कंपनी के खुद को स्टॉक एक्सचेंज से डीलिस्ट कराने पर निवेशकों के लिए होते हैं क्या-क्या विकल्प?

कंपनियां कई वजहों से डीलिस्टिंग यानी अपने स्टॉक्स को स्टॉक एक्सचेंजों से हटाने का फैसला लेती हैं। इसके लिए उन्हें सेबी के डीलिस्टिंग के नियमों का पालन करना पड़ता है। कंपनी के खुद को डीलिस्ट कराने से उसके शेयरधारकों के सामने अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो जाती है

अपडेटेड Aug 21, 2024 पर 4:25 PM
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वेदांता रिसोर्सेज ने कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर को आसान बनाने के लिए 2020 में अपनी इंडियन सब्सिडियरी को डीलिस्ट कराया था।

कंपनी के खुद को स्टॉक एक्सचेंज से डीलिस्ट कराने के फैसले से शेयरहोल्डर्स के लिए स्थिति अनिश्चित हो जाती है। कई कारणों से कंपनियां डीलिस्टिंग के फैसले लेती हैं। कई बार कंपनी बिजनेस की रिस्ट्रक्चरिंग की वजह से डीलिस्टिंग का फैसला लेती है। कुछ कंपनियां पब्लिक से प्राइवेट बनने के लिए डीलिस्टिंग कराती हैं। खुद को स्टॉक एक्सचेंज से डीलिस्ट कराने वाली कंपनी को सेबी के नियमों का प्लान करना पड़ता है।

कई वजहों से होती है डीलिस्टिंग

वेदांता रिसोर्सेज ने कॉर्पोरेट स्ट्रक्चर को आसान बनाने के लिए 2020 में अपनी इंडियन सब्सिडियरी को डीलिस्ट (Delist) कराया था। कई बार स्टॉक एक्सचेंज के लिस्टिंग के नियमों का पालन नहीं कर पाने की वजह से कंपनी खुद को डीलिस्ट कराने के मजबूर हो जाती है। 2018 में Kingfisher Airlines को इसलिए डीलिस्ट होना पड़ा था, क्योंकि वह लिस्टिंग से जुड़े नियमों का पालन करने में नाकाम रही थी।


डीलिस्टिंग के बाद शेयरों में नहीं होती ट्रेडिंग

कंपनी के डीलिस्ट होने के बाद स्टॉक एक्सचेंजों में उसके शेयरों में ट्रेडिंग बंद हो जाती है। इसका असर उसके शेयरों की लिक्विडिटी और निवेश की वैल्यू पर पड़ता है। इसके अलावा डीलिस्टिंग के बाद उस कंपनी के बारे में खबरें आनी कम हो जाती है। इससे निवेशकों को सही फैसले लेने में दिक्कत होती है। लेकिन, निवेशक को सबसे बड़ी समस्या लिक्विडिटी के मामले में आती है।

1000 से ज्यादा कंपनियां करा चुकी हैं डीलिस्टिंग

सेबी के मुताबिक, 2004 से 2020 के बीच स्टॉक एक्सचेंजों से 1,000 से ज्यादा कंपनियों ने खुद को डीलिस्ट कराया है। डीलिस्ट हो चुकी कंपनी के शेयरों की फेयर वैल्यू तय करना मुश्किल हो जाता है। उदाहरण के लिए 2019 में जेट एयरवेड के डीलिस्ट होने के बाद निवेशकों को अपने निवेश की वैल्यू का अंदाजा लगाने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था।

कंपनी के डीलिस्ट होने पर शेयरहोल्डर्स को क्या करना चाहिए?

सबसे पहले शेयरहोल्डर्स को यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि कंपनी ने खुद को क्यों डीलिस्ट कराया है। अगर कंपनी ने लॉन्ग टर्म ग्रोथ के लिए डीलिस्ट कराया है तो इसका मतलब है कि आगे कंपनी के लिए अच्छी संभावना है। शेयरधारक ओटीसी मार्केट जा सकते हैं। इस मार्केट में अनलिस्टेड कंपनियों के शेयरों में ट्रेडिंग होती है। बीएसई के डिसेमिनेशन बोर्ड फैसिलिटीज में डीलिस्टेड कंपनी के शेयरों में ट्रेडिंग होती है।

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निवेशक डीलिस्ट होने वाली कंपनी के कम्युनिकेशन का इंतजार कर सकते हैं। इससे उन्हें फैसला लेने में आसानी होगी। अगर ऐसी कोई कंपनी डीलिस्ट होती है, जिसके शेयरों में आपने निवेश किया हो तो आपको सबसे डीलिस्टिंग की वजहों को समझने की कोशिश करनी चाहिए। शेयरहोल्डर्स अपने निवेश को भुनाने के लिए ओटीसी मार्केट जा सकते हैं, प्रोफेशनल वैल्यूअर की मदद ले सकते हैं।

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