बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी डेफिसिट 22 नवंबर को 5 साल के हाई पर पहुंच गया। एक्सपर्ट्स का कहना है कि गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (GST) और वीकली बॉन्ड ऑक्शन की वजह से कैश के आउटफ्लो के कारण लिक्विडिटी डेफिसिट में बढ़ोतरी हुई। रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के मुताबिक, बैंकिंग सिस्टम का लिक्विडटी डेफिसिट 22 नवंबर को 1.74 लाख करोड़ रुपये था, जबकि एक दिन पहले यह आंकड़ा 1.05 लाख करोड़ रुपये था।
करुर व्यास बैंक (Karur Vysya Bank) के डीजीएम, ट्रेजरी हेड, वी रामचंद्र रेड्डी ने बताया, 'हर महीने की 21 तारीख के आसपास टैक्स आउटफ्लो के कारण लिक्विडिटी में उतार-चढ़ाव होता रहता है और यह कभी मामूली सरप्लस तो कभी डेफिसिट में चला जाता है।' आंकड़ों के मुताबिक, लिक्विडिटी डेफिसिट का यह आंकड़ा दिसंबर 2018 के बाद सबसे ज्यादा है।
कोटक महिंद्रा बैंक की 20 नवंबर की रिपोर्ट में कहा गया है कि जीएसटी की वजह से 1.5 लाख करोड़ और ऑक्शन की वजह से 65,000 करोड़ के आउटफ्लो का अनुमान है। पिछले कई महीनों में बैकिंग लिक्विडिटी सख्त है। खास तौर पर केंद्रीय बैंक द्वारा इंक्रीमेंटल कैश रिजर्व रेशियो (I-CRR) लागू किए जाने के बाद ऐसा देखने को मिल रहा है। इस वजह से सिस्टम से 1 लाख करोड़ रुपये निकल गए हैं।
इससे पहले लिक्विडिटी सरप्लस में रहा था और केंद्रीय बैंक ने इस सरप्लस को कम करने के लिए कई तरह के प्रयास किए थे। हालांकि, अस्थायी उपायों से बहुत ज्यादा मदद नहीं मिली, लिहाजा इंक्रीमेंटल कैश रिजर्व रेशियो का ऐलान किया गया। इंक्रीमेंटल कैश रिजर्व रेशियो का मुख्य मकसद 2,000 के नोट को वापस लिए जाने की वजह से पैदा हुई सरप्लस लिक्विडिटी को हटाना था। केंद्रीय बैंक के आदेश के मुताबिक, 12 अगस्त से शेड्यूल्ड बैंकों के लिए 10 पर्सेंट का इंक्रीमेंटल कैश रिजर्व रखना जरूरी कर दिया गया था। हालांकि, इसके तुरंत बाद रिजर्व बैंक ने अपनी समीक्षा में इंक्रीमेंटल कैश रिजर्व को चरणबद्ध तरीके से हटाने का फैसला किया था।