शेयरों के अनिलिस्टेड बाजार में पहले कभी इनवेस्टर्स की ऐसी दिलचस्पी नहीं दिखी थी। आज निवेशक कंपनी के शेयरों के स्टॉक एक्सचेंज में लिस्ट होने तक का इंतजार नहीं करना चाहते। वे आईपीओ से महीनों या सालों से पहले शेयर खरीद रहे हैं। उन्हें लगता है कि पहले निवेश करने पर लिस्टिंग के वक्त उन्हें ज्यादा मुनाफा कमाने का मौका मिलेगा। लेकिन, हाल में कुछ कंपनियों के शेयरों की लिस्टिंग से एक बात साफ हो गई है कि शेयरों में पहले निवेश करने का मतलब यह नहीं है कि आप सस्ते में शेयर खरीद रहे हैं।
हम एचडीपी फाइनेंशियल सर्विसेज का उदाहरण लेते हैं। अनलिस्टेड मार्केट में इस शेयर का प्राइस 1,000-1,300 रुपये चल रहा था। एक बार तो यह 1,525 रुपये तक पर पहुंच गया था। लेकिन, कंपनी ने आईपीओ में शेयर के लिए 700-740 रुपये का प्राइस बैंड तय किया है। इसी तरह टाटा कैपिटल के शेयर के प्राइस अनलिस्टेड मार्केट में 700-1,125 रुपये पहुंच गए थे। लेकिन, कंपनी ने आईपीओ में शेयर की कीमत 310-326 रुपये तय की थी।
SBI Funds Management के आईपीओ में भी यही बात देखने को मिली। कंपनी ने अनलिस्टेड मार्केट में चल रहे शेयर के प्राइस के मुकाबले 30 फीसदी से ज्यादा डिस्काउंट पर आईपीओ में प्राइस तय किए। इन सभी कंपनियों के शेयरों में अनलिस्टेड मार्केट में निवेश करने वाले इनवेस्टर्स नोशनल लॉस उठा रहे थे। इसकी वजह यह नहीं है कि कंपनी के बिजनेस में किसी तरह की कमी आई। इसकी वजह है कि अनलिस्टेड मार्केट में शेयर की कीमतें जरूरत से ज्यादा चढ़ गई थीं।
इसका मतलब है कि इनवेस्टर्स उपर्युक्त मामलों से कुछ बातें समझ सकते हैं:
1 अनिलिस्टेड मार्केट में स्टॉक एक्सचेंजों की तरह शेयर का प्राइस डिस्कवर नहीं होता
यह समझ लेना जरूरी है कि लिस्टेड मार्केट के मुकाबले अनिलिस्टेड मार्केट में शेयर का प्राइस अलग तरह से डिस्कवर होता है। अनलिस्टेड मार्केट में शेयर का प्राइवेट ट्रांजेक्शन होता है। इस बाजार में शेयर खरीदने वालों और बेचने वालों की संख्या सीमित होती है। इस वजह से कुछ मुट्ठीभर खरीदारी शेयरों की वैल्यूएशंस को बढ़ा देते हैं। दरअसल, कंपनी के आईपीओ लॉन्च होने की खबर आते ही अनलिस्टेड बाजार में शेयर की कीमत चढ़ने लगती है।
2. अच्छी कंपनी में भी आपका निवेश खराब हो सकता है
अच्छी कंपनी का मतलब यह नहीं है कि आप उसके शेयर में किसी भी कीमत पर निवेश करें। हर निवेश से पहले यह देखना जरूरी है कि वह इनवेस्टमेंट अर्निंग्स, बुक वैल्यू, ग्रोथ की संभावना और रिटर्न प्रोफाइल के लिहाज से कितनी वैल्यू ऑफर करता है। यह भी समझना जरूरी है कि आईपीओ में शेयर की वैल्यूएशन व्यापक प्रोसेस से तय होती है। इसमें इंस्टीट्यूशनल इनवेस्टर्स की डिमांड, ग्रोथ आउटलुक और बाजार में चल रही स्थितियों का हाथ होता है।
3. FOMO फंडामेंटल एनालिसिस की जगह नहीं ले सकता
कई निवेशक सिर्फ मौका चूक जाने के डर (FOMO) से निवेश करते हैं। इससे शेयर की कीमत में बुलबुला बनता है। इनवेस्टर्स को किसी शेयर में निवेश करने से पहले कंपनी के बिजनेस के बारे में जरूरी जानकारी हासिल करना और उसे समझना जरूरी है। लेकिन, व्यावहारिक रूप से बहुत कम निवेशक ऐसा करते हैं। सिर्फ दूसरों को देख किसी शेयर में निवेश करने से बड़ा लॉस हो सकता है।