ब्लॉक डील के नियमों में बदलाव हो सकता है। सेबी के एक वर्किंग ग्रुप ने ब्लॉक डील से जुड़े मौजूदा नियम और शर्तों पर विचार किया है। इसके बाद ग्रुप ने कुछ सुझाव दिए हैं। इसमें बड़े ट्रेड के लिए रेफरेंस प्राइस की बड़ी रेंज का सुझाव शामिल है। समूह ने सुबह के ट्रेड विंडो और दोपहर बाद के ट्रेड विंडो के लिए अलग-अलग प्राइस रेंज का भी सुझाव दिया है। इस मामले से जुड़े लोगों ने मनीकंट्रोल को यह जानकारी दी। ब्लॉक डील एक्सचेंज पर होने वाला ऐसा ट्रेड है, जिसकी कीमत दोनों पक्ष आपसी बातचीत के बाद तय करते हैं।
वर्किंग ग्रुप प्राइस रेंज बढ़ाने के पक्ष में
सूत्रों ने बताया कि SEBI के वर्किंग ग्रुप के ज्यादातर सदस्यों का मानना है कि ब्लॉक डील (Block Deal) के लिए मॉर्निंग ट्रे़ड विंडो के लिए ऊपर या नीचे दोनों ही दिशा में 5 फीसदी की प्राइस रेंज होनी चाहिए। दोपहर बाद के विंडों के लिए 3 फीसदी की रेंज होनी चाहिए। हालांकि, BSE ने मॉर्निंग ट्रेड विंडो और ऑफ्टरनून ट्रेड विंडों के लिए दोनों ही दिशा में कॉमन 2 फीसदी प्राइस रेज का सुझाव दिया है। सूत्रों ने बताया कि बीएसई का मानना है कि 2 फीसदी से ज्यादा की प्राइस रेंज का असर ट्रेडिंग सेशन के दौरान लिक्विडिटी पर पड़ेगा।
अभी सिर्फ एक फीसदी की रेंज तय है
अभी जो नियम लागू है, उसमें ब्लॉक डील के लिए 1 फीसदी की रेंज तय है। मार्केट पार्टिसिपेंट्स का कहना है कि यह रेंज बहुत कम और अव्यावहारिक है। BSE का कहना है कि मार्केट में उतारचढ़ाव बढ़ा है। ऐसे में अगर रेगुलर मार्केट विंडो के दौरान करेंट मार्केट प्राइस से ज्यादा ऊपर या नीचे ब्लॉक डील होती है तो इससे ऑर्डर्स पर स्टॉपलॉस ट्रिंगर हो सकता है।
एक फीसदी की रेंज से ट्रेड में दिक्कत
इधर, इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स का कहना है कि मौजूदा 1 फीसदी की रेंज में पर्याप्त स्टॉक्स खरीदने में दिक्कत आती है। इसके अलावा डील के बारे में जानकारी लीक होने की वजह से मैनिपुलेशन का भी डर रहता है। इंडस्ट्री से जुड़े एक सूत्र ने बताया कि ब्लॉक डील के लिए प्राइस रेंज कम होने से सिर्फ ट्रेडर्स को फायदा होता है। उन्होंने कहा, "कम प्राइस रेंज तय करने का मकसद रिटेल इनवेस्टर्स का फायदा रहा है। लेकिन, सच यह है कि इससे हाई-फ्रीक्वेंसी ट्रेडर्स को फायदा होता है, जबकि म्यूचुअल फंड्स जैसे लंबी अवधि के इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स को नुकसान होता है।"
ब्लॉक डील के मौजूदा नियम 2017 में बने थे
एक दूसरे पार्टिसिपेंट ने कहा, "ब्लॉक डील ऐसे स्टॉक्स में होती है, जो साइज के लिहाज से बहुत लिक्विड नहीं होते हैं। ये लार्ज ब्लॉक्स जब ओपन मार्केट में पहुंचते हैं तो बड़ी स्लिपेज के चलते ज्यादा इम्पैक्ट कॉस्ट देखने को मिलती है।" अभी सेबी ने वर्किंग ग्रुप के सुझाव पर अंतिम फैसला नहीं लिया है। यह ध्यान में रखने वाली बात है कि ब्लॉक डील के मौजूदा नियम 2017 में बनाए गए थे। मार्केट साइज सहित दूसरे बदलावों को देखते हुए इन नियमों में बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है।
वर्किंग ग्रुप अतिरिक्त विंडो नहीं चाहता
सूत्रों ने बताया कि सेबी के वर्किंग ग्रुप में ज्यादातर सदस्यों का मानना है कि ब्लॉक डील्स के लिए अतिरिक्त विंडो की जरूरत नहीं है। अभी जो नियम लागू है, उसमें ब्लॉक डील विंडो दो बार खुलता है। पहला सुबह 8:45 से 9:00 बजे के बीच और दूसरा दोपहर में 2:05 से 2:20 के बीच। यह माना जाता है कि ज्यादातर ब्लॉक डील्स पहले विंडो में होती हैं। इसलिए दो विंडो का मौजदा सिस्टम सही है और इसमें कोई बदलाव करने की जरूरत नहीं है।
विदेश में ब्लॉक डील के लिए एक से ज्यादा विंडो
एक म्यूचुअल फंड पार्टिसिपेंट ने ब्लॉक डील के लिए हर घंटे 10 मिनट का विंडो शुरू करने का सुझाव दिया। इससे मार्केट पार्टिसिपेंट्स को रियल-टाइम रेफरेंस प्राइस के आधार पर ब्लॉक्स में ट्रेड करने का मौका मिलेगा। शंघाई स्टॉक मार्केट में 3 ब्लॉक डील विंडो है। इसमें एक फिक्स्ड प्राइस ऑर्डर भी शामिल है। ताईवान में एक आधे घंटे का विंडो है। साऊथ कोरिया में एक घंटो का सिंगल ब्लॉक डील विंडो है।