शेयर बाजार में रोज नया रिकॉर्ड लेकिन लिक्विडिटी और वैल्यूएशन में झूलते बाजार में आगे क्या होगा?

किसी बड़ी तेजी के पहले से बाजार में यदि 8-10% का करेक्शन दिख जाए, तो निवेशकों और ट्रेडरों को तैयार रहना चाहिए

अपडेटेड Sep 07, 2021 पर 2:41 PM
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भुवन भास्कर
 
शेयर बाजार की रोज छूती नई ऊंचाइयों ने बाजार के दिग्गजों तक को कंफ्यूज कर रखा है। इसमें कोई शक़ नहीं कि शेयर बाजार लंबी अवधि में अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल्स के लिहाज से अपनी चाल तय करते हैं, लेकिन छोटी अवधि में रोज़ाना की ख़बरें भी उन्हें प्रभावित करती हैं।

मीडियम टर्म में बाजार आने वाले साल से दो साल में कंपनियों की आमदनी के अनुमान पर अपना वैल्यूशन तय करते हैं। लेकिन इस तर्क से ऐसा कोई आधार नहीं मिलता है जिस पर मार्च 2020 के बाद से शुरू हुई बाजार की तेजी को समझा जा सके। भारत में कोरोना के मामले जनवरी 2020 के उत्तरार्ध से आने शुरू हुए और सरकार ने मार्च के आखिरी हफ्ते में लॉकडाउन की घोषणा कर दी।

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 उस समय उद्योगों के मध्यम अवधि के भविष्य पर भयंकर अनिश्चितता था। अप्रैल-जून 2020 तिमाही में जीडीपी में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज हुई और वह रुझान पूरे साल 2020-21 तक जारी रहा है। लेकिन इसके बावजूद यदि बाजार की चाल पर नज़र डालें, तो निफ्टी ने 3 अप्रैल 2020 को 8083 का निचल स्तर छू लिया। इसके बाद से बाजार की जो तेजी शुरू हुई, वह इस साल मार्च में हल्की गिरावट के बावजूद बदस्तूर जारी है और अपने निचले स्तरों से बाजार 100 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ चुके हैं।

एक ट्रेडर या निवेशक के लिए यह सवाल इतना आवश्यक नहीं है कि बाजार क्यों बढ़ रहे हैं, बल्कि ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यह बढ़त कब तक जारी रहेगी? इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए यह समझना बहुत आवश्यक है कि बाजार में तमाम बुनियादी कारणों के बावजूद असली तेजी लिक्विडिटी के कारण होती है और इसलिए लिक्विडिटी का विश्लेषण कर यह अंदाज़ा मिल सकता है कि वर्तमान तेज़ी की दशा और दिशा आने वाले दिनों में क्या रह सकती है।
 
भारतीय शेयर बाजारों की चाल दरअसल दो श्रेणी के खिलाड़ियों के निवेश फैसलों से प्रभावित होती है- विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) और घरेलू संस्थागत निवेशक (DII)। यदि अप्रैल 2020 के बाद से अगस्त 2020 तक FII का शुद्ध निवेश 1.57 लाख करोड़ रुपये रहा है, जबकि इस दौरान DII 86,000 करोड़ रुपये से ज्यादा के शुद्ध बिकवाल रहे हैं।

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मतलब यह है कि जिस दौरान शेयर बाजार 100 प्रतिशत से ज्यादा बढ़े हैं, उस दौरान बाजार में शुद्ध रूप से 71,000 करोड़ रुपये से ज्यादा सिर्फ संस्थागत निवेशकों की ओर से आए हैं। हालांकि यह पूरी तस्वीर नहीं है। पिछले साल अप्रैल से लेकर इस साल मार्च तक 12 महीनों में FIIs ने सिर्फ दो महीनों, अप्रैल और सितंबर में बिकवाली की और शुद्ध रूप से 2.01 लाख करोड़ रुपये का निवेश किया, जबकि इस दौरान DIIs ने 8 महीनों में 1.32 लाख करोड़ रुपये की बिकवाली की।

 इन 12 महीनों में यदि सूचकांकों की चाल देखें, तो 69,000 करोड़ के शुद्ध निवेश से निफ्टी में करीब 6100 अंकों या यानी 75% का उछाल आया।    लेकिन अप्रैल 2021 से परिदृश्य पूरी तरह उलट गया। इस दौरान 5 महीनों में हर महीना FIIs ने शुद्ध बिकवाली की और DIIs शुद्ध खरीदार रहे।

जहां FIIs ने अप्रैल-अगस्त के दौरान 43,842 करोड़ रुपये की बिकवाली की, वहीं DIIs इस दौरान 45,759 करोड़ रुपये के खरीदार रहे। इन 5 महीनों में करीब 2,000 करोड़ रुपये के निवेश से निफ्टी में लगभग 2500 अंकों का उछाल आया है। साफ है कि शेयर बाजार में निवेश के साथ ही तेजी की गति भी कम हुई है। तो आने वाले दिनों में सारा दारोमदार इस बात पर होगा कि FIIs और DIIs का निवेश घटता है कि बढ़ता है।

कोरोनावायरस का खतरा बरकरार

भारत ही नहीं दुनिया भर की अर्थव्यवस्था के लिए अब भी कोविड-19 का खतरा टला नहीं है। भारत में तीसरी लहर की संभावना पर अटकलें लग रही हैं, जबकि अमेरिका सहित दुनिया के कई देश पहले ही तीसरी और चौथी लहर का सामना कर रहे हैं। इसके बावजूद पहली लहर में लगाए गए पूर्ण लॉकडाउन के कारण अर्थव्यवस्था और आम जनता को लगे करारे झटकों ने इतना तो निश्चित कर दिया है कि किसी भी हालत में एक बार फिर पूर्ण लॉकडाउन जैसी स्थिति नहीं आने जा रही है।

भारतीय उद्योगों के तिमाही नतीजे पहले ही काफी सकारात्मक संकेत दिखाने लगे हैं। IIP के आंकड़े 10 सितंबर को जारी होंगे, जिन पर भी बाजार की नजर होगी। आधिकारिक तौर पर मौजूदा साल में 9.5% GDP वृद्धि का अनुमान जताया गया है और 2022-23 में यह 7.5% रहने की उम्मीद है। लेकिन 2018-19 को आधार मान कर देखें, तो यह वृद्धि क्रमशः 1.8% और 2.9% मात्र है। साफ है कि बाजार में आई तेजी अर्थव्यवस्था में अगले दो साल की वृद्धि को पहले ही एडजस्ट कर चुकी है।

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फिर भी इतना तो तय है कि अर्थव्यवस्था का सबसे बुरा दौर पीछे छूट गया है। वैसे भी बाजारों के पिछले डेढ़ साल की चाल को देखते हुए कंपनियों के नतीजे और अर्थव्यवस्था प्रत्यक्ष रूप से बाजार की आगे की चाल तय करेंगे, इसकी संभावना कम ही है।

यानी बाजार की आगे की चाल कुल मिलाकर लिक्विडिटी पर निर्भर करेगी। जनवरी 2020 से जून 2021 के दरम्यान अमेरिकी फेडरल रिजर्व की बैलेंस शीट 4.1 लाख करोड़ डॉलर से बढ़कर 8.1 लाख करोड़ डॉलर हो गई है। इस दौरान भारत में फॉरेन पोर्टफोलियो फ्लो के जरिए 36 अरब डॉलर आए और भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 130 अरब डॉलर से बढ़कर 609 अरब डॉलर हो गया।

घरेलू तौर पर कर्ज की मांग में कमी बने रहने और रिलायंस जैसी अग्रणी भारतीय कंपनियों द्वारा कर्जमुक्त होने की योजनाओं के कारण बैंकिंग सिस्टम में लिक्विडिटी का स्तर कुल बैंक जमा के 3% तक पहुंच गया है। फिलहाल वित्तीय तंत्र में नकदी के सूखने की कोई खास वजह नहीं दिख रही।

लेकिन यह भी सच है कि बाजार अपने अधिकतम वैल्यूएशन पर हैं। ऐसे में आने वाले समय में भले बाजार में कोई बड़ी गिरावट नहीं देखने को मिले, लेकिन यहां से बहुत ज्यादा तेजी की उम्मीद भी बेमानी होगी। किसी भी बड़ी तेजी के पहले वैल्यूएशन के बोझ से बाजार में यदि 8-10% का करेक्शन दिख जाए, तो निवेशकों और ट्रेडरों को इसके लिए तैयार रहना चाहिए।        

(लेखक कृषि और आर्थिक मामलों के जानकार हैं)


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