वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है। इसका दबाव कई उभरते देशों की मुद्राओं पर दिख रहा है। इसी बीच अर्थशास्त्री और 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को सलाह दी है।
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है। इसका दबाव कई उभरते देशों की मुद्राओं पर दिख रहा है। इसी बीच अर्थशास्त्री और 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को सलाह दी है।
उनका कहना है कि डॉलर के मुकाबले रुपये के 100 के स्तर को हर हाल में बचाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। पनगढ़िया ने जोर दिया कि RBI को किसी मनोवैज्ञानिक आंकड़े के आधार पर नीति तय करने से बचने की जरूरत है।
'जैसे 99 या 101, वैसे 100'
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट में पनगढ़िया ने कहा कि नीति निर्माताओं को किसी मनोवैज्ञानिक आंकड़े के आधार पर मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए। उनके मुताबिक, तेल की बढ़ती कीमतों से पैदा हुए वैश्विक झटके के बीच रुपये को बाजार की परिस्थितियों के अनुसार स्वाभाविक रूप से एडजस्ट होने देना बेहतर होगा।
उन्होंने लिखा, 'डॉलर के मुकाबले 100 रुपये के आंकड़े को अपनी नीति तय करने का आधार मत बनाइए। 100 भी सिर्फ एक संख्या है, ठीक वैसे ही जैसे 99 या 101।'
कच्चे तेल की महंगाई से बढ़ा दबाव
पनगढ़िया की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ रहा है। भारत अपनी कुल जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में वैश्विक ऊर्जा कीमतों में होने वाला कोई भी बड़ा बदलाव सीधे देश की अर्थव्यवस्था और रुपये पर असर डालता है।
रुपये का कमजोर होना हमेशा बुरा नहीं
पनगढ़िया का मानना है कि रुपये का मूल्य घट जाना हमेशा आर्थिक कमजोरी का संकेत नहीं होता। कई बार यह बाहरी झटकों को झेलने और अर्थव्यवस्था को संतुलित रखने का स्वाभाविक तरीका भी होता है।
उनके मुताबिक, अगर तेल आपूर्ति से जुड़ी समस्या कुछ महीनों या एक साल के भीतर खत्म हो जाती है, तो निकट अवधि में रुपया कमजोर हो सकता है। लेकिन बाद में इसमें अच्छी रिकवरी भी देखने को मिल सकती है।
उन्होंने कहा, 'रुपया अभी कमजोर होगा, लेकिन जब तेल आयात बिल घटेगा और विदेशी निवेशक ‘सस्ते’ रुपये का फायदा उठाने के लिए भारत में निवेश करेंगे, तब इसमें मजबूत सुधार देखने को मिल सकता है।'
लंबे समय तक तेल संकट रहा तो...
पनगढ़िया ने चेतावनी दी कि अगर तेल संकट लंबी अवधि तक बना रहता है, तो विदेशी मुद्रा भंडार खर्च करके रुपये को बचाने की कोशिश सिर्फ समस्या को टालने का काम करेगी।
उन्होंने कहा, 'रुपये को बचाने की कोशिश विदेशी मुद्रा भंडार को लगातार खत्म करती रहेगी, जब तक कि वे समाप्त न हो जाएं।' उनके मुताबिक, अगर आर्थिक परिस्थितियां इसकी मांग करती हैं, तो अंततः रुपये को 100 प्रति डॉलर के स्तर से नीचे जाने से रोकना संभव नहीं होगा।
भारत के पास ज्यादा गुंजाइश
पनगढ़िया का मानना है कि मौजूदा समय में भारत की व्यापक आर्थिक स्थिति बेहतर है। इसी वजह से देश कमजोर रुपये के कारण पैदा होने वाली कुछ आयातित महंगाई को झेलने की बेहतर क्षमता रखता है।
पनगढ़िया का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था पहले के मुकाबले ज्यादा मजबूत स्थिति में है। इसलिए देश रुपये को किसी खास स्तर पर बनाए रखने की जिद करने के बजाय बाजार के हिसाब से होने वाले उतार-चढ़ाव को स्वीकार कर सकता है। उनके मुताबिक, इससे लंबे समय में आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में मदद मिलेगी।
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