Experts view : स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ पर स्थिति साफ़ होने तक मार्केट में सुधार की संभावना नहीं, डॉलर के मुकाबले 100 के लेवल तक टूट सकता है रुपया
Experts view : दिवम शर्मा का मानना है कि जब तक होर्मुज़ जलडमरूमध्य को लेकर स्थिति साफ़ नहीं हो जाती,तब तक बाज़ार में कोई टिकाऊ तेज़ी नहीं आ सकती। यह कोई मामूली भू-राजनीतिक घटना नहीं है जिसे बाज़ार नज़रअंदाज़ कर सके
Expert View:अगर कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर से ऊपर बनी रहती हैं और अप्रैल के मध्य तक मिडिल ईस्ट संकट का कोई कूटनीतिक समाधान नहीं निकलता,तो डॉलर के मुकाबले रुपया 98–100 का स्तर छू सकता है
Experts view : FIIs ने FY26 में अब तक भारतीय इक्विटी मार्केट में 3.17 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा की बकवाली की है। SIP फ़्लो और रिटेल निवेशकों की खरीदारी वजह से घरेलू सेंटीमेंट कुछ समय तक तो ठीक रह सकता है,लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या सचमुच कोई बड़ी और व्यापक तेज़ी आएगी? इसके जवाब में ग्रीन पोर्टफोलियो PMS के को-फाउंडर और फंड मैनेजर दिवम शर्मा ने मनीकंट्रोल से हुई बातचीत में कहा कि होर्मुज़ पर स्थिति साफ़ होना ज़रूरी है। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक कोई भी तेज़ी सिर्फ़ बेयर मार्केट का उछाल होगी,न कि किसी नए दौर की शुरुआत।
दिवम शर्मा का मानना है कि जब तक होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को लेकर स्थिति साफ़ नहीं हो जाती,तब तक बाज़ार में कोई टिकाऊ तेज़ी नहीं आ सकती। यह कोई मामूली भू-राजनीतिक घटना नहीं है जिसे बाज़ार नज़रअंदाज़ कर सके।
उन्हें उम्मीद है कि अगले हफ़्ते RBI वित्त वर्ष 2027 के अपने ग्रोथ अनुमानों में काफ़ी कटौती कर सकता है। वित्त वर्ष 2027 के लिए ग्रोथ अनुमान 6.2–6.5 फीसदी के आसपास रह सकता है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि RBI दूसरी तिमाही तक जारी रहने वाले होर्मुज़ जोखिम को कितना महत्व देता है। उन्होंने आगे कहा कि वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही में महंगाई का अनुमान 4.5–5.0 फीसदी के करीब हो सकता है।
बाज़ार की उम्मीदों के मुताबिक ही दिवम शर्मा भी इस बात पर सहमत हैं रेपो रेट कम से कम 2027 के मध्य तक 5.25 प्रतिशत पर ही बना रहेगा। उन्होंने कहा कि जब तक हमें पश्चिम एशिया में तनाव में कोई भारी कमी और कच्चे तेल की कीमतों में कोई बड़ी गिरावट देखने को नहीं मिलती,तब तक RBI के हाथ बंधे हुए हैं।
क्या आपको लगता है कि जब तक होर्मुज़ स्ट्रेट की स्थिति में सुधार नहीं होता, तब तक बाज़ार में कोई तेज़ और टिकाऊ तेज़ी देखने को नहीं मिलेगी?
हां यह बिल्कुल सही है। मैं यह बात साफ़-साफ़ कह रहा हूं कि जब तक होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बंद रहेगा,तब तक बाज़ार में कोई भी टिकाऊ तेज़ी नहीं आ सकती। यह कोई मामूली भू-राजनीतिक घटना नहीं है जिसे बाज़ार नज़रअंदाज़ कर सकें। दुनिया का 20 फीसदी समुद्री तेल का व्यापार इसी रास्ते से गुज़रता है। ब्रेंट क्रूड की कीमत पहले ही 100 डॉलर प्रति बैरल का आंकड़ा पार करके अपने शिखर पर 126 डॉलर तक पहुंच चुकी है। हम 1970 के दशक के बाद से एनर्जी सप्लाई में आई सबसे बड़ी रुकावट का सामना कर रहे हैं। यह कोई बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात नहीं है,डलास फेड ने भी इस पर चिंता जताई है।
खास तौर पर भारत पर इसका असर बहुत सीधा सा है। हम अपने कच्चे तेल का 80 फीसदी से ज़्यादा हिस्सा आयात करते हैं। कच्चा तेल पूरी अर्थव्यवस्था में सबसे अहम इनपुट लागत है। यह लॉजिस्टिक्स से लेकर खाद और पैकेजिंग तक,हर चीज़ में शामिल होता है। ईरान ने चुनिंदा तौर पर भारतीय जहाज़ों को इस रास्ते से गुज़रने की इजाज़त दी है। इससे कुछ हद तक मदद मिल सकती है,लेकिन इससे बुनियादी दिक्कत खत्म नहीं होती। टैंकरों के लिए बीमा प्रीमियम आसमान छू रहे हैं,जहाजों को'केप ऑफ़ गुड होप'की ओर मोड़ा जा रहा हैऔर कतर से आने वाली LNG की सप्लाई (जिस पर हम बहुत ज़्यादा निर्भर हैं) को काफी नुकसान पहुंचा है। कतर के गैस इंफ्रा ढांचे को ठीक करने में शायद कई साल लग जाएं।
बाज़ार के नज़रिए से देखें तो संस्थागत निवेशक (institutional investors) तब तक बाजार से परहेज कर सकते हैं जब तक कि सबसे बड़े मैक्रो फैक्टर यानी एनर्जी सेफ्टी को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है। FIIs ने FY26 में अब तक भारतीय इक्विटीज़ बाजार में 3.17 लाख करोड़ रुपये से ज़्यादा की बिकवाली की है। SIP निवेश और खुदरा निवेशकों की तरफ से हुई खरीदारी की वजह से घरेलू माहौल कुछ समय तक तो ठीक रह सकता है,लेकिन सचमुच किसी बड़ी और व्यापक तेज़ी के लिए होर्मुज़ (Hormuz) को लेकर स्पष्टता ज़रूरी है। तब तक,कोई भी तेज़ी सिर्फ़ 'बेयर मार्केट बाउंस'(गिरते बाज़ार में आई छोटी सी तेज़ी)होगी,न कि किसी नए दौर की शुरुआत।
क्या आपको लगता है कि शॉर्ट टर्म झटके भारत के लॉन्ग टर्म ग्रोथ स्टोरी को पटरी से नहीं उतार पाएंगे?
भारत लॉन्ग टर्म ग्रोथ स्टोरी अभी भी मज़बूत है हम किसी भी भू-राजनीतिक झटके की वजह से ( चाहे वह कितना भी गंभीर क्यों न हो) भारत की लॉन्ग टर्म ग्रोथ स्टोरी को खारिज नहीं कर सकते। घरेलू खपत बढ़ रही है, देश पूंजीगत खर्च (capex) बढ़ रहा है। इसके अलावा हमें देश की युवा आबादी का भी फायदा मिल रहा है।
सबसे बड़ी बात यह है कि एनर्जि सेक्टर में भारत ने काफ़ी समझदारी से कदम उठाए हैं। पिछले कुछ सालों में हमने कच्चे तेल की अपनी सोर्सिंग में काफ़ी विविधता लाई है। रूसी कच्चा तेल अब हमारे इंपोर्ट बास्केट का एक अहम हिस्सा बन गया है। ईरान ने खास तौर पर भारतीय जहाज़ों को होर्मुज से आने-जाने की छूट दी है। हमारे रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार भले ही बहुत बड़े न हों फिर भी एक बफ़र का काम ज़रूर करते हैं। हालांकि LNG के फ्रंट पर कुछ समय के लिए परेशानी हो सकती है। लेकिन हम उतने ज़्यादा जोखिम में नहीं हैं,जितने कि पाकिस्तान या यूरोप के कुछ हिस्से हैं।
हमारी घरेलू मैक्रो पिक्तर भी काफी मज़बूत है। सितंबर तिमाही में GDP ग्रोथ 8.2 प्रतिशत थी। CPI महंगाई दर साल के ज़्यादातर हिस्से में RBI के 4 फीसदी के लक्ष्य से काफी नीचे रही है। इसके अलावा बजट में GST में हुए बदलाव और इनकम टैक्स में एडजस्टमेंट का असर अब मांग पर दिखने लगा है। यह यूरोप की स्थिति से बिल्कुल अलग है,जहां ECB स्टैगफ्लेशन की चेतावनी दे रहा है और कई अर्थव्यवस्थाएं टेक्निकल मंदी का सामना कर रही हैं।
इस सबके बावजूद अगर मिडिल ईस्ट का टकराव गर्मियों तक खिंचता है तो सारे समीकरण बदल जाएंगे। इतनी बड़ी तीव्रता का यह लंबा झटका चालू खाता घाटे को काफी हद तक बढ़ा देगा,महंगाई को फिर से एक असामान्य स्तर पर पहुंचा देगा और RBI को ऐसी मुश्किल स्थिति में डाल देगा जहां वह विकास को बढ़ावा देने के लिए ब्याज दरें कम नहीं कर पाएगा। यह संकट जितना लंबा चलेगा,भारत ने बड़ी सावधानी से जो राजकोषीय अनुशासन (fiscal space) कायम किया है, वह उतनी ही कम होता जाएगा। ऐसे में अगर यह संघर्ष जल्द खत्म हो जाएगा तो इसका कोई खास असर नहीं होगा। वहीं, अगर यह लंबा खिंचता है तो निश्चिततौर पर हमें इसका खामियाजा भुगतना होगा।
क्या आपको लगता है कि अगर अप्रैल में तनाव कम नहीं होता है, तो अमेरिका में मंदी आने की संभावना है?
अब इसकी संभावना चिंताजनक रूप से काफ़ी ज़्यादा हो गई है। Goldman Sachs ने तो 12 महीनों के भीतर मंदी आने की संभावना को बढ़ाकर 30 फीसदी कर दिया है। EY-Parthenon इसकी संभावना 40 प्रतिशत मान रहा है। Moody’s के Mark Zandi ने चेतावनी दी है कि अगर तनाव कम नहीं हुआ,तो साल के दूसरे छमाही तक मंदी आने की संभावना बहुत ज़्यादा है।
अगर ब्रेंट क्रूड 125 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना रहता है और अप्रैल के मध्य तक कोई सीज़फ़ायर नहीं होता तो मुझे लगता है कि मंदी आनी पक्की हो जाएगी। US 30 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था है और यह मज़बूत है,लेकिन मज़बूत सिस्टम की भी एक हद होती है और हम बहुत तेज़ी से उस हद के करीब पहुंच रहे हैं।
क्या आपको लगता है कि अगर पश्चिम एशिया में युद्ध की स्थिति बनी रहती है तो अप्रैल में डॉलर के मुकाबले रुपया 100 के स्तर तक पहुच सकता है?
हां,अगर छह महीने पहले किसी ने मुझसे कहा होता कि हम 95 के स्तर पर रुपये को जाते देख रहे हैं तो मैं कहता कि यह एक बहुत ही दूर की कौड़ी (extreme tail risk) है। लेकिन यह आज की सच्चाई पिछले हफ़्ते रुपया 94.82 के स्तर पर पहुंच गया,जो अकेले FY26 में 10 प्रतिशत से ज़्यादा की गिरावट है। यह 2011-12 के यूरोज़ोन संकट के बाद से सबसे बड़ी सालाना गिरावट है। अब हमको लगता है कि डॉलर के मुकाबले रुपया 100 के स्तर पर भी पहुंच सकता है।
हम पहले ही 94 से ऊपर हैं। अगर संघर्ष और बढ़ता है तो कच्चे तेल की कीमतें उछलकर 150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। उस स्तर पर,भारत का आयात बिल सालाना 40–50 अरब डॉलर तक बढ़ जाता है,चालू खाता घाटा GDP के 3 फीसदी से ज़्यादा हो जाता है। इससे रुपये पर इतना दबाव आ सकता है जिसे RBI के कड़े हस्तक्षेप से भी रोका नहीं जा सकता।
सभी स्ट्रक्चरल इंडीकेटर निगेटिव जोन में हैं। FIIs लगातार बिकवाली कर रहे हैं। इनकी तरफ से साल की शुरुआत से अब तक 18 अरब डॉलर से ज़्यादा की निकासी हो चुकी है। RBI मार्च में ही अपने रिज़र्व में से 30 अरब डॉलर खर्च कर चुका है। जनवरी में सोने का आयात 349 फीसदी बढ़ गया,जिससे डॉलर की मांग और बढ़ गई। इस बीच बैंकों के फ़ॉरेक्स एक्सपोज़र पर RBI की नई लिममिट लगाई है जो जोखिम प्रबंधन के नज़रिए से तो समझदारी भरा कदम हैं,लेकिन इससे यह भी संकेत मिलता है कि केंद्रीय बैंक के पास पारंपरिक हथियार कम पड़ रहे हैं।
ऐसे में अगर कच्चे तेल की कीमतें 110 डॉलर से ऊपर बनी रहती हैं और अप्रैल के मध्य तक मिडिल ईस्ट संकट का कोई कूटनीतिक समाधान नहीं निकलता,तो मुझे लगता है कि डॉलर के मुकाबले रुपया 98–100 का स्तर छू सकता है। ऐसी स्थिति में RBI को अपनी करेंसी को बचाने और रिज़र्व को सुरक्षित रखने में से किसी एक को चुनना पड़ सकता है। पिछले आंकड़ों पर नजर डालें तो पता चलता है कि जब उभरते बाज़ारों के केंद्रीय बैंकों के सामने यह स्थिति पैदा होती है तो मुद्रा के मूल्य में ही बदलाव होता है।
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