अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने बुधवार, 28 अक्टूबर को ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं किया। सितंबर में दरों में 0.25 प्रतिशत (quarter-percentage-point) की बढ़ोतरी के बाद,पॉलिसी मेकर्स ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था में मजबूती के संकेतों और लगातार बनी हुई महंगाई के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है। यूएस फेड के दो अधिकारियों ने इस फैसले का विरोध किया और वे दरों में एक और बढ़ोतरी के पक्ष में थे।
फेडरल ओपन मार्केट कमिटी (FOMC) ने अपने बेंचमार्क फेडरल फंड्स रेट को 3.75-4 प्रतिशत की रेंज में ही बनाए रखा है। यह फैसला बाजार की उम्मीदों के अनुरूप है। इस फैसले को 10-2 के वोट से मंजूरी मिली। फेड गवर्नर लिसा कुक और क्लीवलैंड फेड की अध्यक्ष बेथ हैमैक दरों में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी के पक्ष में थीं।
जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के वी के विजयकुमार की राय
जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के वी के विजयकुमार का कहना है कि फेड द्वारा उम्मीद के मुताबिक दरों को बरकरार रखना ग्लोबल इक्विटी मार्केट के लिए थोड़ा पॉजिटिव है। हालांकि, भारत के नजरिए से देखें तो चुनौतियां अभी भी काफी मजबूत बनी हुई हैं। 10-ईयर अमेरिकी बॉन्ड यील्ड 5% के आसपास बनी हुई है और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी के कोई संकेत नहीं हैं। ऐसी खबरें हैं कि चिप की कमी की समस्या 2030 तक बनी रहेगी, जिससे दक्षिण कोरिया और ताइवान में चिप स्टॉक्स और AI ट्रेड में फिर से तेजी बढ़ गई है। इसका मतलब यह है कि विदेशी निवेशक भारत को नजरअंदाज करते हुए AI और AI से जुड़े स्टॉक्स में पैसा लगाना जारी रखेंगे।
आने वाले बजट में LTCG टैक्स में राहत मिलने की उम्मीदें बढ़ रही हैं। ऐसा लगता है कि अब यह कोई विकल्प की बात नहीं रह गई है। इतनी बड़ी मात्रा में पूंजी का बाहर जाना (2026 में अब तक 31 अरब डॉलर) भारत के मैक्रो-इकोनॉमिक इंडीकेटरों पर असर डाल रहा है। कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहने से व्यापार घाटा और चालू खाता घाटा (current account deficit) बढ़ेगा, जिससे रुपये की कीमत गिरेगी और आयातित महंगाई (imported inflation) बढ़ेगी। इससे पहले से ही मौजूद ऊंची महंगाई और गंभीर हो जाएगी। इस साल मानसून की भारी कमी के कारण महंगाई और भी बढ़ती रहेगी।
कर्मा कैपिटल के थॉमस प्रिजु की राय
कर्मा कैपिटल के पोर्टफोलियो मैनेजर थॉमस प्रिजु का कहना है कि हालांकि अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों को 3.75%–4.00% पर बरकरार रखा है, लेकिन यह फैसला ग्लोबल इक्विटी बाजारों के लिए जरूरी नहीं कि कोई नरम संकेत (dovish signal) हो। 10–2 के वोट (जिसमें दो नीति-निर्माताओं ने 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी का सपोर्ट किया) से समिति के भीतर मतभेद का पता चलता है। खासकर ऐसे समय में जब महंगाई अभी भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई है, यह मतभेद और भी अहम हो जाता है। अर्थव्यवस्था को लेकर फेड का आकलन और आगे ब्याज दरें बढ़ने की संभावना यह बताती है कि इस ठहराव को 'टाइटैनिक साइकिल' (कठोर मौद्रिक नीति के दौर) के अंत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। असल में, बाजार अब दिसंबर में एक और ब्याज दर बढ़ोतरी की उम्मीद कर रहे हैं।
भारतीय इक्विटी मार्केट के लिए इसके नतीजे काफी महत्वपूर्ण हो सकते हैं। अमेरिकी ब्याज दरों में और बढ़ोतरी होने से अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और डॉलर ऊंचे स्तर पर बने रह सकते हैं, जिससे उभरते बाजारों में विदेशी पूंजी के निवेश पर दबाव पड़ेगा। इसके चलते निफ्टी में उतार-चढ़ाव (वोलैटिलिटी) बढ़ सकता है। महंगे वैल्यूएशन वाले शेयर और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश पर निर्भर रहने वाले सेक्टर,ग्लोबल लिक्विडिटी की स्थितियों में होने वाले बदलावों के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील रह सकते हैं।
हालांकि,भारतीय बाजारों पर इसका असर घरेलू अर्निंग ग्रोथ, वैल्यूएशन और विदेशी निवेशकों के रुख पर भी निर्भर करेगा। निवेशकों को सोच-समझकर चुनाव करना चाहिए और ऐसी कंपनियों पर फोकस चाहिए जिनकी अर्निंग की स्थिति स्पष्ट हो और जिनकी बैलेंस शीट मज़बूत हो। साथ ही,उन्हें भविष्य में ब्याज दरों की दिशा का अंदाजा लगाने लिए अमेरिका के महंगाई के आंकड़ों और यूएस फेड (अमेरिकी केंद्रीय बैंक) के बयानों पर भी नजर रखनी चाहिए।
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