Pharma Stocks: ट्रंप ने ब्रांडेड दवाओं पर लगाया 100% टैरिफ, भारत की इन फार्मा कंपनियों को लग सकता है झटका

Pharma Stocks: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पेटेंटेड दवाओं और उनके कच्चे माल पर 100% टैरिफ लगाने के फैसले ने भारतीय फार्मा सेक्टर के लिए नई चिंता खड़ी कर दी है। इस फैसले का असर खास तौर पर उन कंपनियों पर पड़ सकता है जो इनोवेटिव और स्पेशियलिटी दवाओं के कारोबार से जुड़ी हैं

अपडेटेड Apr 06, 2026 पर 1:37 PM
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Pharma Stocks: जेनेरिक दवाओं को अमेरिका ने फिलहाल टैरिफ के दायरे से बाहर रखा है

Pharma Stocks: अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पेटेंटेड दवाओं और उनके कच्चे माल पर 100% टैरिफ लगाने के फैसले ने भारतीय फार्मा सेक्टर के लिए नई चिंता खड़ी कर दी है। इस फैसले का असर खास तौर पर उन कंपनियों पर पड़ सकता है जो इनोवेटिव और स्पेशियलिटी दवाओं के कारोबार से जुड़ी हैं। हालांकि जेनेरिक दवाओं को फिलहाल इस टैरिफ से बाहर रखा गया है, जिससे फार्मा सेक्टर के एक बड़े हिस्से को राहत मिली है।

कब से लागू होगा नया टैरिफ

व्हाइट हाउस के 2 अप्रैल को जारी बयान के मुताबिक, यह टैरिफ बड़े फार्मा कंपनियों के लिए 120 दिनों में और छोटी कंपनियों के लिए 180 दिनों में लागू होगा। यह फैसला 'ट्रेड एक्सपेंशनल एक्ट, 1962' के सेक्शन 232 के तहत लिया गया है, जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में लागू किया जाता है।

यूरोपियन यूनियन, जापान, साउथ कोरिया, स्विट्जरलैंड और लिचेंस्टीन जैसे जिन देशों ने US के साथ फार्मा ट्रेड की शर्तों पर बातचीत की है, उन्हें 15 परसेंट के लिमिट वाले टैरिफ का सामना करना पड़ेगा। US की मैन्युफैक्चरिंग और प्राइसिंग की शर्तों से सहमत होने वाली कंपनियों पर 2029 तक टैक्स ज़ीरो हो सकता है।


जेनेरिक दवाओं को राहत

भारतीय फार्मा इंडस्ट्री के लिए सबसे बड़ी राहत यह है कि जेनेरिक दवाओं और बायोसिमिलर्स को फिलहाल इस टैरिफ से बाहर रखा गया है। भारत अमेरिका को बड़ी मात्रा में जेनेरिक दवाएं सप्लाई करता है। वित्त वर्ष 2025 में भारत ने अमेरिका को 10.5 अरब डॉलर की जेनेरिक दवाएं एक्सपोर्ट की थीं। अमेरिका के जेनेरिक दवा बाजार में भारत लगभग 40% हिस्सेदारी रखता है।

ब्रोकरेज फर्म जेफरीज के अनुसार, जेनेरिक दवाओं पर टैरिफ लगाने से अमेरिका में दवाओं की कीमतें बढ़ सकती हैं और सप्लाई की कमी हो सकती है, इसलिए इन्हें फिलहाल छूट दी गई है। इससे सिप्ला, डॉ रेड्डी लैबोरेटरीज, ल्यूपिन और अरबिंदों फार्मा जैसी कंपनियों पर तत्काल असर की संभावना कम है।

इन कंपनियों पर ज्यादा खतरा

एक्सपर्ट्स का मानना है कि असली जोखिम उन कंपनियों के लिए है जो पेटेंटेड और इनोवेटिव दवाओं के कारोबार में हैं। जेफरीज ने कहा सन फार्मास्युटिकल्स को इस मामले में सबसे ज्यादा एक्सपोजर वाला माना जा रहा है। ब्रोकरेज के मुताबिक, कंपनी के कुल रेवेन्यू का करीब 20% हिस्सा इनोवेटिव दवाओं से आता है, जो अब टैरिफ के दायरे में आएंगे।

हालांकि, सन फार्मा के कई प्रोडक्ट्स साउथ कोरिया और यूरोप में बनते हैं, जहां अमेरिकी टैरिफ 15% तक सीमित है। , लेकिन इससे भी कंपनी के मार्जिन पर असर पड़ सकता है।

इसके बावजूद जेफरीज का अंदाजा है कि सन के इनोवेटिव पोर्टफोलियो पर अभी भी 15 परसेंट तक टैरिफ लगेगा। यह एक ऐसा लेवल है जो मार्जिन पर काफी असर डाल सकता है। इसके असर को कम करने के लिए कंपनी का या तो कीमतें बढ़ानी पड़ सकती है या सप्लाई-चेन में बदलाव करना पड़ सकता बै।

CDMO कंपनियों पर भी दबाव

यह फैसला कॉन्ट्रैक्ट डेवलपमेंट और मैन्युफैक्चरिंग ऑर्गनाइजेशन (CDMO) कंपनियों के लिए भी चुनौती बन सकता है। डिवीज लैब्स (Divi's Laboratories), लॉरेस लैब्स (Laurus Labs) और पिरामल फार्मा (Piramal Pharma) इस सेगमेंट की प्रमुख कंपनियां हैं।

हालांकि अमेरिका ने इन कंपनियों को सीधे तौर पर निशाने पर नहीं लिया है, लेकिन उसका जोर लोकल स्तर पर फार्मा मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने पर है। ऐसे में इन कंपनियों पर अमेरिका में निवेश बढ़ाने या स्थानीय साझेदारी करने का दबाव बढ़ सकता है।

ग्लोबल सप्लाई चेन में बदलाव के संकेत

व्हाइट हाउस के अनुसार, यह टैरिफ अमेरिका की इंपोर्टेड दवाओं पर निर्भरता को कम करने के उद्देश्य से लगाया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, इस कदम के बाद अमेरिका में फार्मा सेक्टर की ओर से करीब 400 अरब डॉलर के नए निवेश प्रस्ताव सामने आए हैं।

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