टाटा ट्रस्ट ने चंद्रशेखरन के री-अपॉइंटमेंट पर निशाना साधा, कहा- 100 साल पुराने ढांचे से छेड़छाड़ ठीक नहीं
Tata Sons के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति को लेकर Tata Trusts और कंपनी के बीच विवाद बढ़ गया है। ट्रस्ट ने नियुक्ति की प्रक्रिया, निर्णायक वोट और संभावित लिस्टिंग पर सवाल उठाए हैं। 100 साल पुराने ढांचे से छेड़छाड़ पर भी आपत्ति जताई। जानिए पूरी डिटेल।
टाटा ग्रुप में अंदरूनी विवाद गहरा गया है। Tata Trusts ने Tata Sons के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन की दोबारा नियुक्ति का खुलकर विरोध किया है। 20 सितंबर को जारी बयान में ट्रस्ट ने कहा कि उनकी पुनर्नियुक्ति के समर्थन में कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन की जो व्याख्या दी जा रही है, वो सही नहीं है।
ट्रस्ट ने कहा कि 100 साल पुराने टाटा ग्रुप ढांचे को सिर्फ एक कथित कमी दूर करने के लिए बदलना ठीक नहीं होगा। उसने इसे 'छोटी समस्या के लिए बहुत बड़ा हथौड़ा चलाने' जैसा बताया।
Tata Trusts ने कहा कि Tata Sons कॉरपोरेट गवर्नेंस के मामले में पहले से ऊंचे मानकों का पालन करती है। ऐसे में आर्टिकल्स की ऐसी व्याख्या के आधार पर चेयरमैन की दोबारा नियुक्ति का दावा करना उचित नहीं है।
Tata Sons की लिस्टिंग पर भी सवाल
Tata Trusts ने Tata Sons की संभावित लिस्टिंग को लेकर दी जा रही दलीलों को भी खारिज किया है। ट्रस्ट ने कहा कि लिस्टिंग से गवर्नेंस बेहतर होने की बात कहने का मतलब यह है कि Tata Sons में गवर्नेंस की कमी है। ट्रस्ट के मुताबिक ऐसा नहीं है।
Tata Trusts का कहना है कि Tata Sons कई साल से उन नियमों का पालन करती रही है, जो आम तौर पर शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों पर लागू होते हैं। कंपनी भले ही खुद शेयर बाजार में सूचीबद्ध नहीं है।
Tata Sons के आर्टिकल्स में स्वतंत्र निदेशकों की नियुक्ति का प्रावधान है। कंपनी में ऑडिट कमेटी और नामांकन एवं पारिश्रमिक कमेटी भी है। संबंधित पक्षों के साथ लेनदेन को लेकर भी नियम हैं। निदेशकों के बारी-बारी से रिटायर होने की व्यवस्था भी मौजूद है।
कंपनी ने अंदरूनी कारोबार पर रोक लगाने के लिए कोड ऑफ कंडक्ट भी बना रखा है। Tata Trusts के मुताबिक, इन सभी व्यवस्थाओं का जिक्र कंपनी की सालाना रिपोर्ट और कॉरपोरेट गवर्नेंस रिपोर्ट में होता रहा है।
ट्रस्ट ने कहा कि ये नियम मौजूदा विवाद शुरू होने से काफी पहले ही Tata Sons ने खुद अपनाए थे। इसका मकसद पारदर्शिता और बेहतर गवर्नेंस था।
विवाद सिर्फ गवर्नेंस का नहीं
Tata Trusts ने कहा कि पूरा मामला सिर्फ गवर्नेंस के नियमों तक सीमित नहीं है। ट्रस्ट के मुताबिक, असली सवाल यह है कि Tata ग्रुप के ढांचे में उन लोगों की आवाज कौन उठाएगा, जिनके लिए Tata Trusts 130 साल से ज्यादा समय से काम करता आया है।
ट्रस्ट ने कहा कि सवाल यह नहीं है कि Tata Sons को कौन सा गवर्नेंस मॉडल बेहतर तरीके से चलाएगा। सवाल यह है कि लाखों जरूरतमंद और वंचित भारतीयों के हितों की बात कौन करेगा।
चंद्रशेखरन की नियुक्ति पर क्या विवाद है?
विवाद 17 सितंबर को हुई Tata Sons की बोर्ड बैठक के बाद और बढ़ गया। इस बैठक में चंद्रशेखरन को चेयरमैन के तौर पर दोबारा नियुक्त करने के प्रस्ताव पर विचार हुआ था।
Tata Trusts ने इस प्रस्ताव की वैधता पर सवाल उठाया है। ट्रस्ट का कहना है कि कंपनी के आर्टिकल्स के मुताबिक, इस नियुक्ति के लिए Tata Trusts के नामित निदेशकों का जरूरी समर्थन मिलना चाहिए।
Tata Sons के बोर्ड में Tata Trusts के दो नामित निदेशक हैं। ट्रस्ट का तर्क है कि दो सदस्यों में बहुमत का मतलब दोनों का समर्थन होना चाहिए। लेकिन एक नामित निदेशक ने प्रस्ताव के खिलाफ वोट किया।
इसी वजह से Tata Trusts का कहना है कि जरूरी समर्थन नहीं मिला। ट्रस्ट ने इस प्रस्ताव को वैध नहीं माना है।
चेयरमैन के निर्णायक वोट पर भी विवाद
Tata Trusts ने चेयरमैन के निर्णायक वोट को लेकर भी अपनी स्थिति साफ की है। ट्रस्ट का कहना है कि यह वोट तभी इस्तेमाल किया जा सकता है, जब पूरे बोर्ड में वोट बराबर हों।
उसके मुताबिक, निर्णायक वोट का इस्तेमाल Tata Trusts के नामित निदेशकों से जरूरी समर्थन नहीं मिलने की स्थिति को दूर करने के लिए नहीं किया जा सकता।
इसी आधार पर Tata Trusts का कहना है कि Chandrasekaran की पुनर्नियुक्ति का प्रस्ताव सही तरीके से पास नहीं हुआ। ट्रस्ट ने इसे शुरू से ही अमान्य बताया है और कहा है कि इसका कोई कानूनी प्रभाव नहीं है।
Tata Sons की लिस्टिंग भी बना मुद्दा
Chandrasekaran की पुनर्नियुक्ति के अलावा Tata Sons की संभावित लिस्टिंग को लेकर भी खींचतान चल रही है। Tata Trusts का कहना है कि गवर्नेंस सुधारने के लिए लिस्टिंग को जरूरी बताना सही नहीं है।
ट्रस्ट के मुताबिक, Tata Sons पहले से ही कई ऐसे गवर्नेंस नियमों का पालन करती है, जो शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियों पर लागू होते हैं। इसलिए सिर्फ शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने से गवर्नेंस में कोई बड़ी कमी दूर होगी, ऐसा मानने का आधार नहीं है।
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