UPI MDR Impact on Broking: 15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से अधिक के मर्चेंट ट्रांजेक्शन पर लागू होने जा रहे 0.40% मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) ने जहां बैंकों की बल्ले-बल्ले कर दी है, वहीं देश के स्टॉक ब्रोकिंग कंपनियों की नींद उड़ा दी है।
UPI MDR Impact on Broking: 15 अक्टूबर 2026 से ₹2,000 से अधिक के मर्चेंट ट्रांजेक्शन पर लागू होने जा रहे 0.40% मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) ने जहां बैंकों की बल्ले-बल्ले कर दी है, वहीं देश के स्टॉक ब्रोकिंग कंपनियों की नींद उड़ा दी है।
देश के प्रमुख डिस्काउंट ब्रोकर जेरोधा के संस्थापक नितिन कामथ ने इस नए नियम पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा है कि अगर ब्रोकिंग के लिए यूपीआई फीस की सीमा तय नहीं की गई, तो ब्रोकर्स को बिना किसी कमाई के करोड़ों रुपये का नुकसान होगा। इसका सीधा असर आम निवेशकों पर पड़ सकता है और फ्री इक्विटी डिलीवरी का दौर खत्म हो सकता है।
ई-कॉमर्स और ब्रोकिंग में अंतर: 'पैसा आया, लेकिन सौदा नहीं हुआ'
यूपीआई पर फीस लगाने का स्वागत करते हुए नितिन कामथ ने माना कि इससे मार्केट में गूगलपे और फोनपे के 95% एकाधिकार को चुनौती मिलेगी। लेकिन उन्होंने ब्रोकिंग बिजनेस के एक अनोखे पहलू की तरफ ध्यान दिलाया। उन्होंने बताया की, जब आप यूपीआई से पेमेंट करते हैं, तो कोई सामान खरीदते हैं जिससे कंपनी को कमाई होती है। वहीं जब कोई ग्राहक अपने ट्रेडिंग अकाउंट में यूपीआई से पैसा ट्रांसफर करता है, तो इसकी कोई गारंटी नहीं होती कि वह शेयर खरीदेगा या ट्रेड करेगा।
नियम के मुताबिक ब्रोकर यह यूपीआई फीस ग्राहक से नहीं वसूल सकते। ऐसे में अगर ग्राहक सिर्फ पैसा ट्रांसफर करके छोड़ दे, तो भी ब्रोकर को अपनी जेब से बैंक/एनपीसीआई को फीस देनी ही पड़ेगी। यानी बिना किसी ट्रेड या सौदे के ही ब्रोकर को नुकसान उठाना पड़ेगा।
एक उदाहरण से समझें ₹2 करोड़ का 'फ्री-फंड' फटका
नितिन कामथ ने इस गणित को बेहद आसान उदाहरण से समझाया है। मान लीजिए 10,000 ग्राहक एक महीने में 50-50 बार अपने ट्रेडिंग अकाउंट में ₹2 लाख यूपीआई से ट्रांसफर करते हैं। ये ग्राहक पूरे महीने में एक भी शेयर नहीं खरीदते या बेचते यानी ब्रोकर को ₹1 की ब्रोकरेज नहीं मिली।
नए MDR नियमों के तहत, बिना एक भी रुपये की कमाई के, ब्रोकर को सिर्फ इस फंड ट्रांसफर के बदले करीब ₹2 करोड़ का यूपीआई चार्ज अपनी जेब से चुकाना पड़ेगा।
सेबी के नियम से 'दोहरी मार'
ब्रोकर्स के लिए मुश्किलें सिर्फ यूपीआई फीस तक सीमित नहीं हैं, सेबी का क्वार्टरली सेटलमेंट नियम इस आग में घी का काम कर रहा है। सेबी के मुताबिक, अगर ग्राहक का पैसा ट्रेडिंग अकाउंट में बिना इस्तेमाल के पड़ा है, तो ब्रोकर को हर महीने या तिमाही में वह पैसा वापस ग्राहक के बैंक खाते में भेजना अनिवार्य है। पैसा बैंक में जाने के बाद, 50% से ज्यादा ग्राहक उस पैसे को फिर से यूपीआई के जरिए ट्रेडिंग अकाउंट में डालते हैं।
सेबी के नियम के कारण ब्रोकर को पहले पैसा वापस भेजना पड़ता है और जब ग्राहक उसे फिर से ब्रोकिंग अकाउंट में लाता है, तो ब्रोकर को फिर से उस पर यूपीआई चार्ज (MDR) देना पड़ता है बिना किसी नए सौदे या कमाई के।
क्या बंद हो जाएगी फ्री शेयर डिलीवरी?
वर्तमान में जेरोधा, एंजेल वन जैसे ब्रोकर्स इक्विटी डिलीवरी (लॉन्ग टर्म शेयर खरीद) पर शून्य रुपये ब्रोकरेज लेते हैं। कामथ ने साफ चेतावनी दी है की, 'अगर हर यूपीआई ट्रांसफर पर हमारी जेब से बेवजह पैसे कटते रहे चाहे ग्राहक ट्रेड करे या न करे तो हम इस नुकसान को अनिश्चित काल के लिए नहीं सह सकते।' इसका सीधा संकेत है कि अगर नियम में संशोधन नहीं हुआ, तो ब्रोकर्स को मजबूरी में फ्री डिलीवरी ट्रेडिंग पर ब्रोकरेज चार्ज लगाना पड़ सकता है। ट्रेडिंग अकाउंट में फंड ऐड करने पर अलग से फीस वसूलनी पड़ सकती है।
ब्रोकर्स की क्या है मांग?
ब्रोकिंग सेक्टर यूपीआई फीस का पूरी तरह विरोध नहीं कर रहा है, बल्कि इसके लिए एक व्यावहारिक कैप तय करने की मांग कर रहा है। एनपीसीआई के मौजूदा प्रस्ताव में प्रति ट्रांजेक्शन अधिकतम ₹300 तक का कैप रखा गया है। शेयर बाजार के हाई-वॉल्यूम नेचर को देखते हुए MDR दर 0.02% और अधिकतम कैप ₹5 या ₹10 प्रति ट्रांजेक्शन तय किया जाए।
I think MDR on UPI was probably inevitable at some point, especially given how widespread UPI adoption has become. It could also lead to more competition, instead of just three apps accounting for more than 95% of the market.
That being said, there are some use cases, like… — Nithin Kamath (@Nithin0dha) September 16, 2026
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