जब दुनिया की बड़ी इकोनॉमीज संकट में हैं तब इंडिया की इकोनॉमी अच्छी ग्रोथ दिखा रही है। हमने 6-6.5 फीसदी की जीडीपी ग्रोथ देखी है। इस फाइनेंशियल ईयर में ग्रोथ 7 फीसदी रहने की उम्मीद है। उधर, चीन की इकोनॉमी को जल्द सरकार की तरफ से राहत पैकेज की जरूरत है। अमेरिका में केंद्रीय बैंक ने मौद्रिक नीति आक्रामक बनाए रखने के संकेत दिए हैं। इंडियन इकोनॉमी की ग्रोथ इसे दूसरी बड़ी इकोनॉमीज से अलग करती है। ये बातें First Abu Dhabi Bank के चीफ इकोनॉमिस्ट Simon Ballard ने कही। मनीकंट्रोल से बातचीत में उन्होंने अमेरिका में इनफ्लेशन और चीन की इकोनॉमी की दिकक्तों सहित कई मसलों पर खुलकर चर्चा की। उन्होंने कहा कि ग्लोबल चैलेंजेज के बीच इंडिया और गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) के लिए बड़े मौके दिख रहे हैं।
अंधरे के बीच उम्मीद की किरण है इंडिया
उन्होंने कहा कि अगर ग्लोबल इकोनॉमी की स्थिति से तुलना करें तो इंडिया में उम्मीद दिख रही है। जीडीपी ग्रोथ इस फाइनेंशियल ईयर 7 फीसदी रह सकती है। इंपोर्ट पर खर्च में कमी और ऑयल की कीमतों में नरमी से एक्सटर्नल अकाउंट्स में इम्प्रूवमेंट दिख रहा है। इसलिए इंडिया में अभी इकोनॉमी का आउटलुक बेहतर है। लेकिन, इस पर कुछ हद तक ग्लोबल मीट्रिक्स का असर पड़ेगा। अमेरिका में अगर कर्ज बाजार में दिक्कत बढ़ती है तो इसका असर इंडिया पर भी पड़ सकता है। फिलहाल दुनिया में अनिश्चितता के बीच आर्थिक गतिविधियां बढ़ रहा हैं। यह चीज इंडिया को दूसरे देशों से अलग करती है। इंडिया और GCC को आने वाली तिमाहियों में फायदा मिलता दिखेगा। अगले दो साल में वैश्विक अनिश्चितता के बीच इंडिया एक ताकतवर देश के रूप में सामने आएगा।
अमेरिका में इंटरेस्ट रेट में जल्द वृद्धि की उम्मीद नहीं
अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के आगे के रुख के बारे में बलार्ड ने कहा कि चेयरमैन जेरोम पॉवेल का जैक्सन होल का भाषण मजेदार रहा। हालांकि, यह अनुमान के मुताबिक रहा। फेड ने जिस तरह से बीते 16-18 महीनों में इंटरेस्ट रेट को लेकर जिस तरह की आक्रामक पॉलिसी अपनाई है, उसे देखकर उसकी पॉलिसी में जल्द नरमी की उम्मीद नहीं की जा सकती। उन्होंने फेड की हर मीटिंग में डेटा के आधार पर फैसले लेने की बात कही है, जो सही है। मेरा मानना है कि अमेरिका में इंटरेस्ट रेट अपने पीक (सबसे हाई लेवल) पर है और आगे काफी समय तक इंटरेस्ट रेट बढ़ने नहीं जा रहा है। पॉवेल ने जिस आक्रामक रुख का संकेत दिया है, उसका मकसद मार्केट को यह भरोसा दिलाना है कि केंद्रीय बैंक इनफ्लेशन के मसले को लेकर बहुत गंभीर है।
चीन की इकोनॉमी को सपोर्ट की जरूरत
चीन की इकोनॉमी के बारे में पूछने पर उन्होंने कहा कि 30 अगस्त को डेटा आने पर मैन्युफैक्चरिंग PMIs में और कमी देखने को मिल सकती है। हमने कोरोना की महामारी के बाद चीन की इकोनॉमी में तेज रिकवरी का अनुमान लगाया था। लेकिन, अब साफ हो गया है कि चीन की इकोनॉमी संघर्ष कर रही है। आने वाले महीनों में चीन की इकोनॉमी को ज्यादा सपोर्ट और राहत पैकेज की जरूरत पड़ेगी। उधर, फेडरल रिजर्व और दूसरे केंद्रीय बैंकों के रुख पर भी काफी कुछ निर्भर करेगा। अगर फेड अपनी मॉनेटरी पॉलिसी को और सख्त करता है तो इसका असर चीन सहित वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।