बाजार नियामक सेबी (SEBI) ने एक्सपायरी के दिन ट्रेडिंग के फ्रेमवर्क में बदलाव का जो प्रस्ताव पेश किया है, वह मार्केट एक्सपर्ट्स को पसंद आया है। न्यूज एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक मार्केट एक्सपर्ट्स का कहना है कि इन बदलावों से क्लोजिंग ऑक्शन यानी वोलैटिलिटी यानी भारी उठा-पटक और मैनिपुलेशन यानी हेरफेर की प्रमुख वजहों को दूर किया जा सकता है। इसके अलावा सेटलमेंट प्रोसेस अधिक आसान और पारदर्शी बन सकती है। मार्केट एक्सपर्ट्स का यह रुझान तब सामने आया, जब सेबी ने शनिवार को एक कंसल्टेशन पेपर जारी किया, जिसमें CAS (Closing Auction Session) ने मार्केट टाइमिंग्स और डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के सेटलमेंट के तरीके में बदलाव का प्रस्ताव पेश किया है।
क्या है मुख्य बातें SEBI के प्रस्ताव में
डेरिवेटिव्स के सेटलमेंट प्राइस को कैश मार्केट के क्लोजिंग प्राइस से अलग करना।
CAS के दौरान लाइव इंडिकेटिव इंडेक्स वैल्यू को बंद करना।
1% बैंड से बाहर लगाए गए ऑर्डर्स को अधिक बाइंडिंग बनाना।
क्या कहना है एक्सपर्ट्स का?
आनंद राठी वेल्थ के जॉइंट सीईओ फिरोज अजीज का कहना है कि सेबी ने तीन प्रमुख दिक्कतों पर ध्यान दिया है- कैश मार्केट के क्लोजिंग प्राइस और डेरिवेटिव्स के सेटलमेंट प्राइस के बीच संबंध, इंडिकेटिव ऑक्शन प्राइस से होने वाली गड़बड़ियां और ऑक्शन प्रोसेस के दौरान ऑर्डर कैंसिल करने की दिक्कत। फिरोज के मुताबिक सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि किसी डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट का सेटलमेंट बिल्कुल कैश मार्केट के क्लोजिंग प्राइस पर होना जरूरी नहीं होगा। इस तरह सेबी का मानना कि कैश और डेरिवेटिव्स मार्केट अलग-अलग उद्देश्यों पर काम करते हैं।
इसके अलावा फिरोज के मुताबिक क्लोजिंग ऑक्शन के दौरान इंडिकेटिव इंडेक्स वैल्यू नहीं दिखाए जाने एक्जीक्यूट नहीं हुए ऑर्डर्स के कारण होने वाली उठा-पटक कम होगी तो 1% से बाहर लगाए गए आक्रामक ऑर्डर्स को अधिक बाध्यकारी बनाने से ऑर्डर्स को बार-बार कैंसिल करके बाजार में हेरफेर करने की संभावना भी कम होगी। उन्होंने सीएएस में आइसबर्ग ऑर्डर्स को मंजूरी देने, ट्रांजिशन पीरियड को कम करने और सीएएस के बाद डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग विंडो को घटाकर पांच मिनट करने को उचित और व्यावहारिक बदलाव बताया।
ट्रे़डजिनी के सीओओ त्रिवेश दिनेश ने सेबी के इस इस प्रस्ताव का सपोर्ट किया है कि एक्सपायरी-डे का सेटलमेंट प्राइस ट्रेडिंग के आखिरी 30 मिनट के VWAP (Volume-Weighted Average Price) के आधार पर तय किया जाएगा। उनका कहना है कि यह आसान तरीका है और उद्देश्य भी सेटलमेंट का ऐसा तरीका तैयार करने पर होना चाहिए, जो आसान हो और मार्केट में शामिल सभी पर एक तरह से लागू हो। उन्होंने सेबी के उस प्रस्ताव का भी सपोर्ट किया जिसमें नियमित ट्रेडिंग को दोपहर 3:30 बजे तक जारी रखने और उसके बाद क्लोजिंग ऑक्शन शुरू करने की बात कही गई है। उनके अनुसार इससे मार्केट स्ट्रक्चर और आसान होगा।
त्रिवेश ने क्लोजिंग ऑक्शन के दौरान इंडकेटिव इंडेक्स वैल्यू को लाइव दिखाना बंद करने के प्रस्ताव का भी सपोर्ट किया है। उनका कहना है कि इससे गैरजरूरी उठा-पटक और भ्रम की स्थिति कम करने में मदद मिलेगी। उनका कहना है कि इंडिकेटिव इंडेक्स वैल्यू लाइव नहीं दिखेगी लेकिन अलग-अलग सिक्योरिटीज के इंडिकेटिव प्राइस को जारी रखने से ऑक्शन में हिस्सा लेने वाले लोगों को जरूरी जानकारी मिलती रहेगी।
फीडबैक के बाद आए हैं प्रस्ताव
सेबी ने मार्केट पार्टिसिपेंट्स से मिले फीडबैक के आधार पर प्रस्ताव पेश किए हैं। यह फीडबैक एक्सपायरी पर डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के सेटलमेंट के लिए सीएएस से तय क्लोजिंग प्राइस के इस्तेमाल के बारे में था। सेबी को मिले फीडबैक में एक अहम मुद्दा डेरिवेटिव सेटलमेंट प्राइस को सीएएस से तय क्लोजिंग प्राइस के आधार पर तय करने को लेकर था। बता दें कि सीएएस को 3 अगस्त से उन इक्विटी कैश सेगमेंट के शेयरों के लिए लागू किया गया, जिनके डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स की ट्रेडिंग होती है। इसे पारदर्शी तरीके से क्लोजिंग प्राइस तय करने के लिए लाया गया था। इसके लागू होने से पहले क्लोजिंग प्राइस आखिरी 30 मिनट में हुए ट्रेड्स के VWAP के आधार पर तय किया जाता था और इसे ऑक्शन के दौरान कुल खरीद और बिक्री ऑर्डर्स को ध्यान में रखकर एक बीच का भाव निकाला जाता है, जिस पर अधिक से अधिक ट्रेड हो सके।
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