कच्चे तेल की नरमी और जियोपॉलिटिकल जोखिम कम होने से इन सेक्टर्स को होगा फायदा, इन पर रहे नजर

तेल की गिरती कीमतों का सबसे साफ और ज्यादा फायदा एविएशन सेक्टर को मिलता है। कंज्यूमर-फ़ेसिंग सेक्टर और फ़ाइनेंशियल सेक्टर को तेल की कम कीमतों से दूसरे दौर का मैक्रो फायदा मिलता है। कच्चे तेल की कम कीमतें और कम होते जियोपॉलिटिकल तनाव का मेल भारत के लिए एक साफ और सकारात्मक मैक्रो बूस्टर है

अपडेटेड Jun 28, 2026 पर 4:23 PM
निवेशकों को ऐसी कंपनियों पर फोकस करना चाहिए जिनका ऑपरेटिंग लेवरेज ज्यादा हो,जिनकी बैलेंस शीट मज़बूत हो और जिनकी वॉल्यूम ग्रोथ भरोसेमंद हो

अमर सिंह

दुनिया के तीसरे सबसे बड़े तेल आयातक देश के तौर पर,भारत अपनी जरूरत का 88% से ज्यादा तेल आयात करता है। इसलिए,कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से उसे फायदा होता है। ब्रेंट क्रूड की कीमत में प्रति बैरल $1 की गिरावट से देश के सालाना आयात बिल में आम तौर पर लगभग 10,000 से 13,000 करोड़ रुपये की बचत होती है।

इसके साथ ही जियोपॉलिटिकल जोखिम कम हो रहे हैं। मिडिल ईस्ट में तनाव का घटना,ईरान-इजरायल युद्ध का समाधान,होर्मुज जलडमरूमध्य से आवाजाही का शुरू होना भी भारत के लिए फायदेमंद है। इससे देश को महंगाई कम होने,करंट अकाउंट घाटा घटने,रुपये को सहारा मिलने और RBI व सरकार के लिए पॉलिसी बनाने की बेहतर गुंजाइश मिलने जैसे फायदे होंगे।


इतिहास गवाह है कि तेल की कीमतों में भारी गिरावट (जैसे 2014-16 के दौरान) ने कुछ खास सेक्टर को काफी फायदा पहुंचाया है,भले ही ग्लोबल ग्रोथ की रफ्तार धीमी रही हो। मौजूदा हालात से फायदे में रहने वाले सेक्टर एक जैसे नहीं हैं। ये फायदे उन इंडस्ट्रीज़ तक सीमित हैं जहां फ्यूल या कच्चे तेल से जुड़े कच्चे माल की लागत का हिस्सा बहुत ज्यादा होता है,या जहां कम महंगाई और ज्यादा डिस्पोजेबल इनकम से बिक्री की मात्रा(वॉल्यूम)सीधे तौर पर बढ़ती है।

कच्चे तेल के भाव कम होने से एविएशन सेक्टर को सीधा और बड़ा फायदा मिलता है। भारतीय एयरलाइंस के ऑपरेटिंग खर्च में एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF)का हिस्सा लगभग 40 प्रतिशत होता है। कच्चे तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट से ATF की कीमतें तुरंत कम हो जाती हैं,जिससे इंडिगो,एयर इंडिया और स्पाइसजेट के ऑपरेटिंग मार्जिन में सीधे तौर पर बढ़ोतरी होती है।

तेल के भाव घटने से एयरलाइंस या तो अपने मार्जिन को सुरक्षित रख सकती हैं या कम किराए के जरिए डिमांड बढ़ा सकती हैं। ये दोनों ही बातें इस सेक्टर के लिए अच्छी हैं। कीमतों में उतार-चढ़ाव कम होने से हेजिंग की लागत भी कम हो जाती है। पहले के दौर में,तेल की कीमतों में बदलाव पर एयरलाइन शेयरों ने अच्छी तेजी दिखाई है। घरेलू हवाई ट्रैफिक में अभी भी मजबूत बढ़त बनी हुई है,इसलिए ईंधन की कम लागत इनके मुनाफे और क्षमता बढ़ाने में आने वाली एक बड़ी रुकावट को दूर कर सकती है।

इसके बाद डाउनस्ट्रीम ऑयल मार्केटिंग कंपनियां (OMCs)और कच्चे तेल से जुड़े मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर का नंबर आता है। इंडियन ऑयल,BPCL और HPCL जैसी कंपनियों को कच्चा तेल खरीदने की कम लागत का फायदा मिलता है। जब रिटेल फ्यूल की कीमतों में बदलाव में देरी होती है या टैक्स की वजह से कीमतों में आई गिरावट का कुछ हिस्सा एडजस्ट हो जाता है। ऐसे में इनका मार्केटिंग मार्जिन बढ़ जाता है। इनको इन्वेंट्री से होने वाला फायदा भी मिल सकता है।

कच्चे तेल की कीमतों में कमी से पेंट सेक्टर को फायदा होता है। इनके कच्चे माल की लागत (जैसे सॉल्वैंट्स,रेजिन और कुछ एडिटिव्स)का 35-50 प्रतिशत हिस्सा कच्चे तेल से जुड़ा होता है। ऐसे में कच्चे तेल में नरमी से एशियन पेंट्स,बर्जर पेंट्स और ऐसी दूसरी कंपनियों को अच्छे मार्जिन या कीमतें तय करने में लचीलेपन का फायदा मिलता है।

टायर बनाने वाली कंपनियों (अपोलो टायर्स,MRF,सिएट,JK टायर)को सिंथेटिक रबर और कार्बन ब्लैक की लागत में कमी से राहत मिल रही है। लुब्रिकेंट्स और कुछ खास केमिकल सेगमेंट को भी इसका फायदा हो रहा है। जब कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आती है तो इन कंपनियों के लिए लागत कम,मार्जिन ज्यादा वाली क्लासिक स्थितियां बनती हैं।

तेल की कीमतों में कमी से ऑटोमोबाइल और लॉजिस्टिक्स सेक्टर को लागत और मांग,दोनों ही फ्रंट पर फायदा होता है। टू-व्हीलर और पैसेंजर गाड़ियों के मामले में,पेट्रोल और डीजल की कम कीमतें गाड़ियों की कुल ओनरशिप लागत (टोटल कॉस्ट ऑफ ओनरशिप)को बेहतर बनाती हैं। कीमत को लेकर संवेदनशील बाजार में यह खरीदारी का एक अहम कारण होता है। पहले भी देखा गया है कि जब ईंधन की कीमतें कम रही हैं,तब एंट्री-लेवल और मास-मार्केट सेगमेंट में रिटेल बिक्री में तेजी आई है।

इसके अलावा क्रूड की कीमतों में कमी से कमर्शियल गाड़ियों और बड़े लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम (ट्रकिंग,लास्ट-माइल डिलीवरी)को डीजल खर्च पर सीधे बचत होती है,जो वेरिएबल कॉस्ट का एक बड़ा हिस्सा होता है। इससे लॉजिस्टिक्स कंपनियों की ऑपरेटिंग लेवरेज बेहतर होती है और ज्यादा ब्याज दरों वाले माहौल में वॉल्यूम रिकवरी में मदद मिल सकती है। भारत में सामान की ढुलाई के लिए सड़क परिवहन ही मुख्य जरिया (70%) है,इसलिए सप्लाई चेन पर इसका मल्टीप्लायर असर काफी अहम है।

कच्चे तेल में नरमी से कंज्यूमर-फेसिंग सेक्टर और फाइनेंशियल सेक्टर को मैक्रो-लेवल पर दूसरे दौर के फायदे मिलते हैं। फ्यूल और ट्रांसपोर्ट की लागत कम होने से महंगाई कम होती है। इससे RBI को पॉलिसी रेट्स को मैनेज करने के लिए ज्यादा गुंजाइश मिलती है। इससे क्रेडिट ग्रोथ और एसेट क्वालिटी में सुधार होता है। जिन बैंकों और NBFCs का रिटेल और SME पोर्टफोलियो मज़बूत है,उन्हें कम महंगाई,स्थिर या कम रेट्स और बेहतर होते कॉर्पोरेट कैश फ्लो के अच्छे चक्र से फायदा होता है।

इसके अलावा ईंधन और ट्रांसपोर्ट पर खर्च कम होने से'कंज्यूमर डिस्क्रिशनरी'और कुछ खास FMCG कैटेगरी में खर्च करने लायक आय(डिस्पोजेबल इनकम)में थोड़ी लेकिन वास्तविक बढ़ोतरी देखने को मिलती है। अगर कम महंगाई और बेहतर फिस्कल हेडरूम (ईंधन सब्सिडी का दबाव कम होने से)से बेहतर कैपेक्स(पूंजीगत व्यय)माहौल बनता है या ब्याज दरों पर निर्भर मांग में सुधार होता है,तो रियल एस्टेट और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी कंपनियों को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा हो सकता है।

भू-राजनीतिक जोखिम कम होने से इन प्रभावों का असर सिर्फ तेल के गणित से कहीं ज्यादा बढ़ जाता है। ग्लोबलअनिश्चितता कम होने से इक्विटी रिस्क प्रीमियम घटता है,FII निवेश को बढ़ावा मिलता है और कुल मिलाकर जोखिम लेने की क्षमता बेहतर होती है। ग्लोबल ट्रेड और कैपिटल एक्सपेंडिचर से जुड़े सेक्टर जैसे कुछ कैपिटल गुड्स,चुनिंदा मैन्युफैक्चरिंग और टूरिज़्म/हॉस्पिटैलिटी शेयरों के लिए अनुकूल माहौल बनता है। सप्लाई-चेन में स्थिरता से आयात पर निर्भर असेंबली इंडस्ट्रीज को भी मदद मिलता है।

सस्ती एनर्जी और शांत भू-राजनीतिक स्थिति का मेल वोलैटिलिटी के उन मुख्य कारणों में से एक को घटाता है,जिन्होंने समय-समय पर भारत की विकास गाथा में बाधा डाली है।

एक बार होने वाले इन्वेंट्री या मार्जिन से मिलने वाले फायदे और लगातार होने वाली कमाई में बढ़ोतरी के बीच फ़र्क करना जरूरी है। ग्राहकों को कितना फायदा होगा और कंपनियां कितना फायदा अपने पास रखेंगी,यह टैक्स पॉलिसी,कॉम्पिटिशन की तीव्रता और प्राइसिंग डिसिप्लिन पर निर्भर करेगा। फायदा पाने वाले सेक्टर की हर कंपनी को एक जैसा फायदा नहीं होगा। बैलेंस-शीट की मजबूती,प्राइसिंग पावर और ऑपरेशनल क्षमता के आधार पर बेहतर प्रदर्शन करने वाली कंपनियां ज्यादा बेहतर स्थिति में रहेंगी।

बुनियादी नज़रिए से देखें तो,कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और कम होते जियोपॉलिटिकल तनाव का मेल भारत के लिए एक अच्छा संकेत है। इससे बाहरी फैक्टर का दबाव कम होता है,महंगाई पर लगाम लगती है और ज्यादा कर्ज वाले सेक्टर में कंपनियों का मुनाफा बढ़ता है। जब तेल की कीमतें गिरती हैं और तो बाजार अक्सर तुरंत सकारात्मक प्रतिक्रिया देता है।

इस स्थिति में निवेशकों को ऐसी कंपनियों पर फोकस करना चाहिए जिनका ऑपरेटिंग लेवरेज ज़्यादा हो (खासकर ईंधन या कच्चे तेल से जुड़े इनपुट के मामले में),जिनकी बैलेंस शीट मज़बूत हो (ताकि वे किसी भी तरह के उतार-चढ़ाव का सामना कर सकें) और जिनकी वॉल्यूम ग्रोथ भरोसेमंद हो। ऐसे माहौल में, एविएशन,OMCs,पेंट,टायर,ऑटोमोबाइल,लॉजिस्टिक्स और ब्याज दरों से प्रभावित होने वाले फाइनेंशियल सेक्टर में चुनिंदा निवेश करना,भारत की जारी स्ट्रक्चरल ग्रोथ स्टोरी में शामिल होने का एक भरोसेमंद तरीका है।

अमर सिंह एंजेल वन में रिसर्च के सीनियर VP हैं.

 

Market View : गिरते बाजार में वोलैटिलिटी को खतरा नहीं,मौका मानें, डेट से पैसा निकालकर इक्विटी निवेश बढ़ाने का अच्छा मौका

 

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