भुवन भास्कर

भुवन भास्कर
मंगलवार (25 जनवरी) को शेयर बाजार अपनी शुरुआती गिरावट के बाद संभल कर धीरे-धीरे दिन के उच्चतम स्तर पर बंद हुए। इससे पहले 19 अक्टूबर को निफ्टी ने 18604 का उच्चतम स्तर छूने के बाद शुरू हुई गिरावट में लगभग 40 कारोबारी सत्रों के दौरान 2000 अंकों की गिरावट देखी थी। लेकिन 20 दिसंबर को 16410 का निचला स्तर छूने के बाद जो तेज रिकवरी आई उसमें निफ्टी महज 20 कारोबारी सत्रों में वापस पुराने उच्चतम स्तर के बिलकुल करीब पहुंच गया और जब ऐसा लग रहा था कि निफ्टी एक बार फिर नई ऊंचाई छू सकता है, तभी फिर से गिरावट शुरू हुई और सिर्फ 6 कारोबारी सत्रों में सूचकांक 1000 प्वाइंट टूट गया।
भले ही सोमवार को निफ्टी अपने निचले स्तर से करीब 450 अंकों का सुधार करते हुए 0.75% की बढ़त के साथ बंद हुआ, लेकिन बाजार में निवेशकों का भरोसा डगमगाता दिख रहा है। इससे पहले हुई बड़ी गिरावट में निफ्टी ने 24 मार्च 2020 को 7511 का निचला स्तर छुआ था और उसके बाद पहली बार शेयर बाजार में करेक्शन का दौर दिख रहा है। ऐसे में यह सवाल तेज हो गया है कि क्या यह गिरावट खरीदने का मौका है या यह बाजार में गिरावट की शुरुआत है?
इस सवाल का जवाब बहुत कठिन नहीं है। भले ही इस गिरावट के लिए कोरोना की तीसरी लहर को जिम्मेदार ठहराया गया हो, लेकिन उसने सिर्फ एक ट्रिगर का काम किया है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि शेयर बाजार अपने उच्चतम वैल्यूएशन पर चल रहे थे और लंबे समय से एक ‘हेल्दी करेक्शन’ की संभावना जताई जा रही थी। हालिया गिरावट से पहले कोटक म्यूचुअल फंड की एक स्टडी के अनुसार 2021-22 के दौरान मार्केट कैप और GDP का अनुपात 112% रहने का अनुमान है, जबकि पिछले 10-साल का औसत अनुपात 76% रहा है।
इसी तरह निफ्टी का PE (मूल्य आय अनुपात, जिसे निफ्टी की 50 कंपनियों की आय को सूचकांक में भाग देकर ज्ञात किया जाता है) 20.2 पर था, जबकि पिछले 15 साल का औसत PE 18.2 है। जाहिर है कि बाजार का वैल्यूशन बहुत अधिक है और यदि यहां से निफ्टी में 2000-3000 अंकों (लगभग 15%) तक की गिरावट आ जाए, तो यह बड़ी बात नहीं होगी।
इस तर्क के खिलाफ यह कहा जा सकता है कि बाजार ऊंचे वैल्यूएशन पर भी लंबे समय तक ऊपर टिके रह सकते हैं और गिरावट हालांकि एक वास्तविक संभावना है, फिर भी वह कब आएगी, इसका कोई निश्चित फॉर्मूला नहीं है। ऐसे में और गिरावट के इंतजार में निवेशक बेशकीमती मौका चूक सकते हैं। इसलिए सिर्फ वैल्यूएशन के भरोसे बाजार के प्रति रणनीति अपनाना सही नहीं होगा।
इसके बाद बाजार की तेजी के दूसरे सबसे महत्वपूर्ण कारक की बात करते हैं। बहुत बार हम जिन चीजों पर पैसा खर्च करते हैं, उसके पीछे हमारी जरूरत से ज्यादा यह फैक्टर काम करता है कि हमारे पास खर्च करने लायक पैसा कितना है। इसी को बाजार की भाषा में लिक्विडिटी कहते हैं। और यही वह दूसरा फैक्टर है, जो हर वैल्यूएशन पर भारी पड़ता है।
2008 के सब-प्राइम संकट के समय ऐसा लगा था कि जैसे दुनिया का पूरा आर्थिक ढांचा ही ढहने जा रहा है। दुनिया के साथ ही भारत के शेयर बाजारों में भी जनवरी 2008 में गिरावट की शुरुआत हुई। महज 10 महीनों में यानी नवंबर 2008 तक निफ्टी की वैल्यूएशन एक-तिहाई रह गई। पूरी दुनिया के सेंट्रल बैंकों ने अर्थव्यवस्था में लिक्विडिटी पैदा करने के लिए अपने छापेखाने खोल दिए। अमेरिकी फेड की अगुवाई में लाखों करोड़ डॉलर बाजार में डाले गए, जिसका नतीजा यह हुआ कि बाद हमने देखा था कि महज साल भर के भीतर दुनिया के बाजारों ने निम्न स्तर छूकर किस तरह तेजी पकड़ी थी और सिर्फ 2 वर्षों में नवंबर 2010 में बाजार एक बार फिर अपनी पुरानी ऊंचाई पर पहुंच गये।
निष्कर्ष यह है कि यदि लिक्विडिटी पर्याप्त हो तो वैल्यूएशन बहुत मायने नहीं रखते और लंबे समय तक बाजार ऊंचे वैल्यूएशन पर ट्रेड कर सकते हैं। इसका एक उदाहरण 2020 में भी दिखा। मार्च 2020 में जब कोरोना की पहली लहर से पूरी दुनिया डर कर कांप रही थी, तभी शेयर बाजारों में सारे लिवालों ने सरेंडर कर दिया। इसी महीने शेयर बाजारों में भारी गिरावट दिखी और 12 फरवरी 2020 से शुरू हुई बिकवाली में 24 मार्च आते-आते निफ्टी का 40 प्रतिशत वैल्यूएशन खत्म हो गया। 25 मार्च से बाजार में बढ़त शुरू हुई। यह मजेदार तथ्य है कि उसी दिन से भारत में अभूतपूर्व लॉकडाउन भी शुरू हुए जिन्हें अगली पूरी तिमाही यानी अप्रैल-जून 2021 में अर्थव्यवस्था को ऐतिहासिक नुकसान पहुंचाया।
अर्थव्यवस्था इस तिमाही में 22 प्रतिशत से ज्यादा सिकुड़ी, लेकिन शेयर बाजार बढ़ते रहे। और पिछले साल अक्टूबर में गिरावट आने तक ये बढ़ते ही गये। 24 मार्च को 7511 के निम्नतम स्तर से बढ़कर निफ्टी ने 18604 का उच्चतम स्तर छू लिया। ऐसे क्या हुआ कि शेयर बाजार ढाई गुना बढ़ गया, जबकि अर्थव्यवस्था अब भी संघर्ष कर रही है। जवाब एक बार फिर वही है- लिक्विडिटी। कोरोना की पहली लहर के बाद एक बार फिर दुनिया भर के बैंकों ने अपने खजाने खोल दिए।
मिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी फेड ने 2020 की शुरुआत के बाद से जितने नोट छापे, वह गिनती के लिहाज से उसके पहले के 106 वर्षों में छापे गये कुल नोटों से ज्यादा है। इसे इस आंकड़े से समझा जा सकता है कि 1 जनवरी 2020 तक फेड का कुल असेट 4.17 लाख करोड़ डॉलर था, जो कि 8 दिसंबर 2021 तक बढ़ कर 8.66 लाख करोड़ डॉलर पर पहुंच गया।
इसी तरह भारतीय रिजर्व बैंक और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने भी मई 2020 में 20 लाख करोड़ रुपये के राहत पैकेज की घोषणा की। जाहिर है कि ये सारे पैसे कहीं न कहीं से घूम फिर कर शेयर बाजारों में पहुंचे और वैल्यूएशन की छत बढ़ती ही गई। लेकिन अर्थशास्त्र में एक बहुत ही आधारभूत नियम है कि जब बहुत सारी मुद्रा कम संसाधनों के पीछे भागती हैं, तो दाम बढ़ते हैं। यह स्थिति अर्थशास्त्र में इनफ्लेशन या महंगाई दर कही जाती है और यह एक ऐसा भूत है, जिससे दुनिया की हर सरकार और सरकारों से भी ज्यादा सेंट्रल बैंक घबराते हैं।
2021 की शुरुआत से ही अमेरिकी में खुदरा महंगाई दर में वृद्धि दिखनी शुरू हो गई थी। जाहिर है यह लिक्विडिटी के लिए खतरे की घंटी थी। फेडरल बैंक ने लिक्विडिटी कम करने के लिए बॉन्ड खरीद की अपनी योजना पर ब्रेक लगाने का फैसला किया। नवंबर तक फेड हर महीने 120 अरब डॉलर के बॉन्ड खरीद रहा था, जिसे उसने हर महीने 15 अरब डॉलर की दर से कम करने का फैसला किया। यानी जुलाई तक बॉन्ड खरीद पूरी तरह बंद हो जानी थी। उसके बाद यह संभावना थी कि ब्याज दरें धीरे-धीरे बढ़नी शुरू होंगी।
लेकिन जब नवंबर 2021 में अमेरिका में शहरी उपभोक्ताओं के लिए खुदरा महंगाई दर 6.8% पर पहुंची, तो अमेरिकी फेडरल बैंक के हाथ-पांव फूल गये। इससे पहले ठीक 40 साल पूर्व जून 1982 में अमेरिका में खुदरा महंगाई दर इस स्तर पर (7.1%) पहुंची थी। फेड ने अपनी पुरानी योजना में संशोधन किया और बॉन्ड खरीद में कटौती को दोगुना कर हर महीने 30 अरब डॉलर कर दिया। यानी अब मार्च 2022 तक फेडरल रिजर्व की बॉन्ड खरीद पूरी तरह बंद हो जाएगी। फेड ने यह भी साफ कर दिया है कि 2022 के दौरान वह 3-4 बार ब्याज दरें बढ़ा सकता है और इसकी शुरुआत मार्च से हो जाएगी।
अमेरिका में होने वाले इन फैसलों और उनके नतीजों का सीधा और साफ असर भारतीय शेयर बाजारों पर होना तय है क्योंकि भारतीय शेयर बाजारों में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की भूमिका में शायद ही किसी को संदेह हो। रिकॉर्ड के लिए, अप्रैल 2020 से सितंबर 2021 तक जब शेयर बाजार के सूचकांक करीब 150% चढ़े, उस दौरान FII का भारतीय शेयर बाजारों में शुद्ध निवेश करीब 1.60 लाख करोड़ था, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने 80 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की शुद्ध बिकवाली की थी।
साफ है कि वह लिक्विडिटी अब सूखने जा रही है, जिस पर तैर कर भारतीय शेयर बाजार रोज नई बुलंदियां छू रहे थे। ऐसे में यह उम्मीद कर बैठे रहना कि शेयर बाजार अब भी पुरानी ऊंचाइयों पर ही चढ़ते जाएंगे, हवा में किले बनाने जैसा होगा। इसके अलावा कुछ और खतरे भी मुंह बाए हैं, जिनमें यूक्रेन पर रूस का हमला प्रमुख है। यदि ऐसा हुआ तो कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ेंगी और भारत का वित्तीय घाटा भी। कुल मिलाकर भारतीय शेयर बाजार एक भारी गिरावट के मुहाने पर बैठे दिख रहे हैं और इस सच्चाई से मुंह मोड़ने वाले निवेशकों को जोर के झटके के लिए तैयार रहने चाहिए।
(लेखक कृषि और आर्थिक मामलों के जानकार हैं)
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