेयर बाजार में एक साल में 10% से 20% तक की गिरावट आना सामान्य बात है

भारतीय शेयर बाजारों में इस समय भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और महंगाई बढ़ने की चिंता से भारी उथल-पुथल मची हुई है। सेंसेक्स और निफ्टी 2026 में अब तक 13% से ज्याटा टूट चुके है, जिसने निवेशकों की चिंता बढ़ा दी है। ऐसे माहौल में शेयर मार्केट के लंबे समय के आंकड़े क्या कहते हैं, यह समझना बेहद जरूरी हो जाता है।

ऑरेवा कैपिटल प्राइवेट लिमिटेड ने निफ्टी-50 इंडेक्स के पिछले 26 सालों के प्रदर्शन पर एक स्टडी रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट में जनवरी 2000 से दिसंबर 2025 तक के प्रदर्शन का अध्ययन किया गया गया है। यह रिपोर्ट लॉन्ग-टर्म में शेयर बाजार के प्रदर्शन को लेकर कई अहम जानकारी देती है। इस रिपोर्ट का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि बाजार में “टाइमिंग” से ज्यादा “टाइम इन मार्केट” यानी लंबे समय तक निवेश बनाए रखना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।

संकटों के बावजूद बढ़ता रहा बाजार

पिछले 26 सालों में भारतीय शेयर बाजार ने कई बड़े झटके देखे। इसमें साल 2002 में आया डॉट-कॉम क्रैश, 9/11 के बाद बाजार में आई गिरावट, साल 2008 का आर्थिक संकट, नोटबंदी और कोरोना महामारी के समय आई गिरावटें शामिल हैं। इसके बावजूद निफ्टी-50 लगभग 1,592 के स्तर से बढ़कर 26,000 के पार पहुंच गया और करीब 11.36% की सालाना कंपाउंड ग्रोथ दी। यह बताता है कि लंबी अवधि में बाजार की दिशा ऊपर की ओर ही रहती है।


1. 10–20% गिरावट सामान्य है, घबराने की जरूरत नहीं

शेयर बाजार का एक जरूरी और थोड़ा उल्टा लगने वाला सच यह है कि एक साल के भीतर 10% से 20% तक की गिरावट आना बाजार का सामान्य बात है। औसतन निफ्टी में एक साल के दौरान उच्च स्तर से करीब 19.3% तक की गिरावट देखी गई, जबकि औसत गिरावट 15% की रही। लगभग 85% सालों में बाजार कम से कम अपने ऑल-टाइम हाई से 10% गिरा। इसका मतलब है कि छोटी गिरावट देखकर बाजार से बाहर निकलना निवेशकों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।

2. मार्केट टाइमिंग उतनी जरूरी नहीं जितनी मानी जाती है

स्टडी में यह भी सामने आया कि सही समय पर निवेश करने और गलत समय पर निवेश करने के बीच फर्क उतना बड़ा नहीं है जितना आमतौर पर समझा जाता है। अगर कोई निवेशक हर साल ₹1 लाख निवेश करता, तो सबसे अच्छे समय पर निवेश करने वाले को 14.26% रिटर्न मिला, जबकि सबसे खराब टाइमिंग वाले निवेशक को भी 11.75% रिटर्न मिला। यानी फर्क सिर्फ करीब 2.5% का रहा, जो यह साबित करता है कि लगातार निवेश करना ज्यादा जरूरी है।

3. लंबी अवधि में जोखिम काफी कम हो जाता है

समय के साथ निवेश का जोखिम तेजी से घटता है। डेटा बताता है कि एक दिन के निवेश में करीब 54% मामलों में फायदा हुआ, एक महीने में 90% निवेश पॉजिटिव रहे और एक साल में लगभग 99% मामलों में रिटर्न मिला। यहां तक कि अगर किसी ने बाजार के सबसे ऊंचे स्तर पर भी निवेश किया, तो 3-4 साल में नुकसान की भरपाई हो गई।

4. गिरावट में SIP सबसे ज्यादा फायदा देता है

मार्केट में गिरावट के दौरान नियमित निवेश यानी SIP सबसे ज्यादा फायदा देता है। जब कीमतें गिरती हैं तो निवेशक कम दाम पर ज्यादा यूनिट खरीद पाते हैं, जिससे औसत लागत कम हो जाती है और लंबे समय में रिटर्न बेहतर होता है। 2020 की कोविड गिरावट के दौरान भी जिन्होंने निवेश जारी रखा, उन्हें बाद की तेजी में बड़ा फायदा मिला।

5. सबसे बड़ा जोखिम बाजार नहीं, निवेशक का व्यवहार है

इस अध्ययन का सबसे अहम निष्कर्ष यह है कि असली जोखिम बाजार नहीं बल्कि निवेशकों का व्यवहार है। इतिहास बताता है कि बड़ी गिरावट के बाद बाजार में तेज रिकवरी आती है, जैसे 2003, 2009 और 2020 में देखा गया। जो निवेशक डरकर बाजार से बाहर निकल जाते हैं, वे इस रिकवरी का फायदा नहीं उठा पाते और लंबे समय में नुकसान उठाते हैं।

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