FPI Selling: विदेशी निवेशकों ने बनाया बिकवाली का इतिहास, मार्च में बेच दिए ₹1 लाख करोड़ के शेयर
FPI Selling: भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने चिंता बढ़ा दी है। मार्च महीने में अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) करीब 11 अरब डॉलर (लगभग 1 लाख करोड़ रुपये) के भारतीय शेयर बेच चुके हैं। यह किसी एक महीने में उनकी ओर से की गई अब तक की सबसे बड़ी बिकवाली मानी जा रही है
FPI Selling: मार्च में अब तक निफ्टी डॉलर टर्म्स में करीब 17% तक गिर चुका है
FPI Selling: भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली ने चिंता बढ़ा दी है। मार्च महीने में अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) करीब 11 अरब डॉलर (लगभग 1 लाख करोड़ रुपये) के भारतीय शेयर बेच चुके हैं। यह किसी एक महीने में उनकी ओर से की गई अब तक की सबसे बड़ी बिकवाली मानी जा रही है। यह बिकवाली ऐसे समय में हुई है जब निफ्टी-50 का वैल्यूएशन प्रीमियम भी घटकर ग्लोबल बाजारों के करीब आ गया है। लेकिन इसके बावजूद विदेशी निवेशकों का भरोसा कमजोर बना हुआ है।
रिकॉर्ड स्तर पर बिकवाली
ब्लूमबर्ग के आंकड़ों के अनुसार, मार्च 2026 में अब तक का सबसे बड़ा FPI निकासी देखने को मिली है। इससे पहले अक्टूबर 2024 में इन विदेशी निवेशकों ने करीब 10.9 अरब डॉलर की बिकवाली की थी। इसके अलावा जनवरी 2025 और कोराना काल के दौरान मार्च 2020 में भी उन्होंने लगभग 8.4 अरब डॉलर के आसपास निकासी की थी। लेकिन इस बार का आंकड़ा उन सभी से ज्यादा है।
क्यों जा रहे हैं विदेशी निवेशक?
विदेशी निवेशकों की इस निकासी के पीछे एक्सपर्ट्स कई बड़े कारण बता रहे हैं। सबसे बड़ा कारण है अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड मार्च की शुरुआत से 50 बेसिस प्वाइंट बढ़कर करीब 4.4% तक पहुंच गई है, जिससे रिस्क-फ्री निवेश ज्यादा आकर्षक हो गए हैं।
इसके साथ ही भारतीय रुपया भी कमजोर हुआ है, जिससे विदेशी निवेशकों के रिटर्न पर असर पड़ता है। रुपये में गिरावट होने पर निवेशकों को डॉलर में कम रिटर्न मिलता है, जिससे वे पहले ही निवेश निकालना पसंद करते हैं।
रुपये की कमजोरी ने बढ़ाया दबाव
मार्च के दौरान रुपया करीब 4% कमजोर हुआ है और 27 मार्च को यह 94.78 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया। कमजोर मुद्रा विदेशी निवेशकों के लिए दोहरी मार साबित होती है। एक तरफ शेयर बाजार गिरता है और दूसरी तरफ उनको करेंसी लॉस भी होता है।
कच्चे तेल की कीमतें बनी चिंता
पश्चिम एशिया में जारी तनाव के चलते ब्रेंट क्रूड का भाव लगातार 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बना हुआ है। भारत जैसे तेल आयातक देश के लिए यह स्थिति नेगेटिव मानी जाती है। क्योंकि इससे महंगाई, चालू खाते का घाटा और कॉरपोरेट मुनाफे पर दबाव बढ़ता है। होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए सप्लाई बाधित होने की आशंका ने भी निवेशकों को सतर्क कर दिया है।
अर्निंग्स अनुमानों में कटौती
मार्केट एनालिस्ट्स ने अब वित्त वर्ष 2026 के लिए निफ्टी कंपनियों की कमाई के अनुमान में 2-3% तक कटौती शुरू कर दी है। UBS के ग्लोबल स्ट्रैटेजिस्ट भानु बावेजा के मुताबिक, “भारत में FPI इनफ्लो फिलहाल सीमित रहने की संभावना है और रुपया भी कमजोर बना रह सकता है।” इसका मतलब है कि निकट भविष्य में विदेशी निवेश की वापसी आसान नहीं दिख रही।
निफ्टी का वैल्यूएशन हुआ सस्ता
मार्च में निफ्टी डॉलर टर्म्स में करीब 17% तक गिर चुका है। इससे इसका वैल्यूएशन घटकर 12 महीने के फॉरवर्ड पी/ई पर 17.4 गुना रह गया है, जो इसके 5 साल के औसत 20 गुना से कम है। इसके बावजूद विदेशी निवेशक अभी भी बाजार में जोखिम लेने से बच रहे हैं, जो निवेशकों के लिए चिंता का संकेत है।
यह ट्रेंड सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। मार्च में विदेशी निवेशकों ने ताइवान से 23 अरब डॉलर और दक्षिण कोरिया से 17.4 अरब डॉलर की निकासी की है। इससे साफ है कि ग्लोबल स्तर पर निवेशक जोखिम से बचने की रणनीति अपना रहे हैं।
भारतीय बाजार में FPI की हिस्सेदारी
नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) के अनुसार, 15 मार्च तक विदेशी निवेशकों के पास भारतीय शेयर बाजार में करीब 710 अरब डॉलर का निवेश था, जो कुल मार्केट का लगभग 15% है।
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