बुल्स के लिहाज से देखा जाए तो नतीजों का सीजन अच्छा रहा है। कोई चौंकाने वाली बात नहीं दिखी है। लगातार मार्केट में आ रहे निवेश को देखते हुए वैल्यूएशन के बारे में सवाल करने का कोई मतलब नहीं रह गया है। पिछले महीने तक म्यूचुअल फंड्स जमकर खरीदारी कर रहे थे। इस महीने उन्होंने अपनी खरीदारी घटाई है। लेकिन, इस गैप को विदेशी फंडों ने भरा है। जून में करीब 26,000 करोड़ रुपये की खरीदारी के बाद उन्होंने अतिरिक्त 15,000 करोड़ रुपये मूल्य के शेयर खरीदे हैं। इसके उलट में घरेलू फंडों ने जुलाई में 8,900 करोड़ रुपये से कम की खरीदारी की है। यह स्मार्ट स्ट्रेटेजी है। लोकल फंड्स इस मौके का फायदा उठा रहे हैं। वे विदेशी फंडों की खरादीरी के बीच मुनाफावसूली कर रहे हैं। बाद में वे कम कीमतों पर कैश का इस्तेमाल कर सकते हैं। हालांकि, इससे सही वैल्यूएशन वाले स्टॉक्स तलाशने की उनकी प्रॉब्लम का समाधान होता नहीं दिख रहा।
लिक्विडिटी के सागर में तैर रहे बुल्स ग्लोबल मार्केट्स के संकेतों की अनदेखी कर रहे हैं। AI को लेकर प्रचार (Hype) घटा है और बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों की वैल्यूएशन में गिरावट आई है। आगे ऑटो शेयरों (Auto Stocks) की पिटाई हो सकती है, क्योंकि कोविड के बाद व्हीकल्स की जो जबर्दस्त मांग दिखी थी, वह अब खत्म हो रही है।
सायंट के शेयर 26 जुलाई को 5.5 फीसदी गिरकर 1,790 रुपये पर बंद हुए थे। इसकी वजह कंपनी के पहली तिमाही के नतीजे हैं। Cyient ने फाइनेंशियल ईयर 2024-25 के लिए गाइडेंस घटाया है, जिससे मार्केट को निराशा हुई है। बुल्स का कहना है कि यह कंपनी अपने स्ट्रॉन्ग डोमेन नॉलेज का फायदा उठाने की मजबूत स्थिति में है। जीआईएस और डायवर्सिफायड आईटी इनवायरमेंट्स में इसकी सॉल्यूशन कैपेसिटी काफी ज्यादा है। टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म में स्ट्रेटेजिक इनवेस्टमेंट और आगे अच्छी डील से भविष्य में ग्रोथ की अच्छी संभावना दिख रही है। उधर, बेयर्स का कहना है कि कंपनी ने अपना गाइडेंस काफी घटाया है। दुनिया की प्रमुख करेंसी के मुकाबले रुपये में कमजोरी भी कंपनी के लिए एक चैलेंज है। उसके एंप्लॉयीज की कमी का भी सामना करना पड़ रहा है। ये कंपनी के लिए बड़े रिस्क हैं जिनका असर उसके प्रदर्शन और ग्रोथ की संभावनाओं पर पड़ सकता है।
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अशोक लेलैंड का शेयर 26 जुलाई को 6 फीसदी से ज्यादा उछाल के साथ 246 रुपये पर बंद हुआ था। पहली तिमाही में प्रॉफिट 9 फीसदी घटने के बावजूद शेयर ऑल-टाइम हाई पर पहुंच गए हैं। बुल्स का कहना है कि मैनेजमेंट ने सभी बिजनेस यूनिट्स में स्ट्रॉन्ग डिमांड के संकेत दिए हैं। पावर सॉल्यूशंस और आफ्टर मार्केट जैसे सेगमेंट्स की रेवेन्यू में बड़ी भूमिका हो सकती है। कमर्शियल व्हीकल्स की स्ट्रॉन्ग ग्रोथ और FY25-26 में EBITDA में डबल डिजिट ग्रोथ पर कंपनी का प्रदर्शन निर्भर करेगा। बेयर्स की दलील है कि कमोडिटी के प्राइसेज बढ़ने का असर बिजनेस के ग्रॉस मार्जिन पर पड़ सकता है। इसके अलावा इंडस्ट्री की ग्रोथ उम्मीद से कम रहती है तो इसका असर Ashok Leyland के फाइनेंशियल हेल्थ पर पड़ सकता है।