फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस सेगमेंट में शेयरों की एंट्री के लिए नियम-शर्तें बदल सकता है SEBI

सेबी की सालाना रिपोर्ट में कहा गया है, 'डेरिवेटिव मार्केट में किसी स्टॉक को शामिल करने की शर्तों की समीक्षा पिछली बार 2018 में की गई थी। इसके बाद से मार्केट की साइज, कैश मार्केट की लिक्विडिटी, मार्केट कैपिटलाइजेशन और टर्नओवर में काफी बदलाव हुए हैं। लिहाजा, डेरिवेटिव सेगमेंट में शेयरों को शामिल करने या उसे बनाए रखने की शर्तों पर फिर से विचार करने का प्रस्ताव पेश किया गया है।'

अपडेटेड Aug 07, 2023 पर 7:06 PM
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SEBI ने शेयरों को फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस में शामिल करने से जुड़ी शर्तों में बदलाव का प्रस्ताव पेश किया है।

मार्केट रेगुलेटर सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) ने किसी शेयर को फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस (F&O) में शामिल करने की शर्तों में बदलाव का प्रस्ताव पेश किया है। फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस सेगमेंट को इक्विटी डेरिवेटिव मार्केट भी कहा जाता है।

सेबी की सालाना रिपोर्ट में कहा गया है, 'डेरिवेटिव मार्केट में किसी स्टॉक को शामिल करने की शर्तों की समीक्षा पिछली बार 2018 में की गई थी। इसके बाद से मार्केट की साइज, कैश मार्केट की लिक्विडिटी, मार्केट कैपिटलाइजेशन और टर्नओवर में काफी बदलाव हुए हैं। लिहाजा, डेरिवेटिव सेगमेंट में शेयरों को शामिल करने या उसे बनाए रखने की शर्तों पर फिर से विचार करने का प्रस्ताव पेश किया गया है।'

स्टॉक एक्सचेंजों में किसी शेयर के डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट के लिए सौदा तभी हो सकता है, जब यह संबंधित शर्तों को पूरा करेगा। इसके तहत, मार्केट कैपिटलाइजेशन, औसत डेली ट्रे़डिंग वॉल्यूम, क्वॉर्टर सिग्मा वैल्यू, डिलीवरी के लायक एवरेज डेली वॉल्यूम आदि चीजों का ध्यान रखा जाता है। फिलहाल, फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस सेगमेंट में शामिल स्टॉक में सर्किट लिमिट तय नहीं है।

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उदाहरण के लिए, अगर किसी शेयर की सर्किट लिमिट (ऊपर-नीचे दोनों) 10 पर्सेंट है, तो शेयर की कीमत इस लेवल पर पहुंचने के बाद इसमें और बदलाव किया जाता है। हालांकि, फ्यूचर्स एंड ऑप्शंस स्टॉक में नई लिमिट जोड़े जाने से पहले 15 मिनट का कूलिंग पीरियड होता है।

सेबी की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, 'इक्विटी डेरिवेटिव सेगमेंट के तहत ऐसे शेयरों में उतार-चढ़ाव रोकने के लिए सेबी इन शेयरों और उनके डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट्स के लिए मौजूदा प्राइस बैंड स्ट्रक्चर को मजबूत बनाने की तैयारी में है, ताकि शेयरों के लिए बेहतर रिस्क मैनेजमेंट के साथ-साथ उनमें सही तरीके से ट्रेडिंग सुनिश्चित हो सके। प्रस्तावित स्ट्रक्चर में अचानक से बाजार में आने वाले उतार-चढ़ाव के असर को रोकने और ट्रेडिंग करने वालों के सिस्टम से जुड़ी गड़बड़ियों पर अंकुश लगाने के लिए प्रावधान किए जाएंगे।'

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