एनएसई के को-लोकेशन मामले का जल्द निपटारा हो जाने की उम्मीद है। संभावना है कि इस मामले में सेबी जल्द एनएसई के सेटलमेंट अप्लिकेशन को मंजूरी दे देगा। सूतों के मुताबिक, सेटलमेंट और कंपाउंडिंग पर सेबी की हाई-पावर एडवायजरी कमेटी (एचपीएसी) ने एनएसई के सेटलमेंट अप्लिकेशन को मंजूरी देने की सिफारिश की है। एनएसई ने पिछले साल 20 जुलाई को सेबी के पास सेटलमेंट अप्लिकेशन फाइल किया था।
फाइलन सेटलमेंट अमाउंट 1880 करोड़ हो सकता है
एनएसई ने इस मामले के निपटारे के लिए 1,387.39 करोड़ रुपये का ऑफर दिया था। इस मामले के कानूनी पहलुओं की जानकारी रखने वाले सूत्रों ने बताया कि एचपीएसी की तरफ से ऑफर किया गया सेटलमेंट अमाउंट करीब 1,880 करोड़ रुपये हो सकता है। इसमें से करीब 1,200 करोड़ रुपये डिस्गार्जमेंट, करीब 380 करोड़ रुपये इंटरेस्ट और बाकी पैसे सेटलमेंट से जुड़ी दूसरे शर्तों के लिए हो सकता है।
एचपीएसी की मार्च में हुई बैठक में मामले पर विचार हुआ था
बताया जाता है कि एचपीएसी की बैठक इस मामले पर विचार के लिए 27 मार्च को हुई थी। इसमें संशोधित सेटलमेंट अमाउंट का प्रस्ताव पेश किया गया था। सेबी के फ्रेमवर्क के मुताबिक, सेटलमेंट अमाउंट की शुरुआत बेस पेनाल्टी के साथ होती है। उसके बाद कई बातों को ध्यान में रखने के बाद फाइनल सेटलमेंट अमाउंट का निर्धार होता है।
अब सेबी की डब्ल्यूटीएम पैनल सिफारिश पर विचार करेगी
एचपीएसी की सिफारिश सेबी के उस पैनल को भेज दिया गया है, जिसके सदस्य सेबी के दो होल-टाइम मेंबर होते हैं। उनके एप्रूवल के बाद सेटलमेंट अमाउंट की डिमांड एनएसई को इश्यू कर दी जाएगी। सेबी के इस पैनल के पास सेटलमेंट अप्लिकेशन को स्वीकार या खारिज करने का अधिकार होता है। सेटलमेंट प्रोसेस में मामले में शामिल लोगों के आरोपों का निपटारा उनके दोष स्वीकार या खारिज किए बगैर कर दिया जाता है।
एप्रूवल के बाद सेबी-एनएसई सुप्रीम कोर्ट में दे सकते हैं अप्लिकेशन
अगर सेबी के होल-टाइम डायरेक्टर्स का पैनल सेटलमेंट अप्लिकेश को एप्रूव कर देती है तो सेबी और एनएसई देश की सबसे बड़ी अदालत से इस मामले को वापस लेने के लिए अप्लिकेशन फाइल कर सकते हैं। अगर सुप्रीम कोर्ट इसकी इजाजत दे देता है तो यह मामला क्लोज हो जाएगा। इस मामले में सेबी को भेजे गए सवालों के जवाब नहीं मिले। एनएसई ने इस बारे में टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।
क्या है एनएसई को-लोकेशन मामला?
एनएसई को-लोकेशन और डार्क फाइबर मामले में कुछ खास ब्रोकर्स पर प्रिफ्ररेंशियल ट्रीटमेंट हासिल करने के आरोप थे। इसकी वजह से मार्केट डेटा तक उन्हें दूसरों के मुकाबले जल्द एक्सेस मिला। इससे उन्हें ट्रेडिंग में अनुचित फायदा हुआ। 2015 में पोल खोलने वाले एक व्यक्ति ने इस मामले का खुलासा किया। उसने दावा किया कि कुछ खास ब्रोकर्स को एनएसई के टिक-बाय-टिक डेटा का एक्सेस दूसरों से पहले मिला। ऐसा खास सर्वर कनेक्शंस के जरिए हुआ था। इससे मार्केट की निष्पक्षता, गवर्नेंस में लैप्सेज और सेबी के एसईसीसी रेगुलेशंस, 2012 के उल्लंघन को लेकर सवाल खड़े हुए थे।