हाल में एक प्रमुख ब्रांड के दो इलेक्ट्रिक स्कूटर्स (Electric Scooters) के आग के गोला में बदलने (Catching Fire) की खबर आई है। इससे इलेक्ट्रिक व्हीकल्स की सेफ्टी को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। कई तरह के सवाल पूछे जा रहे है। लोग जानना चाहते हैं कि क्या लिथियम-आयन बैटरी (Lithium-Ion Batteries) में हमेशा आग लगने का खतरा होता है? क्या कोई खास स्थितियां हैं, जिनमें इलेक्ट्रिक व्हीकल्स के आग पकड़ने का खतरा होता है?
एनर्जी स्टोरेज का सबसे अच्छा सॉल्यूशन
लिथियम-आयन बैट्रीज को कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स के लिए एनर्जी स्टोरेज का सबसे अच्छा सॉल्यूशन माना जाता है। इसकी वजह इसकी पावर डेंसिटी है। लीड-एसिट बैटरी करीब 25 वॉट प्रति घंटा एनर्जी स्टोर करती है। निकेल हाइड्राइड बैटरी प्रति घंटा 100 वॉट एनर्जी स्टोर कर सकती है। इन दोनों के मुकाबले लिथियम-आयन बैट्रीज की स्टोरेज क्षमता ज्यादा है। यह प्रति घंटा 150 वॉट एनर्जी स्टोर कर सकती है।
हम रोज करते हैं लिथियम-आयन बैट्री का इस्तेमाल
लिथियम-आयन बैटरी हमारी जिंदगी से काफी जुड़ चुकी है। हमारे मोबाइल फोन से लेकर दूसरे कई इलेक्ट्रॉनिक आइटम्स में इसका इस्तेमाल होता है। इसलिए यह तब तक हमारे जीवन का हिस्सा बनी रहेगी, जब तक इससे ज्यादा खूबियों वाली बैटरी की कोई दूसरी टेक्नोलॉजी नहीं आ जाती। इसकी टेक्नोलॉजी की कितनी अहम है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इस बैट्री का मार्केट 193.13 अरब डॉलर तक पहुंच जाने का अनुमान है। अब तक लिथियम-आयम बैट्रीज को कमोबेश सेफ माना जाता रहा है। लेकिन, कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स और इलेक्ट्रिक व्हीकल्स के आग पकड़ने के कुछ मामलों के बाद इसकी सेफ्टी को लेकर चर्चा हो रही है।
कैसे काम करती है यह बैट्री?
लिथियम-आयन बैट्री में कई सेल होते हैं, जिनमें लिथियम भरा होता है। हर बैट्री के दोनों छोर पर इलेक्ट्रोड होते हैं। पहले छोर पर एनोड होता है, जबकि दूसरे पर कैथोड होता है। एनोड और कैथोड दोनों में लिथियम होता है, लेकिन ये अलग एलिमेंट के बने होते हैं। एनोड कार्बन से बनता है, जबकि कैथोड लिथियम कोबाल्ट ऑक्साइड से बना होता है।
जब आप लिथियम-आयन बैट्री को चार्ज करते हैं तो चार्जिंग करेंट सेल में पहुंच जाता है। फिर लिथियम आयन कैथोड से एनोड की तरफ मूव करने लगते हैं। ये इलेक्ट्रोलाइट के जरिए मूव करते हैं, जो बैट्री के बीच में होता है। जब इलेक्ट्रिसिटी के रूप में एनर्जी की सप्लाई हो रही होती है, तब इसके अपोजिट होता है जहां लिथियम आयन एनोड से कैथोड की तरफ फ्लो करते हैं। जब सभी लिथियम आयन कैथोड की तरफ चले जाता हैं तो सेल पूरी तरह चार्ज हो जाता है।
बैट्री मैनजमेंट सिस्टम क्या है?
दूसरे बैट्री सिस्टम से अलग लिथियम-आयन सेल में व्यापक बैट्री सेफ्टी फंक्शन होता है। बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम में सबसे अहम है बैट्री के टेंपरेचर को मेंटेन करना। आपको सेल टेंपरेचर को मेंटेन करने के साथ ही करेंट्स और वॉल्टेज को भी मेंटेन करना पड़ता है। सभी लिथियम-आयन सेल में एक सेपरेटर होता है जो कोर टेंपरेचर बहुत ज्यादा होने पर पिघल सकता है। इससे आयन का मूवमेंट बंद हो जाता है। बैटरी सिस्टम से जुड़ी दूसरा अहम जरूरत उसकी वेंटिलेशन की है। एक प्रेशर-सेंसिटिव वेंट बैट्री की दूसरे सेल्स को आग पकड़ने से रोक सकता है।
कब आग लगने का खतरा होता है?
लिथियम-आयन बैटरी में आग लगने की कई वजहें हो सकती हैं। इनमें मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट, एक्सटर्नल डैमेज या खराब सॉफ्टवेयर शामिल हैं। खराब हो चुके या डमैज सेल में बहुत ज्यादा हीट पैदा हो सकती है। इसे 'थर्मल रनवे' कहा जाता है। इसमें एक सेल में पैदा हुई हीट दूसरे सेल में पहुंच जाती है। इससे एक चेन रिएक्शन बन जाता है, जिसके चलते उसमें आग लग जाती है।
कंज्यूमर के लिहाज से देखें तो अभी तक यह टेक्नोलॉजी भरोसेमंद साबित हुई है। फिर भी, जब तक फ्लेम-रेसिस्टेंट टेक्नोलॉजी नहीं आ जाती, हमें बैट्री को ओवरचार्ज करने से बचना होगा। इसके अलावा हमें बैट्री को सीधे धूप में भी नहीं रखने से परहेज करना चाहिए। अगर बैट्री पोर्टेबल है तो आप इसे तब बिल्कुल चार्ज नहीं करें, जब आप सो रहे हों।