Old Bridge Capital के फाउंडर और चीफ इनवेस्टमेंट अफसर Kenneth Andrade की आईटी सर्विसेज और फॉर्मा सेक्टर को लेकर अलग राय है। जब प्रमुख एनालिस्ट्स इन दोनों सेक्टर से दूरी बनाने की सलाह दे रहे है, तब एंडराडे को इनमें निवेश के मौके दिख रहे हैं। उनका मानना है कि आईटी सर्विसेज कंपनियों की लोअर ग्रोथ का असर उनकी वैल्यूएशंस पर पड़ा है। उन्होंने फार्मा सेक्टर के बारे में कहा कि अमेरिका में अपनी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों के मुकाबले इंडिया फॉर्मा कंपनियों ने मजबूत पैठ बनाई है। ग्लोबल इकोनॉमी के बारे में उन्होंने कहा कि अगले कुछ समय तक इनफ्लेशन को लेकर दबाव बना रह सकता है। मनीकंट्रोल से बातचीत में उन्होंने कई सेक्टर के बारे में अपनी राय बताई।
बेहतर रहा FY23 में ंकंपनियों का प्रदर्शन
फाइनेंशियल ईयर 2022-23 के कंपनियों के नतीजों के बारे में उन्होंने कहा कि रिजल्ट्स को गौर से देखने पर आपके लिए ऐसी कंपनियों का चुनाव करना मुश्किल हो सकता है, जिन्होंने लॉस दिखाया है। इसमें न्यू एज कंपनियां शामिल नहीं हैं। पिछला दशक ऐसा था जब इंडियन कंपनियों पर कर्ज का बोझ बहुत ज्यादा था। अगर हम FY23, FY24 की बात करें तो कंपनियां इक्विटी के जरिए पैसे जुटा रही हैं। यह पिछले 2-3 साल के मुकाबले बड़ा बदलाव है। अब बैंकों की बैलेंसशीट पर भी रिस्क नहीं दिख रहा। यह पश्चिमी देशों के हालात से उलट है। पश्चिमी देशों में कंपनियों पर कर्ज का ज्यादा बोझ है।
एसएमई पर बढ़ा बैंकों का फोकस
उन्होंने कहा कि अब बैंकों के बिजनेस में एसएमई की हिस्सेदारी ज्यादा है। एसएमई की सेहत अच्छी है। उनकी ग्रोथ अच्छी रही है। उनके लिए संभावनाएं हैं। लेकिन कैपिटल तक पहुंच एक दिक्कत रही है। ऐसे में बैंक इस सेगमेंट पर अपना फोकस बढ़ा रहे हैं। टॉप तीन बैंकों का प्रदर्शन अच्छा है। कुछ समय पहले फाइनेंशियल सेक्टर का प्रदर्शन अच्छा नहीं था। अब बैंक निफ्टी ने अच्छा प्रदर्शन करना शुरू किया है। इसमें शामिल कुछ बैंकों का प्रदर्शन भी अच्छा है।
आईटी सेक्टर में निवेश का मौका
अभी निवेश के मौकों के बारे में पूछने पर एंडराडे ने कहा कि आईटी सेक्टर अच्छा दिखता है। इसमें कमजोरी दिख रही है। फिर भी यह अच्छी स्थिति में है। इस सेक्टर में ऐसी कंपनियां हैं, जिनका कैश फ्लो पॉजिटिव है। इनके शेयर अट्रैक्टिव वैल्यूएशन पर उपलब्ध हैं। इस बात पर बहस चल रही है कि AI की वजह से रोजगार के मौके घट रहे हैं। लेकिन इंडिया आईटी कंपनियों की बढ़त में वेज इनफ्लेशन का बड़ा हाथ है। इसका मतलब है कि इंडिया में एक मिड लेवल एग्जिक्यूटिव की कॉस्ट अमेरिकी में एक फ्रेशर की कॉस्ट के बराबर है। इस साल ग्रोथ सुस्त रहेगी। लेकिन कंपनियों की कमेंटरी से साफ है कि कोई बड़ा रिस्क नहीं है।
इंडियन फार्मा कंपनियां मजबूत स्थिति में
फार्मा कंपनियों के बारे में उन्होंने कहा कि इस सेक्टर में काफी कैपेसिटी है। अगर जेनेरिक्स में इंडिया की मैन्युफैक्चरिंग कैपेसिटी की बात की जाए तो हम वैल्यू के लिहाज से सिर्फ 30 फीसदी हैं। वॉल्यूम के लिहाज से हम 60-65 फीसदी के करीब हैं। हमारे यहां जितने ज्यादा प्लांट होंगे, उतनी ज्यादा जांच का सामना हमें करना पड़ेगा। अगर इंडिया में बंद होने वाले प्लांट्स की संख्या बढ़ती है तो इससे अमेरिकी में दवाओं की कीमतें बढ़ जाएंगी। इससे अमेरिका में प्रॉब्लम शुरू होंगी। रेगुलेटरी प्रेशर के बावजूद अमेरिका में फार्मा जेनेरिक्स प्रॉफिट बनाने के मामले में ऑल-टाइम हाई पर हैं। आने वाले समय में इंडियन कंपनियों के मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस में सुधार आएगा।