स्टॉक एक्सचेजों को दी गई जानकारी के मुताबिक भारत की सबसे बड़ी हाउसिंग कंपनी HDFC अपनी सब्सिडियरी HDFC Bank के साथ मर्ज हो जाएगी। HDFC Bank वैल्यू के हिसाब से देश का सबसे बड़ा प्राइवेट सेक्टर बैंक है। यह मर्जर एक विलय योजना (amalgamation scheme) के जरिए होगा।
पहली नजर में देखें तो यह मर्जर दो एक समान वेट वाली कंपनियों के बीच होगा और बाजार हिस्सेदारी, बैलेंसशीट की मजबूती और कॉस्ट सिनर्जी ( cost synergies) के नजरिए से दोनों कंपनियों के लिए फायदेमंद होगा। इससे एचडीएफसी बैंक के शेयरों में विदेशी संस्थागत निवेशकों की खरीदारी का रास्ता भी खुलेगा लेकिन इस मर्जर को लेकर यह ध्यान रखने की जरुरत है कि दोनों कंपनियों को कई रेगुलेटरी प्रावधानों का पालन करना होगा। जिसपर इन दोनों कंपनियों को बड़ी कीमत भी चुकानी होगी।
इन रेगुलेटरी प्रावधानों में cash reserve ratio (नकद आरक्षित अनुपात), statutory liquidity ratio (वैधानिक सरलता अनुपात) और प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग(Priority Sector Lending) से संबंधित प्रावधान शामिल हैं। इन दोनों कंपनियों को इन नियमों के पालन की भी कीमत चुकानी होगी। आइए डालते हैं इनपर एक नजर।
बता दें कि SLR को हिंदी में ‘वैधानिक तरलता अनुपात’ और अंग्रेजी में ‘Statutory Liquidity Ratio’ कहा जाता है। SLR (एसएलआर) बैंकों के पास मौजूद जमा का वह हिस्सा होता है, जिसमें उन्हें अपनी जमा पूंजी पर लोन जारी करने से पहले अपने पास रख लेना जरूरी होता है। SLR (एसएलआर) बैंकों के पास नकदी, गोल्ड रिजर्व (Gold Reserves),सरकारी प्रतिभूतियों जैसे किसी भी रूप में हो सकता है।
आरबीआई के नियमों के मुताबिक SLR के तहत बैंकों को NDTL (नेट टाइम एंड डिमांड लाइबिलिटिज) का 18 फीसदी सरकारी बॉन्डों में इनवेस्ट करना पड़ता है। इसके अलावा बैंकों और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC)को लिक्विडिटी कवरेज रेशियो के तहत हाई क्वालिटी लिक्विड असेट बनाए रखना होता है।
एनालिस्ट का मानना है कि मर्जर के बाद बनने वाली कंपनी को इन वैधानिक प्रावधानों का अनुपालन करने के लिए बाजार से पूंजी जुटानी होगी या अपने बैलेंसशीट पर लगातार अतिरिक्त लिक्विडिटी बनाए रखनी होगी। एनालिस्ट का अनुमान है कि इसके लिए 60,000 से 70,000 करोड़ रुपये जुटाने पड़ सकते हैं। हालांकि दोनों कंपनियों के मैनेजमेंट ने रेगुलेटरी की जरुरतों को पूरा करने का विश्वास जताया है।
ध्यान रखने वाली बात यह है कि एचडीएफसी की करीब 35 फीसदी उधारी रिटेल डिपॉजिट के तौर पर है। मर्जर के बाद रेगुलेटरी रेशियो की गणना के लिए इनको भी शामिल किया जाएगा। एक मैनजमेंट कॉल में एचडीएफसी के चेयरमैन केके मिस्त्री ने कहा है कि पिछले कुछ समय के दौरान CRR और SLR दोनों में कटौती की गई है। ऐसे में मर्जर के बाद बनी कंपनी के लिए CRR और SLR से संबंधित नियमों का अनुपालन करना पहले की तुलना में आसान होगा।
प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग का नियम
गौरतलब है कि एक दूसरा नियम प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग का है। जिसका पालन सभी बैंकों को करना होता है। इसके तहत केंद्रीय बैंक द्वारा ऐसे क्षेत्रों के विकास को प्रोत्साहित करने के लिये बैंकों को अपनी कुल उधारियों का एक निश्चित भाग इन क्षेत्रों में अनिवार्य रूप से वितरित करने का आदेश दिया गया है। इसे ही प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग (Priority Sector Lending (PSL) कहा जाता है। इसके तहत बैंकों को अपनी शुद्ध उधारी का 40 फीसदी हिस्सा कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों, छोटे कारोबारियों, अफोर्डेबल हाउसिंग और प्रायोरिटी सेक्टर के तहत आने वाले दूसरे सेक्टर को देना होता है।
बतातें चलें कि मर्जर के बाद बनी कंपनी की लोन बुक 18 लाख करोड़ रुपये की होगी जिसका 27 फीसदी हिस्सा होम लोन का होगा। एचडीएफसी का बड़ा बुक एचडीएफसी बैंक के साथ मर्ज हो जाएगा जिसके चलते बैंक की उधारी में प्रायोरिटी सेक्टर से संबंधित लोन की हिस्सेदारी कम हो जाएगी और एचडीएफसी बैंक को इस मर्जर के बाद इन नियमों का अनुपालन करने के लिए अलग से प्रावधान करना होगा।
बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर और चीफ एक्जिक्टिव ऑफिसर शशिधर जगदीशन का कहना है कि इस मर्जर के बाद बैंक को इन नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए शुरुआत में प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग सर्टिफिकेट (PSLC)की खरीद का विकल्प अपनाना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग नियमों का पालन करने के लिए हमने व्यवस्था कर रखी है। इस आधार पर इन दोनों कंपनियों ने रेगुलेटर से अपील की है कि इन नियमों का पालन करने के लिए उनको समय दिया जाए। अब यह देखना होगा कि क्या आरबीआई इन नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए टाइमलाइन में विस्तार करेगी!