FPI फिर बने सेलर, पश्चिम एशिया संकट के बीच 4 ट्रेडिंग सेशन में भारतीय शेयरों से निकाले ₹21000 करोड़

FPI's Selling in March: पश्चिम एशिया संघर्ष को लेकर अनिश्चितता, बाजार में हालिया करेक्शन, कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि और रुपये की गिरावट ने FPI की बिकवाली में योगदान दिया है। ग्लोबल निवेशक अमेरिकी डॉलर जैसे सुरक्षित एसेट्स की ओर शिफ्ट हो गए हैं

अपडेटेड Mar 08, 2026 पर 1:37 PM
FPI ने फरवरी में भारतीय इक्विटी में 22,615 करोड़ रुपये का निवेश किया था।

विदेशी निवेशक फिर से सेलर बन गए हैं। पश्चिम एशिया संकट के बीच उन्होंने पिछले 4 कारोबारी सत्रों के दौरान भारतीय इक्विटी से 21,000 करोड़ रुपये निकाले हैं। इससे पहले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) ने फरवरी में भारतीय इक्विटी में 22,615 करोड़ रुपये का निवेश किया था। फरवरी का निवेश पिछले 17 महीनों का उच्च स्तर था। 17 महीने पहले यानि कि सितंबर 2024 में FPI ने भारतीय शेयरों में 57724 करोड़ रुपये डाले थे।

फरवरी से पहले FPI लगातार तीन महीनों तक शुद्ध विक्रेता रहे थे। डिपॉजिटरी के आंकड़ों के अनुसार, उन्होंने इस साल जनवरी में 35,962 करोड़ रुपये, दिसंबर 2025 में 22,611 करोड़ रुपये और नवंबर 2025 में 3,765 करोड़ रुपये के शेयर बेचे थे। 2-6 मार्च 2026 के दौरान FPI ने 'कैश मार्केट' में लगभग 21,000 करोड़ रुपये मूल्य के शेयर बेचे। 3 मार्च को होली के चलते बाजार बंद थे।

बाजार विशेषज्ञों ने इस सेलिंग का मुख्य कारण पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव बताया है। 28 फरवरी 2026 को ईरान पर US और इजरायल ने हमले कर दिए। इन हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई और इस्लामिक रिपब्लिक के दूसरे बड़े लोग मारे गए। इसके बाद ईरान ने भी जवाब देते हुए मिसाइल और ड्रोन से इजरायल पर हमले कर दिए। साथ ही मध्यपूर्व के कई देशों में भी अमेरिकी मिलिट्री बेस और इजरायल से जुड़े एसेट्स को निशाना बनाकर हमले किए।


इन कारणों ने बिगाड़ा सेंटिमेंट

न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, एंजेल वन के सीनियर फंडामेंटल एनालिस्ट वकारजावेद खान का कहना है कि समुद्री मार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में व्यवधान के डर ने ब्रेंट क्रूड की कीमतों को 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचा दिया। इससे वैश्विक स्तर पर जोखिम से बचने की धारणा पैदा हुई। इसके अलावा रुपया 92 प्रति डॉलर के स्तर से नीचे चला गया, जबकि अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी हुई। इससे बाजार की धारणा कमजोर हुई।

स्ट्रेट ऑफ होर्मुज फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित एक अत्यंत संकरा और रणनीतिक समुद्री मार्ग है। यह ईरान और ओमान/यूएई के बीच स्थित है। दुनिया के कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। भारत अपने कच्चे तेल का लगभग 40% मिडिल ईस्ट से इंपोर्ट करता है। इस सप्लाई का ज्यादातर हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है।

जियोजित इनवेस्टमेंट्स में चीफ इनवेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वी के विजयकुमार के मुताबिक, पश्चिम एशिया संघर्ष को लेकर अनिश्चितता, बाजार में हालिया करेक्शन, कच्चे तेल की कीमतों में तेज वृद्धि और रुपये की गिरावट ने FPI की बिकवाली में योगदान दिया है।

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महंगे क्रूड के परिणाम

मॉर्निंगस्टार इनवेस्टमेंट रिसर्च इंडिया के प्रिंसिपल मैनेजर रिसर्च, हिमांशु श्रीवास्तव का कहना है कि कच्चे तेल की ज्यादा कीमतें महंगाई, चालू खाता घाटा और मुद्रा में स्थिरता से जुड़े रिस्क को बढ़ाती हैं। ये चीजें आम तौर पर उभरते बाजारों के प्रति विदेशी निवेशकों की सोच पर असर डालती हैं। बढ़ती अनिश्चितता के बीच ग्लोबल निवेशक भी अमेरिकी डॉलर जैसे सुरक्षित एसेट्स की ओर शिफ्ट हो गए हैं। इस हफ्ते US ट्रेजरी यील्ड में हालिया तेजी ने उभरते बाजारों से कैपिटल निकालने में और योगदान दिया।

विजयकुमार ने आगे कहा कि जब तक भूराजनीतिक स्थिति पर ज्यादा स्पष्टता नहीं आती और कच्चे तेल की कीमतें कम नहीं होतीं, तब तक FPI के खरीदार के तौर पर वापस आने की संभावना नहीं है। उन्होंने कहा, "ब्रेंट क्रूड का USD 90 प्रति बैरल से ऊपर ट्रेड करना भारतीय अर्थव्यवस्था और इक्विटी बाजारों के लिए नेगेटिव है।"

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