भारत में गुमराह हुए निवेशकों की बड़ी फौज, सही जानकारी देने में नाकाम रहे एक्सपर्ट और मीडिया

1990 के दशक की आखिरी दौर में पोखरण-2 के बाद हमने 'बिजनेस वर्ल्ड' मैगजीन में अपना साप्ताहिक कॉलम लिखा था। उस वक्त यह मुद्दा गर्म था कि अगर फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स (FIIs) बाजार से बाहर निकलने का फैसला करते हैं, तो क्या होगा। आम सहमति यह थी कि अगर सभी डॉलर भारत से बाहर निकल जाएं, तो भारत बर्बाद हो जाएगा। उस वक्त भी 1991 जैसे आर्थिक संकट का डर सता रहा था। हालांकि, मेरी सोच यह थी कि डॉलर के भारत से बाहर निकलने की संभावना नहीं के बराबर है

अपडेटेड Jan 28, 2025 पर 9:27 PM
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जाने-माने निवेशक शंकर शर्मा का कहना है कि निवेश करना दुस्साहस का मामला नहीं है।

शंकर शर्मा

1990 के दशक के आखिरी दौर में पोखरण-2 के बाद हमने 'बिजनेस वर्ल्ड' मैगजीन में अपना साप्ताहिक कॉलम लिखा था। उस वक्त यह मुद्दा गर्म था कि अगर फॉरेन इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स (FIIs) बाजार से बाहर निकलने का फैसला करते हैं, तो क्या होगा। आम सहमति यह थी कि अगर सभी डॉलर भारत से बाहर निकल जाएं, तो यह देश बर्बाद हो जाएगा। उस वक्त भी 1991 जैसे आर्थिक संकट का डर सता रहा था। हालांकि, मेरी सोच यह थी कि डॉलर के भारत से बाहर निकलने की संभावना नहीं के बराबर है।

मेरा मानना था कि डॉलर भारत नहीं छोड़ सकता। इसलिए नहीं कि डॉलर को भारत से बहुत प्यार है, बल्कि उसके लिए भारत से बाहर निकलना असंभव जैसा है। मेरा तर्क यह था कि जब FIIs शेयरों को बेचने का फैसला करते हैं, तो कोई खरीदने वाला भी होना चाहिए। हालांकि, हम भूखे-नंगे देश वाले हैं और दूसरी तरफ कोई खरीदार नहीं है। ऐसे में क्या होगा। बाजार में बिना वॉल्यूम के गिरावट होगी।

मेरे पास दशकों से FIIs के लिए अरबों डॉलर के ट्रेड को अंजाम देने का अनुभव है और इस आधार पर मैं कह सकता हूं कि जब आप बाजार में बड़ी संख्या में शेयरों की बिक्री करना चाहते हैं और दूसरी तरफ कोई खरीदार नहीं रहता है, तो बाजार में बिना वॉल्यूम के गिरावट होती है।


मिसाल के तौर पर किसी कंपनी में FIIs ने 1 अरब डॉलर का निवेश कर रखा है और वे इसे पूरी तरह से बेचना चाहते हैं। वे इसे बेचने की कोशिश करते हैं और सिर्फ 10 लाख डॉलर की बिक्री में ही कीमत 20 पर्सेंट तक गिर जाती है।

उस वक्त FIIs क्या सोचते थे? उन्हें लगता था कि और 10-20 लाख डॉलर के शेयरों बिक्री पर फिर 20-30 पर्सेंट की गिरावट हो सकती है।

इस प्रक्रिया से गुजरने वाला कोई भी FII जानता है कि यह बेवकूफाना हरकत है। मसलन आप अपनी होल्डिंग का महज 1-2 पर्सेंट बेच पाए हैं और इस प्रक्रिया में आपकी पेपर वैल्यू 50 करोड़ डॉलर कम हो जाती है। लिहाजा, मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि उस वक्त FIIs सिर्फ बाजार में घुस सकते थे। बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं था। एक तरीके से यह वित्तीय तिलिस्म था। देश को 10-20 लाख डॉलर का नुकसान होने पर हम 1 करोड़ डॉलर वापस ले आते थे।

हालांकि, अब ऐसा नहीं है। पिछले 5 साल में युवा भारतीय निवेशकों की ऐसी फौज तैयार हुई है, जिन्हें उस वक्त खरीदारी के लिए प्रेरित किया जाता है, जब FIIs बिकवाली कर रहे होते हैं। लिहाजा, तकनीकी तौर पर उनकी बिकवाली की राह और आसान हो जाती है।

दरअसल, पिछले एक दशक से भारतीय निवेशकों की ब्रेनवॉशिंग कर उन्हें बेवकूफ बनाया जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में मीडिया की तरफ से इस मोर्चे पर किसी भी तरह की सार्थक जानकारी मुहैया नहीं कराई गई है। शेयर बाजार से जुड़े असहज करने वाले तथ्यों को लोगों से जानबूझकर दूर रखा गया है।

यह कहना कि पिछले 30-40 वर्षों में भारतीय शेयर बाजार ने 15 पर्सेंट रिटर्न दिया है, ‘अच्छे दिन’ का नारा लगाने जैसा है। अगर उतार-चढ़ाव और अन्य गतिविधियों को शामिल किया जाए, तो क्या एफडी रिटर्न से ज्यादा होगा? मैंने 2019 में बॉम्बे में मॉर्निंगस्टार कॉन्फ्रेंस में एक प्रेजेंटेशन दिया था, जिसका सार यह था कि सभी भारतीय फंड मैनेजर भारतीय शेयर बाजार की परफॉर्मेंस का ढिंढोरा पीटत हैं, जबकि वास्तव में पिछले 10 वर्षों के दौरान भारतीय शेयरों का डॉलर रिटर्न तकरीबन ‘जीरो’ रहा।

इस प्रेजेंटेशन के बाद बड़े पैमाने पर भारतीय पैसा विदेशी शेयर बाजारों में पहुंचने लगा था। बहरहाल, मुद्दा यह नहीं है। मसला यह है कि इस सीधे से आंकड़े के बारे में लोगों को क्यों जागरूक नहीं किया गया। कहानी अब तक नहीं बदली है। मौजूदा पीढ़ी के हमारी निवेशक काफी ज्यादा टेलीविजन और यूट्यूब देखते हैं और इन दोनों माध्यमों को जानकारी का अहम स्रोत मानते हैं, जोकिसी ने यह नहीं बताया है कि शेयर बाजार में बुल मार्केट स्थायी नहीं है और इस आम तौर पर निवेश के बारीक ज्ञान के लिहाज से विशुद्ध कचरा होता है।

1980 और 1990 के दशक में न तो टेलीविजन था और न ही यूट्यूब। लिहाजा, हमें डेट का वास्तविक विश्लेषण कर अपना नजरिया विकसित करना पड़ता था, न कि हम टीवी एंकर्स की राय पर निर्भर थे। किसी मार्केट एक्सपर्ट, फंड मैनेजर या मीडिया इकाई ने यह विश्लेषण नहीं किया है कि सरकारी कैपेक्स की अगुवाई में होने वाली जीडीपी ग्रोथ फिस्कल डेफिसिट को खतरनाक स्तर पर पहुंचा देगी।

किसी ने यह नहीं बताया है कि शेयर बाजार में बुल मार्केट स्थायी नहीं है और इसकी अवधि आम तौर पर 4-6 साल होती है। किसी अखबार या टीवी चैनल ने यह बताने की जहमत नहीं उठाई कि 2024 में भारत के शेयर बाजार का प्रदर्शन बाकी देशों के मुकाबले काफी खराब रहा है। यहां तक कि इस दौरान इसका प्रदर्शन चौथे स्थान पर रहा।

निवेश करना दुस्साहस का मामला नहीं है। इसका अहम मकसद पूंजी की सुरक्षा भी है। हालांकि, भारत में जिस विकृत तरीके से इनवेस्टमेंट की मार्केटिंग की जा रही है, उसमें कॉमन सेंस इस्तेमाल करने के बजाय छाती पर गोली, तीर और तोप का सामना करने जैसे तौर-तरीकों का प्रचलन हो गया है। जब आप समुद्र में सुनामी देखते हैं, तो आसपास मौजूद बार में उपलब्ध फ्री-कॉकटेल की उम्मीद में वहां नहीं रुकते। आप इससे तेजी से समस्या से निकलने का उपाय ढूंढते हैं।

(लेखक शेयर बाजार के जाने-माने निवेशक और एक्सपर्ट हैं। यह उनकी निजी राय है।)

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