Russia-Ukraine War: सिर्फ 3 हफ्ते में Ukraine की GDP से भी ज्यादा डूबा भारतीय निवेशकों का पैसा

Statista website के अनुसार 2021 में Ukraine की जीडीपी 181 अरब डॉलर आंकी गई थी

अपडेटेड Mar 04, 2022 पर 6:07 PM
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24 फरवरी को रूस के यूक्रेन पर हमला करने के बाद से Sensex लगभग 3,000 अंक गिर चुका है

भारतीय शेयर बाजारों ने आज लगातार चौथे हफ्ते में घाटा दर्ज किया। यूक्रेन के बिगड़ते संकट ने तेल की कीमतों में उछाल और मुद्रास्फीति की आशंकाओं को बढ़ा दिया जिससे बाजार मे गिरावट नजर आई। ब्लू-चिप एनएसई निफ्टी 50 इंडेक्स (NSE Nifty 50 index) 1.53% गिरकर 16,245 पर बंद हुआ। जबकि एसएंडपी बीएसई सेंसेक्स (S&P BSE Sensex) लगातार तीसरे सत्र में 750 अंक से अधिक की गिरावट के साथ 54,333 पर बंद हुआ।

यूक्रेन पर रूस का आक्रमण अपने दूसरे हफ्ते में भी जारी है। यूक्रेन के अधिकारियों ने आज कहा कि रूसी सेना ने यूरोप में सबसे बड़े परमाणु ऊर्जा संयंत्र (nuclear power plant) पर कब्जा कर लिया है।

बता दें कि रूस के 24 फरवरी को यूक्रेन पर हमला करने के बाद से सेंसेक्स लगभग 3,000 अंक टूट चुका है। इससे पहले भी बाजार में हलचल मची हुई थी क्योंकि रूस ने यूक्रेन की सीमा पर बड़ी संख्या में सैनिकों को जमा किया था। 16 फरवरी से जब BSE पर लिस्टेड स्टॉक का बाजार पूंजीकरण 2,62,18,594 करोड़ था। तब से भारतीय बाजारों में लगभग ₹15 लाख करोड़ रुपये का नुकसान देखा गया है, जो यूक्रेन के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) से भी अधिक है।


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स्टेटिस्टा वेबसाइट (Statista website) के अनुसार 2021 में यूक्रेन की जीडीपी 181 अरब डॉलर आंकी गई थी।

इस बीच, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 76 के स्तर से नीचे गिर गया है। भारत कच्चे तेल का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा आयातक है। तेल की बढ़ती कीमतें भारत के व्यापार और चालू खाते के घाटे को बढ़ाती हैं । इससे रुपये को नुकसान पहुंचता हैं और आयातित मुद्रास्फीति बढ़ती है।

Geojit Financial Services के वीके विजय कुमार ने कहा "युद्ध और कच्चे तेल में उछाल ने आर्थिक परिदृश्य और बाजार की उम्मीदों को पूरी तरह से बदल दिया है। यदि युद्ध लंबा चलता है तो वैश्विक आर्थिक विकास प्रभावित हो सकता है। भारत में सरकार और RBI दोनों ने कच्चे तेल की कीमत लगभग 75 डॉलर मानकर चल रही थी। इसलिए, बजट और मोनटेरी पॉलसी में अनुमानों को वास्तविक रूप संशोधित करना होगा। वहीं दूसरी तरफ भले ही कच्चे तेल की कीमत गिरकर 100 डॉलर के आसपास रहती है, फिर भी वित्त वर्ष 2023 के लिए मुद्रास्फीति RBI के पूर्वानुमान से काफी अधिक होगी। इसके बाद MPC को दरें बढ़ाने के लिए मजबूर किया जाएगा। इससे आर्थिक रिकवरी पर असर पड़ेगा। "

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Religare Broking के अजीत मिश्रा का कहना है कि भारतीय बाजारों के अल्पावधि में पेचीदा रहने की उम्मीद है, इसलिए सावधानी बरतनी चाहिए। “कारोबारी हफ्ते के अंत में रूस-यूक्रेन युद्ध से संबंधित समाचारों पर मेन फोकस होगा क्योंकि इसके आगे के हफ्ते में दबाव जारी रहेगा। इसके अलावा कच्चे तेल का दाम बढ़ना हमारी अर्थव्यवस्था के लिए सिरदर्द है जबकि संबंधित सेक्टर पहले से ही जबरदस्त दबाव में हैं। हमें लगता है कि यह समय सिलेक्टिव बने रहने का है। इस समय मजबूत फंडामेंटल और बाजारों में स्थिरता के साथ तेजी से वापसी करने वाले पॉकेट की तलाश करनी चाहिए।"

 

 

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