आरबीआई ने पिछले हफ्ते लिक्विडिटी कवरेज रेशियो (एलसीआर) पर बैंकों के लिए एक ड्राफ्ट गाइडलाइंस जारी की। इसमें उन्हें डिपॉजिट पर बफर के रूप में ज्यादा लिक्विड सिक्योरिटीज अलग रखने को कहा गया है। इससे डिपॉजिटर्स के अचानक बैकों से अपना पैसा निकालने पर बैंकों को स्थिति से निपटने में मदद मिलेगी। ये नियम 1 अप्रैल, 2025 से लागू होंगे। आइए इस बारे में विस्तार से जानने की कोशिश करते हैं।
आरबीआई ने नियम में बदलाव क्यों किया?
आसान शब्दों में कहा जाए तो आरबीआई (RBI) तेज रफ्तार वाली टेक्नोलॉजी (मोबाइल, इंटरनेट बैंकिंग) को लेकर थोड़ा चिंतित है। ग्राहक सिर्फ एक क्लिक से बैंकों में जमा अपना काफी ज्यादा पैसा निकाल सकते हैं। पहले स्थिति ऐसी नहीं थी, जब बैंकों में जमा पैसे को निकालने में काफी समय लग जाता था। ग्राहको को पहले बैंक के ब्रांच जाना पड़ता था, फॉर्म भरना पड़ता था। उसके बाद पैसा निकलता था।
इसका बैंकों के लिए क्या मतलब है?
आरबीआई ने कहा है कि बैंकों को ऐसे रिटेल डिपॉजिट के लिए अतिरिक्त 5 फीसदी रन-ऑफ फैक्टर अलग करना होगा, जो इंटरनेट और मोबाइल बैंकिंग फैसिलिटी से जुड़े हैं। दूसरे शब्दों में इंटरनेट और मोबाइल बैंकिंग (IMB) फैसिलिटी वाले स्टेबल रिटेल डिपॉजिट्स के लिए 10 फीसदी रन-ऑफ फैक्टर अलग रखना होगा। साथ ही आईएमबी फैसिलिटी वाले कम स्टेबल डिपॉजिट के लिए 15 फीसदी रन-ऑफ फैक्टर रखना होगा।
अगर इस मसले से जुड़े तकनीकी हिस्से को अलग कर दिया जाए तो इसका सीधा मतलब है कि आरबीआई ने बैंकों को ऐसे डिपॉजिट्स को लेकर सतर्क रहने को कहा है जो इंटरनेट और मोबाइल बैंकिंग जैसी सुविधाओं से जुड़े हैं। इसकी वजह यह है कि ऐसे डिपॉजिट को किसी भी समय तुरंत बैंकों से निकाला जा सकता है।
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नई गाइडलाइंस का बैंकों पर कैसे असर पड़ेगा?
दरअसल टेक्नोलॉजी भस्मासुर की तरह है। यह आपको ताकतवर बनाता है लेकिन सही इस्तेमाल नहीं होने पर यह बर्बाद भी कर सकता है। जिस आरबीआई ने पहले बैंकों को टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करने की सलाह दी थी आज वह डिपॉजिट के मामले में उसकी टेक्नोलॉजी को लेकर चिंतित है। आरबीआई की नई गाइडलाइंस से बैंकों के लिए मुश्किल बढ़ गई है। बैंक पहले से ही डिपॉजिट बढ़ाने और क्रेडिट-डिपॉजिट के ज्यादा अनुपात से निपटने की कोशिश कर रहे हैं। पिछले कुछ समय से बैंकों की क्रेडिट ग्रोथ उनके डिपॉजिट ग्रोथ से ज्यादा रही है।