Stock Market Crash: पिछले 26 साल में भारतीय शेयर बाजार ने छह बड़े झटके झेले हैं। इनमें डॉट-कॉम बबल फूटने से लेकर 2008 की ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस तक शामिल है। इसके बाद यूरोजोन डेट क्राइसिस, कोरोना, रूस-यूक्रेन युद्ध और हालिया ऑयल-बॉन्ड शॉक भी आया।

Stock Market Crash: पिछले 26 साल में भारतीय शेयर बाजार ने छह बड़े झटके झेले हैं। इनमें डॉट-कॉम बबल फूटने से लेकर 2008 की ग्लोबल फाइनेंशियल क्राइसिस तक शामिल है। इसके बाद यूरोजोन डेट क्राइसिस, कोरोना, रूस-यूक्रेन युद्ध और हालिया ऑयल-बॉन्ड शॉक भी आया।
हर संकट की वजह अलग थी। बाजार तक उसका असर पहुंचने का तरीका भी अलग रहा। किसी संकट में टेक शेयर टूटे तो किसी में बैंकिंग सिस्टम दबाव में आया। कहीं ग्लोबल रिस्क एवर्जन वजह बना तो कहीं कच्चे तेल और बॉन्ड यील्ड में बड़ा बदलाव देखने को मिला।
1. डॉट-कॉम बबल फूटा, भारतीय बाजार टूटा
डॉट-कॉम बबल में टेक्नोलॉजी शेयरों की वैल्यूएशन अचानक गिरने लगी। इसका असर दुनियाभर के बाजारों पर पड़ा। भारतीय शेयर बाजार भी इसकी चपेट में आया। निफ्टी अपने शिखर से 53.5% गिर गया। सेंसेक्स में भी करीब 44% की गिरावट आई। टेक्नोलॉजी और न्यू-इकॉनमी शेयरों में सबसे ज्यादा दबाव दिखा।
इस संकट की शुरुआत अमेरिकी टेक्नोलॉजी सेक्टर से हुई थी। नैस्डैक अपने शिखर से करीब 78% टूट गया। निवेशकों ने जोखिम वाले एसेट से पैसा निकालना शुरू कर दिया। इसका असर अमेरिकी बॉन्ड बाजार पर भी पड़ा। 10 साल की अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड करीब 310 बेसिस प्वाइंट गिर गई।
2. 2008 में फाइनेंशियल सिस्टम पर आया संकट
2008 में लेहमैन ब्रदर्स के ढहने के बाद हालात तेजी से बिगड़े। ग्लोबल क्रेडिट मार्केट फ्रीज हो गए। दुनियाभर के निवेशकों में डर बढ़ गया। बाजारों में तेज बिकवाली शुरू हो गई। भारतीय बाजार पर भी इसका बड़ा असर पड़ा। निफ्टी 59.9% टूट गया। सेंसेक्स में 60.9% की गिरावट आई। वित्त वर्ष 2009 में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयरों से करीब 15 अरब डॉलर निकाल लिए। इससे घरेलू बाजार पर दबाव और बढ़ गया।
2008 का संकट सिर्फ शेयर बाजार तक सीमित नहीं था। रुपये और कमोडिटी बाजार पर भी इसका असर पड़ा। रुपया करीब 40 रुपये प्रति डॉलर से कमजोर होकर 52 रुपये प्रति डॉलर तक पहुंच गया। वहीं, ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 78% गिर गई। क्रूड करीब 147 डॉलर प्रति बैरल से गिरकर 33 डॉलर तक आ गया। यानी कुछ ही समय में कच्चे तेल की कीमत में भारी गिरावट देखने को मिली।
3. 2010-11 में यूरोजोन डेट क्राइसिस
इसके कुछ साल बाद यूरोजोन डेट क्राइसिस ने बाजार को झटका दिया। यूरोप में कई देशों के कर्ज को लेकर चिंता बढ़ गई थी। डर था कि कुछ देश डिफॉल्ट कर सकते हैं। बैंकिंग सिस्टम पर भी दबाव बढ़ सकता है। इसके साथ ही एक और ग्लोबल मंदी की आशंका पैदा हो गई।
इसका असर भारतीय शेयर बाजार पर भी पड़ा। निफ्टी करीब 28% गिरा। सेंसेक्स करीब 26% टूट गया। रुपया भी 23% कमजोर हुआ। इस बार भारत तक संकट पहुंचने का मुख्य रास्ता ग्लोबल रिस्क एवर्जन था। यानी दुनिया भर के निवेशक जोखिम वाले बाजारों से पैसा निकाल रहे थे। भारत में कोई बड़ा घरेलू बैंकिंग संकट इसकी मुख्य वजह नहीं था।
4. 2020 में आया सबसे तेज बाजार क्रैश
2020 में कोरोना महामारी ने बाजार को बहुत तेजी से नीचे ला दिया। भारतीय शेयर बाजार के इतिहास में यह सबसे तेज गिरावट वाले दौर में से एक था। निफ्टी 39.6% गिर गया। सेंसेक्स में 38.5% की गिरावट आई। निफ्टी को करीब 40% गिरने में सिर्फ दो महीने से थोड़ा ज्यादा समय लगा। विदेशी निवेशकों ने भी जमकर बिकवाली की। मार्च 2020 में ही उन्होंने भारतीय शेयर बाजार से करीब 54,000 करोड़ रुपये निकाल लिए।
कोरोना के दौरान दुनियाभर में मांग अचानक घट गई। निवेशक सुरक्षित एसेट की तरफ भागने लगे। इसका असर क्रूड और बॉन्ड मार्केट पर भी दिखा। ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 70% गिर गई। वहीं, अमेरिकी 10 साल की ट्रेजरी यील्ड करीब 137 बेसिस प्वाइंट नीचे आ गई। बाजार में ग्लोबल मंदी की आशंका बढ़ गई थी। साथ ही निवेशकों को उम्मीद थी कि सेंट्रल बैंक अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए आक्रामक कदम उठाएंगे।
5. 2022 में फिर सामने आई भारत की क्रूड पर निर्भरता
2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ तो कमोडिटी की कीमतें अचानक तेज हो गईं। इसका सीधा असर भारत पर भी पड़ा। एक बार फिर देश की आयातित ऊर्जा पर निर्भरता चर्चा में आ गई। क्रूड महंगा होने से महंगाई और आयात बिल को लेकर चिंता बढ़ी।
इस दौरान निफ्टी में करीब 17% की गिरावट आई। सेंसेक्स भी लगभग 18% टूट गया। ब्रेंट क्रूड की कीमत 78% तक चढ़ गई। विदेशी निवेशकों ने अक्टूबर 2021 से जून 2022 के बीच भारतीय शेयर बाजार से करीब 32.5 अरब डॉलर निकाल लिए।
6. 2026 में क्रूड, बॉन्ड यील्ड और विदेशी बिकवाली ने दबाव बढ़ाया
2026 का ताजा झटका कई मोर्चों से एक साथ आया है। भू-राजनीतिक तनाव बढ़ा हुआ है। क्रूड महंगा है। अमेरिका में ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड ऊपर जा रही है। रुपये पर भी दबाव है। इसके साथ विदेशी निवेशक लगातार बिकवाली कर रहे हैं।
2026 में अब तक निफ्टी करीब 15% नीचे है। इसमें अकेले सितंबर की गिरावट 6.1% रही। विदेशी निवेशकों ने इस साल अब तक कैश मार्केट में करीब 2.5 लाख करोड़ रुपये की बिकवाली की है। सितंबर में ही उनकी बिकवाली करीब 46,000 करोड़ रुपये रही।
भारत के खिलाफ एक साथ चल रहे तीन बड़े फैक्टर
इस समय भारत के लिए तीन चीजें एक साथ मुश्किल पैदा कर रही हैं... क्रूड, अमेरिका की बॉन्ड यील्ड और रुपया। ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर चला गया है। इससे भारत के इंपोर्ट बिल पर दबाव बढ़ता है। साथ ही महंगाई और चालू खाते को लेकर भी चिंता बढ़ती है।
दूसरी तरफ अमेरिका की 10 साल की ट्रेजरी यील्ड 5% के ऊपर पहुंच गई है। इससे ग्लोबल निवेशकों के लिए अमेरिकी बॉन्ड ज्यादा आकर्षक हो जाते हैं। ऐसे माहौल में उभरते बाजारों से पैसा निकलने का दबाव बढ़ सकता है।
तीसरी परेशानी रुपया है। 2026 में अब तक रुपये की कीमत करीब 6.5% कमजोर हुई है। यानी क्रूड महंगा होने के साथ डॉलर के मुकाबले रुपया भी कमजोर है। दोनों चीजें मिलकर भारत की परेशानी बढ़ा रही हैं।
बाजार गिरता तेजी से, लेकिन संभलने में वक्त लगता है
पिछले बड़े बाजार झटकों का इतिहास बताता है कि शेयर बाजार जितनी तेजी से गिरता है, उतनी तेजी से हमेशा वापस नहीं आता। कोरोना क्रैश इसका सबसे तेज उदाहरण रहा। कोरोना के दौरान निफ्टी सिर्फ 63 दिनों में 39.6% गिर गया था। हालांकि, इसके बाद पुराने शिखर तक पहुंचने में 246 दिन लगे।
डॉट-कॉम बबल के दौरान निफ्टी को गिरने में 588 दिन लगे थे। लेकिन पुराने स्तर पर लौटने में 773 दिन लग गए। वहीं 2008 के संकट में बाजार 293 दिनों में गिरा और पिछली ऊंचाई तक पहुंचने में 739 दिन लगे। यानी बाजार में गिरावट कुछ ही महीनों में बड़ा नुकसान कर सकती है। लेकिन उस नुकसान की भरपाई में काफी ज्यादा समय लग सकता है।
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