ग्लोबल शेयर बाजारों में करेक्शन का जोखिम, हर जगह दिख सकता है इसका असर: फाइनेंस मिनिस्ट्री

फाइनेंस मिनिस्ट्री ने ग्लोबल शेयर बाजारों में संभावित करेक्शन को लेकर चिंता जताई है। मिनिस्ट्री ने आगाह किया है कि ऐसे करेक्शन का असर दुनिया भर में देखा जा सकता है। फाइनेंस मिनिस्ट्री ने अगस्त के मंथली इकोनॉमिक रिव्यू में कहा है कि कुछ देशों में पॉलिसी संबंधी हालिया घोषणाओं की वजह से स्टॉक मार्केट में तेजी है और अब करेक्शन के आसार बढ़ गए हैं

अपडेटेड Sep 26, 2024 पर 7:27 PM
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फाइनेंस मिनिस्ट्री ने अगस्त के मंथली इकोनॉमिक रिव्यू रिपोर्ट में स्टॉक मार्केट और अर्थव्यवस्था को लेकर आकलन पेश किया है।

फाइनेंस मिनिस्ट्री ने ग्लोबल शेयर बाजारों में संभावित करेक्शन को लेकर चिंता जताई है। मिनिस्ट्री ने आगाह किया है कि ऐसे करेक्शन का असर दुनिया भर में देखा जा सकता है। फाइनेंस मिनिस्ट्री ने अगस्त के मंथली इकोनॉमिक रिव्यू में कहा है कि कुछ देशों में पॉलिसी संबंधी हालिया घोषणाओं की वजह से स्टॉक मार्केट में तेजी है और अब करेक्शन के आसार बढ़ गए हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है, 'अगर जोखिम बढ़ता है, तो इसका असर ग्लोबल स्तर पर देखने को मिलेगा।' दरअसल, विकसित देशों में भी मंदी की आशंकाएं मंडरा रही हैं। भूराजनीतिक संघर्ष, ब्याज दरों में कटौती का ग्लोबल साइकल शुरू होने आदि वजहों से मुश्किलें और बढ़ सकती हैं। मंत्रालय ने घरेलू अर्थव्यवस्था के भीतर चुनौतियों की तरफ इशारा किया है और कुछ इलाकों में बारिश की कमी और कृषि उत्पादन पर इसके असर को लेकर भी चिंता जताई है। हालांकि, फाइनेंस मिनिस्ट्री का कहना है कि अगर मौसम की ज्यादा मार नहीं देखने को मिली, तो ग्रामीण इलाकों में इनकम और मांग में मजबूती देखने को मिल सकती है।

रिपोर्ट में कुछ सेक्टरों में दबाव के शुरुआती संकेत भी देखे जा सकते हैं, मसलन पैसेंजर व्हीकल सेल्स में सुस्ती और इसकी इन्वेंट्री में बढ़ोतरी। फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) ने इस तरफ इशारा किया है। इसके अलावा, नील्सनआईक्यू (NielsenIQ) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025 की पहली तिमाही में शहरों में एफएमसीजी सेल्स में सुस्ती रही।


मंत्रालय का कहना है, 'हालांकि, यह ट्रेंड फेस्टिव सीजन के आगमन के साथ ही बदल सकता है, लेकिन इस पर नजर रखने की जरूरत है।' बहरहाल, फाइनेंस मिनिस्ट्री का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए कुछ पॉजिटिव भी है, खास तौर पर कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट। मंथली इकोनॉमिक रिव्यू के मुताबिक, इसके अलावा मौजूदा फाइनेंशियल ईयर के दौरान भारतीय राज्यों का पूंजीगत खर्च भी कम हुआ है।

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