सेबी बोर्ड ने स्वैच्छिक डीलिस्टिंग से जुड़े नियमों में बड़े बदलाव किए हैं। इसका मकसद डीलिस्टिंग प्रक्रिया को आसान बनाना है। सेबी की चेयरपर्सन माधवी बुरी बुच ने 27 जून को हुई सेबी बोर्ड की बैठक के बाद यह जानकारी दी। बुच के मुताबिक, बोर्ड ने रिवर्स बुक-बिल्डिंग के लिए फिक्स्ड प्रोसेस को विकल्प के तौर पर पेश करने का फैसला किया है। इस विकल्प का चुनाव करने वाली कंपनियों के लिए डीलिस्टिंग नियमों के तहत फ्लोर प्राइस के आधार पर मिनिमम प्राइस तय करना जरूरी होगा।
लेकिन डीलिस्टिंग को तभी मंजूर किया जाएगा, जब एग्रीगेट लेवल पर कम से कम 90% शेयरधारकों से शेयर खरीद लिए गए हों। इसके साथ ही डीलिस्टिंग के लिए तय कीमत फ्लोर प्राइस से कम से कम 15% ज्यादा होनी चाहिए। कंपनी को शेयर एक्सचेंज से हटाने की प्रक्रिया डीलिस्टिंग कहलाती है यानी डीलिस्टिंग के बाद शेयर एक्सचेंज में ट्रेड नहीं हो सकता। डीलिस्टिंग कंपनी मैनेजमेंट की मर्जी या नियमों की अनदेखी करने पर हो सकती है।
इनवेस्टमेंट एंड होल्डिंग कंपनी को डीलिस्ट करने के नए नियम
नए नियमों के मुताबिक अन्य लिस्टिंग कंपनियों में IHC-इन्वेस्टमेंट एंड होल्डिंग द्वारा रखे गए इक्विटी शेयरों को अन्य शेयरधारकों को ट्रांसफर करने की अनुमति दी गई है। सार्वजनिक शेयरधारकों को जमीन, घर, अन्य लिस्टिड कंपनियों जैसी प्रॉपर्टी के बदले तय रेशियो के हिसाब कैश में पेमेंट करने भी अनुमति मिली। सेबी के डीलिस्टिंग नियमों के अनुसार, शेयरहोल्डर्स पोस्टल बैलेट और ई-वोटिंग के जरिए जरूरी बहुमत के साथ अप्रूवल और स्टॉक एक्सचेंजों की तरफ से सैद्धांतिक तौर पर मंजूरी मिलने के बाद डीलिस्टिंग प्रक्रिया आगे बढ़ती है।
डीलिस्टिंग नियम किसी कंपनी के सभी शेयरधारकों को इस शर्त के साथ बाहर निकलने का मौका देते हैं कि कंपनी में अधिग्रहणकर्ता (जो कंपनी खरीदकर उसे शेयर बाजार से डीलिस्टिंग करना चाहता है) या प्रमोटर और प्रमोटर ग्रुप की हिस्सेदारी 90% तक पहुंच जाए। इसका मतलब यह है कि किसी कंपनी को सफलतापूर्वक डीलिस्ट कराने में उसके पब्लिक शेयरहोल्डर्स की अहम भूमिका होती है।